क्या 2024 तक अखिलेश बचा पाएंगे अपने महागठबंधन का कुनबा
लखनऊ, 30 मार्च: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के सम्पन्न होने के बाद अब यूपी की सियासत में नए समीकरण बनने शुरू हो गए हैं। चुनाव से पहले अखिलेश यादव ने पूरे राज्य में एक महागठबंधन बनाकर चुनौती देने की कोशिश की लेकिन वो नाकाम साबित हुए। अब चुनाव के बाद दोबारा बीजेपी की सरकार बन गई और अखिलेश प्रतिपक्ष के नेता बन गए। अखिलेश के सहयोगियों को इसमें खाली हाथ रहना पड़ा। इससे अब अखिलेश के सामने असल चुनौती अपने महागठबंधन के सहयोगियों को एकजुट रखने की है। क्योंकि कई नेताओं के सुर चुनाव परिणाम के बाद ही बदल गए हैं।

अखिलेश सदन में नेता प्रतिपक्ष बन गए, लेकिन सहयोगियों को क्या मिला?
चुनाव बीतने के बाद बीजेपी सबसे बड़े दल के उभर में आई और पुर्ण बहुमत के साथ उसने अपनी सरकार बनाई। यूपी की बीजेपी सरकार में योगी आदित्यनाथ सीएम बने तो अखिलेश की सपा दूसरे नंबर पर रहने की वजह से नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी उनके हाथों में चली गई। अखिलेश तो नेता प्रतिपक्ष बन गए लेकिन सहयोगियों को कुछ नहीं मिला लिहाजा अब ये सहयोगी चुनाव बदलते ही अपने सुर बदलने शुरू कर दिए हैं। दरअसल ऐसी स्थिति में सहयोगियों का 5 साल विपक्ष में खाली हाथ बैठे रहना मुश्किल होगा लिहाजा अब वो अपनी संभावनाएं तलाशने में पीछे नहीं रहेंगे।

भाजपा के पास अखिलेश के सहयोगियों को देने के लिए बहुत कुछ
चुनाव परिणाम आने के बाद बीजेपी को स्पष्ट बहुमत मिला है। लिहाजा अब वह अगले आम चुनाव को लेकर अपनी रणनीति बनाने में जुट गई है। बीजेपी को भी इस बात का अंदाजा है कि अखिलेश के सहयोगियों को आसानी से तोड़ा जा सकता है। जैसे जैसे लोकसभा चुनाव करीब आएगा वैसे वैसे सहयोगियों में फूट पड़ने की संभावनाएं जताई जा रही हैं। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अखिलेश के कई सहयोगियों के सुर बदलने शुरू हो गए हैं। बीजेपी उन नेताओं को कई तरह से एडजस्ट कर सकती है। चूंकि उसकी सरकार है तो बहुत सारी ऐसी जगहें हैं जहां उन्हें वह आसानी से पद देकर संतुष्ट कर सकती है।

जयंत फिलहाल राज्यसभा जाएंगे ?
रालोद के मुखिया जयंत चौधरी भी चुनाव के बाद अब नए सिरे पर अपनी रणनीति पर विचार करने के लिए मजबूर हो रहे हैं। हालांकि उन्होंने यह बयान दिया था कि वह अखिलेश का साथ नहीं छोड़ेंगे लेकिन बीजेपी सूत्रों की माने तो बीजेपी को भी जयंत की काफी जरूरत है और वह आम चुनाव से पहले जयंत को साधने की हर मुमकिन कोशिश करेगी। चुनाव से पहले अखिलेश से हुए गठबंधन के अनुसार जयंत राज्यसभा जाएंगे। दूसरी ओर जयंत चंद्रशेखर के सम्पर्क में भी हैं और वह नए समीकरण की टोह ले रहे हैं।

राजभर के भी भाजपा के सम्पर्क में होने के कयास
विधानसभा चुनाव होने से पहले सबसे अधिक चर्चा ओम प्रकाश राजभर की थी। राजभर ने अखिलेश के साथ मिलकर पूर्वांचल कई जिलों में बीजेपी की नाक में दम कर दिया। रिजल्ट आए तो पूर्वांचल में बीजेपी काफी कमजोर साबित हुई। बीजेपी को भी पता है कि जिस तरह से पश्चिम में जयंत चौधरी की जरूरत है उसी तरह पूर्वांचल में राजभर के बिना बीजेपी की गाड़ी आगे नहीं बढ़ सकती है। चुनाव परिणाम आने के बाद ऐसी खबर आई थी कि राजभर की अमित शाह से मुलाकात हुई है। हालांकि बीजेपी के सूत्र भी यह बता रहे हैं कि दोनों के बीच मुलाकात हुई है। बीजेपी के खिलाफ ओम प्रकाश राजभर के सुर भी नरम पड़ गए हैं। इससे लगता है कि राजभर भी अपने लिए स्पेस ढूंढ रहे हैं। हालांकि मीटिंग से इनकार किया लेकिन सूत्र कह रहे हैं कि बातचीत हुई है। इन दिनों योगी सरकार को लेकर राजभर के बयानों पर नजर डालने से पता चलता है कि वह अब पुरानी कड़वाहट को भूलना चाहते हैं।












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