जैसे ही अयोध्या में प्राण प्रतिष्ठा यहां हुआ वासुकी नाग के मंदिर का शिलान्यास, जानिए मंदिर और राम का कनेक्शन
RAM MANDIR जैसे ही शुभ अभिजीत मुहूर्त में अयोध्या के राम मंदिर में राम लला की प्राण प्रतिष्ठा हुई, उसी समय उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के गोरशाली गांव में ईष्ट वासुकी नाग देवता के प्राचीन मंदिर का शिलान्यास किया गया।

गोरशाली गांव के वासुकी नाग का खास पौराणिक महत्व है और देवभूमि में नाग देवता के कई प्रसिद्ध मंदिर हैं, जिसमें वासुकी नाग का ये मंदिर काफी प्राचीन है। अब ग्रामीणों ने इस प्राचीन मंदिर को भव्य बनाने का संकल्प लिया है। जिसके लिए सभी ग्रामवासी खुद ही श्रम दान कर मंदिर को भव्य बनाने में जुटे हैं।
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अयोध्या में राम लला की प्राण प्रतिष्ठा 12:20 बजे शुभ अभिजीत मुहूर्त के साथ 12:40 बजे समाप्त हुई। इस बीच रामलला की मूर्ति अपने मंदिर में विराजित हुई और मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा की गई। अब देश ही नहीं विदेशी रामभक्त मंदिर में प्रभु श्री राम के दर्शन कर पाएंगे। इस शुभ घड़ी में देश भर में कई मंदिरों में मांगलिक कार्य और पूजा पाठ किया गया।
उत्तराखंड के उत्तरकाशी में भी गोरशाली गांव में इसी शुभ घड़ी में ईष्ट वासुकी नाग देवता के प्राचीन मंदिर का शिलान्यास किया गया। श्री वासुकी नाग देवता मंदिर पुनरोत्थान और पर्यटन समिति के अध्यक्ष सुभाष नौटियाल ने बताया कि वासुकी नाग का प्राचीन मंदिर है, जिसे इस बार ग्रामीणों ने सर्वसम्मति से पुनरोत्थान करने का निर्णय लिया। साथ ही इसके लिए ईष्ट ने भी आज के अभिजीत मुर्हुत का समय दिया।
इससे पहले मंदिर में पूजा पाठ और रामायण का आयोजन किया गया। जिसके बाद 1230 बजे के आसपास पत्थर रखकर शिलान्यास किया गया। गांव के प्रधान नवीन राणा ने बताया कि ग्रामीणों ने तय किया है कि इस मंदिर के लिए श्रमदान गांव के युवा और महिलाएं खुद करेंगी। शिलान्यास के लिए जैसे ही मंदिर की ईटें पहुंचाई गई, गांव की महिलाओं ने खुद अपनी पीठ पर लाकर मंदिर प्रांगण तक पहुंचाई।
अब आज से मंदिर का काम शुरू हो गया है। उत्तरकाशी जिले के गोरशाली गांव में 250 साल पुराना नाग मंदिर है। पुराणों में नाग के 9 स्वरूप माने गए हैं। अनन्त, वासुकि, शेषनाग, पद्मनाभ, कंबल, शंखपाल, धृतराष्ट्र, कालिया , तक्षक हैं। देवभूमि उत्तराखंड में नागों के कई मंदिर हैं। जो कि सालों पुराने हैं। हर मंदिर की अपनी एक पौराणिक कथा और मान्यता है। इस मंदिर को अष्ट गांवों का मंदिर माना जाता है।
ग्रामीणों का दावा है कि उनकी कई पीढ़ियां नाग मंदिर में पूजा करती आ रही हैं। इतना ही नहीं गांव में जब भी पहली बार गाय दूधारू होती है तो उसका पहला दूध नाग देवता को चढ़ाया जाता है। मान्यता है कि इससे ग्रामीणों के पशुओं की रक्षा और उनकी प्रगति सालों से परंपरा के कारण होती आ रही है।
इस गांव में नाग देवता वासुकी रूप में विराजमान हैं। प्राचीन मंदिर के पास एक पानी का रहस्यमयी कुंड हैं। इस कुंड में नाग पंचमी पर लोग दूध की धारा डालते हैं, मान्यता है कि वहां पर नाग स्वयं दूध पीने आते हैं।
नाग मंदिर प्रांगण में राम लीला का मंच भी है। जहां करीब 120 सालों से आज भी रामलीला का मंचन हो रहा है। यहां की एक खास परंपरा रही है कि राजशाही प्रतिबंध की वजह से परंपरा का निर्वाहन करते हुए राजतिलक भगवान राम के पात्र का नहीं, बल्कि गांव के ईष्ट बासुकी नाग देवता का किया जाता है। हालांकि 73 साल पहले राजशाही हटने के बाद ईष्ट वासुकी नाग की डोली के सामने ही राम का राजतिलक करते हैं।
उत्तरकाशी के भटवाड़ी के गोरशाली गांव में रामलीला की शुरूआत 1904 में हुई थी। यहां के युवा आज भी अपनी संस्कृति और परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं साथ ही साथ ही रामलीला का मंचन करते आ रहे हैं। अब इस नए भव्य मंदिर में ही रामलीला का नया मंच तैयार होगा। जहां रामलीला का भव्य मंचन आने वाले समय में किया जाएगा।












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