आखिर क्यों मुलायम सिंह ने कांग्रेस से गठबंधन से किया इनकार
आखिर क्यों मुलायम सिंह यादव ने कांग्रेस के साथ गठबंधन से किया इनकार, उन्हें इस बात का अंदाजा है कि भाजपा उनकी राजनीतिक विरोधी है जबकि कांग्रेस वास्तविक चुनौती
लखनऊ। उत्तर प्रदेश चुनाव से ठीक पहले जिस तरह से कयास लगाए जा रहे थे कि सपा कांग्रेस के साथ गठबंधन कर सकती है और सपा से नाराज मुस्लिम वोटों को बिखरने से रोक सकती है, उसे मुलायम सिंह यादव ने सीधे तौर पर खारिज कर दिया है। मुलायम सिंह ने तमाम अटकलों पर विराम लगाते हुए कहा कि सपा अकेले चुनावी मैदान में उतरेगी और किसी से गठबंधन नहीं करेगी। लेकिन यहां समझने वाली बात यह है कि आखिर क्यों मुलायम ने गठबंधन से इनकार कर दिया है।

कार्यकर्ताओं को एकजुट रखने की कोशिश
सपा के रजत जयंती कार्यक्रम में तमाम समाजवादी दलों को मुलायम सिंह ने एक मंच पर आने का न्योता दिया और महागठबंधन को लेकर सुगबुगाहत तेज हो गई थी, खुद शरद यादव ने भी इस बात की पुष्टि की थी कि मुलायम ने उन्हें और देवेगौड़ा को गठबंधन पर बात करने के लिए बुलाया था। लेकिन यहां समझने वाली बात यह है कि परिवार के भीतर जिस तरह से घमासान मचा हुआ है उसे देखते हुए मुलायम सिंह सबसे पहले पार्टी के कार्यकर्ताओं को एकजुट करने के प्रयास में जुटे हैं और वह इस बात का बिल्कुल भी जोखिम नहीं लेना चाहते हैं कि पार्टी के जमीनी कार्यकर्ता दो पक्ष में बंट जाएं। ऐेस में एक तरफ जहां मुलायम सिंह के सामने परिवार को एकजुट करने के साथ कार्यकर्ताओं को साथ बनाए रखने की चुनौती है, उस वक्त वह गठबंधन करके दूसरी चुनौती को लेने से दूरी बनाना चाहते हैं।

अपनी शर्तों पर गठबंधन का छोड़ा विकल्प
पार्टी के भीतर जिस तरह से पारिवारिक विवाद चल रहा है उसपर ना सिर्फ भाजपा बल्कि मायावती लगातार हमलावर हैं और मुस्लिम वोटों को साधने के लिए परिवार के विवाद को जमकर लोगों के बीच रख रही हैं। लखनऊ में तमाम दलों के नेताओं को एक मंच पर लाकर मुलायम ने शक्ति प्रदर्शन किया, सूत्रों की मानें तो कांग्रेस 80 सीटें मिलने पर गठबंधन के लिए तैयार भी थी। कांग्रेस ने यह शर्त रखी थी कि वह सभी 80 लोकसभा सीटों पर एक सीट चाहती है और अमेठी व रायबरेली की सीट भी अपने पास रखना चाहती थी। खुद अखिलेश यादव भी कांग्रेस के साथ गठबंधन के पक्ष में थे, कई बार उन्होंने यह सार्वजनिक मंच पर कहा कि अगर कांग्रेस के साथ गठबंधन हुआ तो हम 300 से अधिक सीटें जीतेंगे। ऐसे में मुलायम सिंह यादव ने 325 सीटों पर अपने उम्मीदवारों की घोषणा करके सिर्फ 78 सीटों पर उम्मीदवारों को छोड़ा है। माना जा रहा है कि जो 78 सीटें उन्होंने छोड़ी है उसे वह अन्य तमाम दलों के लिए विकल्प के तौर पर छोड़ा है, ऐसे में मुलायम सिंह ने यह संकेत साफ तौर पर देने की कोशिश की है कि अगर कोई गठबंधन होना है तो वह गठबंधन उनकी शर्तों पर होगा।

1989 से बदला है यूपी में सियासी समीकरण
वर्ष 1989 तक उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का मुख्य जनाधार ब्राह्मण, दलित और मुस्लिम वोट बैंक था, तीनों ही समुदाय मिलकर प्रदेश की 50 फीसदी वोटर के तौर पर प्रदेश की राजनीति को तय करते हैं। लेकिन मंडल और कमंडल की राजनीति के शुरु होने के बाद यह चारदीवारी धीरे-धीरे गिरने लगी। एक तरफ जहां मुलायम सिंह यादव ने मुसलमान वोटरों को साधने की कोशिश की तो, भाजपा ने सवर्ण जाति को अपनी ओर करना शुरु किया, जबकि काशीराम की पार्टी बसपा ने दलितों को साधना शुरु कर दिया, वहीं बचे हुए समीकरण को कांग्रेस को साधना पड़ा। मंदिर की राजनीति के आने के बाद इन तीनों दलों ने प्रदेश में 27 वर्ष तक अपना दबदबा बनाए रखा।

कांग्रेस के लिए सपा से गठबंधन फायदे का सौदा
तमाम चुनावों में मुलायम सिंह के लिए हमेशा यही सबसे बड़ा सवाल रहा कि मुस्लिम वोटबैंक को साधने के लिए क्या उन्हें कांग्रेस के साथ जाना चाहिए। जब-जब कांग्रेस ने गठबंधन किया है उसका प्रदर्शन पहले की तुलना में बेहतर रहा है, बिहार में भी गठबंधन के बाद कांग्रेस को पहले की तुलना में अधिक सीटें मिली हैं। यूपी में भी कांग्रेस सपा के साथ गठबंधन करना चाहती थी। अगर कांग्रेस के उपरी जाति के उम्मीदवार मैदान में उतरते तो माना जा रहा था कि उन्हें मुस्लिम व यादव वोटों का फायदा मिलता, यही नहीं इसके साथ अपनी जाति के वोटबैंक को भी ये उम्मीदवार साधने में सफल होते, यूपी कांग्रेस के बेहतर प्रदर्शन से 2019 में पार्टी की उम्मीदें और प्रबल होती। 2009 के लोकसभा चुनाव में मुस्लिम वोटबैंक का एक तबका मुलायम सिंह से नाराज था और इसकी वजह थी उनकी कल्याण सिंह के साथ करीबी। जिसके चलते सपा को इसका नुकसान भी उठान पड़ा और कांग्रेस को यूपी में 20 सीटें मिली।

मुलायम की सियासी सोच
ऐसे में उत्तर प्रदेश में अकेले दम पर चुनाव लड़ने का ऐलान कर मुलायम सिंह ने तत्कालीन हित को किनारे रखते हुए लोकसभा चुनाव पर नजर बना रहे हैं। उन्हें पता है कि प्रदेश में सपा की सरकार ने अपना पांच साल पूरा किया और उनके बेटे अखिलेश यादव युवा नेता हैं, ऐसे में विपक्ष से सपा को कुछ खास नुकसान होता नहीं दिख रहा है। लेकिन अगर सपा कांग्रेस के साथ गठबंधन करती है तो उसे दूरगामी नुकसान उठाना पड़ सकता है, मुलायम सिंह को इस बात का अंदाजा है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा उनके लिए राजनीतिक विरोधी है जबकि कांग्रेस उनके लिए वास्तविक प्रतिस्पर्धा है।












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