अमर सिंह की राह पर चलने का मन बना चुके हैं आजम खान ?, जानिए इसकी बड़ी वजहें
लखनऊ, 12 अप्रैल: उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव के सामने इस समय कई चुनौतियां खड़ी हैं। एक तरफ उनके अपने चाचा शिवपाल यादव बीजेपी से नजदीकीयों को लेकर चर्चा में हैं तो उनके दूसरे 'अंकल' (आजम खान) के समर्थकों का गुस्सा कम होने का नाम नहीं ले रहा है। सवाल यह भी उठ रहे हैं कि क्या अखिलेश यादव खुद ही आजम और शिवपाल जैसे नेताओं से छुटकारा पाना चाहते हैं। क्या आजम और शिवपाल से बेरुखी की वजह भी यही है। क्या अखिलेश के रवैये को भांपकर ही आजम खान भी अमर सिंह की राह पर चलने का मन बना चुके हैं। याद करिए एक समय था जब अमर सिंह भी मुलायम के खास हुआ करते थे लेकिन परिस्थितियां ऐसी बनीं की उन्हें सपा छोड़कर अलग पार्टी बनानी पड़ी। तो क्या अब आजम भी अमर सिंह की राह पर चल पड़े हैं। हालांकि इसके लिए अभी और इंतजार करना पड़ेगा।

अमर सिंह के रास्ते पर चल पड़े हैं शिवपाल और आजम
आजम खान को राजनीति में किसी पहचान की जरूरत नहीं है। 2009 में मुलायम सिंह ने आजम को पार्टी से निष्कासित कर दिया था। फिर 2010 में अमर सिंह को पार्टी से निकाल दिया गया। फिर आजम ने पार्टी में अपनी स्थिति और कद बढ़ाना शुरू कर दिया, जबकि अमर सिंह के पास अलग पार्टी बनाने के अलावा और कोई रास्ता नहीं था। अब आजम भी उसी रास्ते पर हैं और चाचा शिवपाल पहले ही उस रास्ते पर चल पड़े हैं। समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव अब खुद को उस चौराहे पर पा रहे हैं जहां मुलायम सिंह दिखाई दे रहे थे। फिर आज़म खान और अमर सिंह थे, जो न केवल मुलायम सिंह थे, बल्कि समाजवादी पार्टी में दो वर्गों के वोट बैंक की धुरी और चुनौती भी थे। तब से 13 साल में सिर्फ दो बदलाव हुए हैं। अमर सिंह नहीं रहे और मुलायम सिंह पार्टी के अध्यक्ष नहीं हैं। लेकिन, चुनौती हमेशा की तरह कठिन है।

आजम और सपा के लिए मुश्किल भरा समय
चाचा शिवपाल और 'अंकल' आजम से छुटकारा पाने के लिए अखिलेश को बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है। वर्तमान में समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव दोनों के सामने वही स्थिति है जो 2009 में मुलायम सिंह के सामने थी। तब और अब की स्थिति की राजनीतिक चुनौतियों को समझने के लिए आजम खान, अमर सिंह, शिवपाल को समझना जरूरी है। समाजवादी पार्टी और आजम खान दोनों ही इस समय हर तरह की मुश्किलों में हैं। यूपी में सपा दूसरे नंबर की पार्टी है, लेकिन चुनाव के तुरंत बाद संगठन के कई कोनों में दरारें दिखने लगी हैं।

आजम समर्थकों का गुस्सा बड़े फैसले का संकेत?
दरअसल आजम खान न केवल पार्टी का नेतृत्व करते हैं, बल्कि यूपी में समाजवादी राजनीति का सबसे बड़ा मुस्लिम चेहरा भी हैं। उनका जेल का सफर अब इतना लंबा हो गया है कि आजम के समर्थक और पार्टी में आजम के वफादारों ने संगठन के मुखिया अखिलेश यादव से सवाल करना शुरू कर दिया है। आजम समर्थकों का सवाल है कि हर मुद्दे पर मुखर रहने वाले अखिलेश अपने ही मजबूत नेता को लेकर आत्मरक्षा की मुद्रा में क्यों हैं? इस सवाल का जवाब समझने के लिए कुछ बातों का ध्यान रखना होगा। दरअसल, समाजवादी पार्टी में आजम खान के राजनीतिक कद के बराबर कोई दूसरा नहीं है। वह मुलायम सिंह के सबसे भरोसेमंद और सत्ता की राजनीति में अखिलेश के वरिष्ठ भी हैं। मुलायम ने इशारों-इशारों में कई बार कहा था कि अखिलेश को आजम खान से बहुत कुछ सीखना चाहिए।

शिवपाल और आजम से पीछा छुड़ाना चाहते हैं अखिलेश ?
सूत्रों की माने तो अखिलेश यादव सत्ता की चाभी और चाबुक दोनों को खुद संभालना चाहते हैं। जबकि आजम और शिवपाल के होते हुए पूरी बात मुलायम सिंह तक पहुंचने का खतरा बना रहता था। इसके अलावा अगर अखिलेश कोई फैसला खुलकर लेना चाहते हैं तो उन्हें वरिष्ठता की वजह से आजम खान से इस पर चर्चा करनी होगी। हालांकि अखिलेश अपनी सरकार के दौरान इस मजबूरी को किसी न किसी तरह से सहते रहे, लेकिन पार्टी की कमान पूरी तरह से उनके हाथ में होने के बाद वे नहीं चाहते कि किसी भी फैसले में किसी दूसरे (शिवपाल यादव) या तीसरे (आजम खान) की गुंजाइश हो।

क्या आजम का कद अखिलेश के लिए बन रहा समस्या
मुलायम की सरकार, संगठन और उनकी नजर में आजम खान की क्या अहमियत रही है ये दुनिया जानती है। लेकिन, अखिलेश ने वरिष्ठ होने के नाते मुस्लिम वोट बैंक को लेकर आजम के सामने किसी भी तरह का 'सरेंडर' करने से परहेज किया। वह चाहते हैं कि जब पार्टी की कमान उनके हाथ में हो तो अब ऐसा कोई चेहरा या नेता न दिखे, जो उनके कहने पर पार्टी के वोट बैंक को इधर से उधर ले जा सके। यानी आजम का राजनीतिक कद उनके लिए आज एक समस्या बन गया है। इसलिए अखिलेश को आजम की उतनी ही फिक्र है, जितनी पार्टी का काम चल रहा है और खुद के वजूद का कोई खतरा नहीं है।

क्या आजम नई पार्टी बनाकर अमर सिंह की राह पर चलेंगे?
2009 में मुलायम सिंह यादव यूपी के केंद्र में रहकर केंद्र की राजनीतिक आकांक्षाओं को पूरा करने की कोशिश कर रहे थे। तब राष्ट्रीय प्रवक्ता अमर सिंह उनके काफी करीब थे। मुलायम को मैनपुरी, इटावा और सैफई ले जाने के बजाय वह उन्हें फाइव स्टार होटलों और बॉलीवुड सितारों की चकाचौंध में ले गया। उस समय मुलायम को उन पर इतना भरोसा था कि रामपुर लोकसभा सीट पर कई दशकों तक संघर्ष करने वाले आजम खान की जगह जयाप्रदा पर दांव लगा दिया। आजम मान गए और प्रचार भी किया। जया जीत गईं, लेकिन आजम को लगा कि अब उनके राजनीतिक मैदान को घर में चुनौती दी जा रही है।

जयाप्रदा को लेकर थी अमर सिंह और आजम में अदावत
जयाप्रदा की राजनीतिक सक्रियता को लेकर अमर सिंह और आजम खान के बीच तलवारें खींची गईं। 2009 का लोकसभा चुनाव आया। अमर सिंह के कहने पर मुलायम ने फिर जयाप्रदा को उम्मीदवार बनाया। इस बार आजम खान ने विरोध किया। फिर भी जया की जीत हुई। अब अमर सिंह ने उन्हें पार्टी से निकाल दिया। आजम को निकाले हुए 6 साल हो गए थे, लेकिन 2009 के लोकसभा चुनाव के नतीजों ने मुलायम सिंह की आंखें खोल दीं। पार्टी ने 2004 में 36 और 2009 में केवल 23 सीटें जीती थीं। अब मुलायम का अमर सिंह से मोहभंग होने लगा। 2010 में, उन्होंने अमर सिंह और जयाप्रदा को पार्टी से निष्कासित कर दिया। आजम खान समाजवादी परिवार में वापस लौट आए थे।
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