द्वितीय केदार मद्महेश्वर मंदिर के कपाट खुले, यहां होते हैं भगवान के मध्य भाग के दर्शन, जानिए पौराणिक महत्व
पंच केदार में द्वितीय भगवान मद्महेश्वर मंदिर के कपाट आज साढ़े 11 बजे भक्तों के दर्शनार्थ खोल दिए गए हैं। बाबा मद्महेश्वर की चल उत्सव विग्रह डोली को दस बजे मंदिर में लाया गया।
इसके बाद मंदिर के कपाट खोलने की प्रक्रिया शुरू हुई। पुजारी टी गंगाधर लिंग ने पूजा-अर्चना के बाद बदरीनाथ- केदारनाथ मंदिर समिति के अधिकारियों, हकहकूक धारियों की उपस्थिति में विधि-विधान से मंदिर के कपाट खोले।

इसके बाद भगवान मदमहेश्वर के स्वयंभू शिवलिंग को समाधि रूप से अलग कर निर्वाण रूप व उसके बाद श्रृंगार रूप दिया गया। जिसके बाद श्रद्धालुओं ने मंदिर में दर्शन किए।
कपाट खुलने के माैके पर पुष्प सेवा समिति ऋषिकेश द्वारा मंदिर को भव्य रूप से सजाया गया है। द्वितीय केदार भगवान मदमहेश्वर के कपाट खुलने की प्रक्रिया 16 मई से शुरू हो गई थी। 18 मई को भगवान मदमहेश्वर की चल विग्रह डोली और देव निशान शीतकालीन गद्दी स्थल श्री ओकारेश्वर मन्दिर से श्री राकेश्वरी मंदिर रांसी रात्रि विश्राम पहुंची।
19 मई को श्री राकेश्वरी मंदिर रांसी से प्रवास हेतु दूसरे पड़ाव गोंडार गांव पहुंची। 20 मई सुबह श्री मदमहेश्वर जी की चल विग्रह डोली गोंडार से श्री मदमहेश्वर धाम पहुंची। जिसके बाद आज कपाट खोल दिए गए।
पंच केदार उत्तराखंड में भगवान शिव के पांच मंदिरों का समूह है। पौराणिक मान्यता है कि पंच केदार का निर्माण पांडव व उनके वंशजों ने करवाया था। पंच केदार में सबसे पहले आता है केदारनाथ धाम। जो कि 12 ज्योर्तिलिंग के साथ ही चारों धाम में से एक है। इसके बाद द्वितीय केदार मध्यमेश्वर तृतीय केदार तुंगनाथ व चतुर्थ केदार रुद्रनाथ और पंचम केदार कल्पेश्वर हैं।
मध्यमेश्वर धाम मध्यमेश्वर रुद्रप्रयाग जिले में समुद्रतल से 11470 फीट की ऊंचाई पर चौखंभा शिखर की तलहटी में स्थित है। जहां बैल रूप में भगवान शिव के मध्य भाग के दर्शन होते हैं। पौराणिक कथा के अनुसार नैसर्गिक सुंदरता के कारण ही शिव-पार्वती ने मधुचंद्र रात्रि यहीं मनाई थी। मान्यता है कि यहां के जल की कुछ बूंदें ही मोक्ष के लिए पर्याप्त हैं।












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