फूलपुर क्यों है यूपी की वीआईपी सीट?

अतीक अहमद के बाद 2009 में पहली बार इस सीट पर बहुजन समाज पार्टी ने भी जीत हासिल की। जबकि बीएसपी के संस्थापक कांशीराम यहां से ख़ुद चुनाव हार चुके थे।

फूलपुर विधानसभा क्षेत्र
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फूलपुर विधानसभा क्षेत्र

आज़ादी के बाद से ही दुनिया भर में चर्चित रहने वाला फूलपुर संसदीय क्षेत्र देश के प्रथम प्रधानमंत्री का चुनावी क्षेत्र तो रहा ही है, कई बार अप्रत्याशित परिणाम देने और कई बड़े नेताओं को हराने के लिए मशहूर रहा है.

पिछले लोकसभा चुनाव तक कभी भी इस सीट से हासिल ना करने वाली बीजेपी ने भी 2014 के लोकसभा चुनाव में यहां से जीत का स्वाद चख लिया और उसके पुरस्कार के रूप में यहां से जीत कर संसद पहुंचे केशव प्रसाद मौर्य को बीजेपी ने प्रदेश के संगठन की कमान सौंप दी.

हालांकि विधान सभा के तौर पर फूलपुर का गठन पहली बार 2012 में ही हुआ. विधानसभा में तो फिलहाल इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व समाजवादी पार्टी के सईद अहमद करते हैं जबकि लोकसभा में बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य हैं. लेकिन फूलपुर संसदीय सीट का इतिहास अपने आप में अनूठा है.

जवाहर लाल नेहरू
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जवाहर लाल नेहरू

देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने 1952 में पहली लोकसभा में पहुंचने के लिए इसी सीट को चुना और लगातार तीन बार 1952, 1957 और 1962 में उन्होंने यहां से जीत दर्ज कराई थी. नेहरू के चुनाव लड़ने के कारण ही इस सीट को 'वीआईपी सीट' का दर्जा मिल गया.

फूलपुर के रहने वाले एक बुज़ुर्ग लीलाधर मिश्र बताते हैं, "नेहरू पूरी दुनिया में भले ही वीआईपी रहे हों, यहां के लोगों के लिए आम थे. उस समय सुरक्षा का ऐसा ताम-झाम नहीं था. प्रधानमंत्री होने के बावजूद उनकी इतनी घेराबंदी नहीं रहती थी कि उनसे कोई मिल न सके. यहां तक कि कई लोगों को नेहरू जी ख़ुद नाम से जानते थे और अक़्सर कुछ लोगों के यहां रुकते भी थे."

यूं तो फूलपुर से जवाहर लाल नेहरू का कोई ख़ास विरोध नहीं होता था और वो आसानी से चुनाव जीत जाते थे लेकिन उनके विजय रथ को रोकने के लिए 1962 में प्रख्यात समाजवादी नेता डॉ. राम मनोहर लोहिया ख़ुद फूलपुर सीट से चुनाव मैदान में उतरे, हालांकि वो जीत नहीं पाए.

इलाहाबाद के कांग्रेस नेता और विश्वविद्यालय में छात्र नेता रहे अभय अवस्थी बताते हैं, "लोहिया जी नेहरू का विरोध करने के लिए ये जानते हुए भी यहां से चुनाव लड़े कि हार जाएंगे. और हुआ भी वैसा. लेकिन नेहरू ने उन्हें राज्यसभा पहुंचाने में मदद की क्योंकि नेहरू का मानना था कि लोहिया जैसे आलोचक का संसद में होना बेहद ज़रूरी है."

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कांग्रेस के झंडे के साथ समर्थक
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कांग्रेस के झंडे के साथ समर्थक

नेहरू के निधन के बाद इस सीट की जिम्मेदारी उनकी बहन विजय लक्ष्मी पंडित ने संभाली और उन्होंने 1967 के चुनाव में जनेश्वर मिश्र को हराकर नेहरू और कांग्रेस की विरासत को आगे बढ़ाया.

लेकिन 1969 में विजय लक्ष्मी पंडित ने संयुक्त राष्ट्र में प्रतिनिधि बनने के बाद इस्तीफ़ा दे दिया. यहां हुए उपचुनाव में कांग्रेस ने नेहरू के सहयोगी केशवदेव मालवीय को उतारा लेकिन संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर जनेश्वर मिश्र ने उन्हें पराजित कर दिया. इसके बाद 1971 में यहां से पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह कांग्रेस के टिकट पर निर्वाचित हुए.

आपातकाल के दौर में 1977 में हुए आम चुनाव में कांग्रेस ने यहां से रामपूजन पटेल को उतारा लेकिन जनता पार्टी की उम्मीदवार कमला बहुगुणा ने यहां से जीत हासिल की. ये अलग बात है कि बाद में कमला बहुगुणा ख़ुद कांग्रेस में शामिल हो गईं.

आपातकाल के बाद मोरारजी देसाई के नेतृत्व में बनी जनता पार्टी की सरकार पांच साल नहीं चली और 1980 में मध्यावधि चुनाव हुए तो इस सीट से लोकदल के उम्मीदवार प्रफेसर बी.डी.सिंह ने जीत दर्ज की.

1984 में हुए चुनाव कांग्रेस के रामपूजन पटेल ने इस सीट को जीतकर एक बार फिर इस सीट को कांग्रेस के हवाले किया. लेकिन कांग्रेस से जीतने के बाद रामपूजन पटेल जनता दल में शामिल हो गए. 1989 और 1991 का चुनाव रामपूजन पटेल ने जनता दल के टिकट पर ही जीता.

पंडित नेहरू के बाद इस सीट पर लगातार तीन बार यानी हैट्रिक लगाने का रिकॉर्ड रामपूजन पटेल ने ही बनाया.

अतीक अहमद
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अतीक अहमद

1996 से 2004 के बीच हुए चार लोकसभा चुनावों में यहां से समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार जीतते रहे. 2004 में कथित तौर पर बाहुबली की छवि वाले अतीक अहमद यहां से सांसद चुने गए.

वरिष्ठ पत्रकार योगेश मिश्र कहते हैं, "1989 के बाद देश भर में चली जनता दल की लहर का असर इस सीट पर भी पड़ा. चूंकि कांग्रेस के ख़िलाफ़ माहौल बनाने वाले वीपी सिंह न सिर्फ़ इलाहाबाद के ही रहने वाले थे बल्कि फूलपुर से ही वो सांसद भी रह चुके थे, इसलिए यहां उनका ख़ास असर रहा और कांग्रेस की पराजय हुई."

अतीक अहमद के बाद 2009 में पहली बार इस सीट पर बहुजन समाज पार्टी ने भी जीत हासिल की. जबकि बीएसपी के संस्थापक कांशीराम यहां से ख़ुद चुनाव हार चुके थे. लेकिन दिलचस्प बात ये है कि 2009 तक तमाम कोशिशों और समीकरणों के बावजूद भारतीय जनता पार्टी इस सीट पर जीत हासिल करने में नाकाम रही.

योगेश मिश्र बताते हैं, "इस सीट पर मंडल का असर तो पड़ा लेकिन कमंडल का असर नहीं हुआ था. राम लहर में भी यहां से बीजेपी जीत हासिल नहीं कर सकी. जीत तो छोड़िए कई बार तो उसे तीसरे या चौथे नंबर पर ही संतोष करना पड़ा."

लेकिन आख़िरकार 2014 में यहां की जनता ने जैसे बीजेपी के भी अरमान पूरे कर दिए. यहां से केशव प्रसाद मौर्य ने बीएसपी के मौजूदा सांसद कपिलमुनि करवरिया को पांच लाख से भी ज़्यादा वोटों से हराया. बीजेपी के लिए ये जीत इतनी अहम थी कि पार्टी ने केशव प्रसाद मौर्य को इनाम स्वरूप प्रदेश अध्यक्ष भी बना दिया.

इतने बड़े नेताओं की कर्मस्थली रहने के बावजूद यदि देखा जाए तो फूलपुर में विकास के नाम पर सिर्फ़ इफ़को की यूरिया फ़ैक्ट्री भर है. हालांकि शिक्षा के नाम पर यहां के कुछेक इंटर कॉलेज गुणवत्ता के लिए राज्य भर में काफी मशहूर रहे लेकिन उनकी भी स्थिति दिनोंदिन बिगड़ती गई.

इन सबके बावजूद यहां के निवासियों को इस संसदीय क्षेत्र के गौरवशाली इतिहास पर गर्व है. बाबूगंज गांव के एक युवा दिनेश कुमार कहते हैं, "फूलपुर सीट न सिर्फ़ बड़े नेताओं को जिताने के लिए बल्कि कई दिग्गजों को धूल चटाने के लिए भी मशहूर है. चाहे वो लोहिया हों, छोटे लोहिया (जनेश्वर मिश्र) हों या फिर कई और."

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