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1,000 साल का वास्ता क्यों दे रहे हैं सीएम योगी, पश्चिमी यूपी और जाटों को लेकर है कोई खास रणनीति ?

लखनऊ, 10 दिसंबर: उत्तर प्रदेश में बीजेपी फिर से जाटों को अपने साथ गोलबंद करने की कोशिशों में जुट गई है। किसान आंदोलन के खत्म होने के बाद उसका हौसला बढ़ा है और उसे लगता है कि अब ज्यादातर जाट किसानों का पार्टी से नाराजगी का कोई मतलब नहीं है। क्योंकि, जाटों के एक बड़े तबके को गुस्सा था भी तो कृषि कानूनों को लेकर था। इसलिए पार्टी अब फिर से अपने उन मुद्दों को उभारने में जुट गई है, जिसकी वजह उसे पश्चिमी यूपी में काफी सीटें मिलती रही हैं। इसकी कमान खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ संभाल चुके हैं और आने वाले दिनों में इसका जमीन प्रभाव भी देखने को मिल सकता है।

किसान आंदोलन खत्म होने से भाजपा की जगी उम्मीद

किसान आंदोलन खत्म होने से भाजपा की जगी उम्मीद

गुरुवार को ही संयुक्त किसान मोर्चे ने केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के भरोसे पर एक साल से ज्यादा वक्त से चले आ रहे किसान आंदोलन को खत्म करने की घोषणा की है। इसके बाद सबसे पहले नजर पश्चिमी यूपी पर जाता है कि इससे वहां भाजपा की चुनावी सेहत पर क्या असर पड़ने वाला है। मोदी विरोधी पार्टियां और बाकी लोग लगातार यही दावा करते रहे हैं कि तीनों कृषि कानून वापसी का फैसला, मुख्य रूप से यूपी विधानसभा चुनावों को देखकर ही लिया गया है। मुजफ्फरनगर के बीजेपी सांसद और केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान की बातों में आंदोलन खत्म होने की खुशी साफ झलकती है। उन्होंने संसद भवन परिसर में पत्रकारों से कहा है, "हमको भी अच्छा नहीं लग रहा था किसान एक साल से आंदोलन कर रहे थे......बात पार्टी की, मेरी या और की नहीं...सबलोगों की यही राय थी, जो किसान नहीं हैं उनकी भी यही राय थी कि आंदोलन समाप्त होना चाहिए। किसान जो भी हैं, संतुष्ट होकर वापस जाना चाहिए.......और सबकी यही इच्छा थी।"

पश्चिमी यूपी और जाटों को लेकर है कोई खास रणनीति ?

पश्चिमी यूपी और जाटों को लेकर है कोई खास रणनीति ?

2014 और 2019 का आम चुनाव हो या फिर 2017 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव, पश्चिमी यूपी- जिसे कोई जाट बेल्ट कहता है, कोई गन्ना बेल्ट कहता है या हरित प्रदेश भी कहा जाता है, इस इलाके ने भारतीय जनता पार्टी को लोकसभा और विधानसभा के चुनावों में दिल खोलकर समर्थन दिया है। यूपी से जो किसान दिल्ली की सीमा पर गाजियाबाद के यूपी बॉर्डर पर सालभर से धरने पर बैठे थे, उनमें से अधिकतर इसी इलाके के हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल ने गठबंधन का ऐलान किया है तो बीजेपी को अपना यही गढ़ ढहने का डर सता रहा है। लेकिन, किसान आंदोलन की वापसी से बीजेपी का हौसला बढ़ा है और वह अपना जनाधार कायम रखने के लिए नई रणनीति बनाने में जुट गई है। संजीव बालियान का कहना है, "इससे पहले जब गांवों में जाते थे तो लोग कहते थे कि आंदोलन की बातचीत कर लो...आंदोलन वापस होना चाहिए। अब आंदोलन वापस हो चुका है तो हम अपनी बात उनके बीच में रखेंगे। जो पांच साल हमने काम वहां किया है.....साढ़े सात साल-आठ साल मोदी जी के नेतृत्व में काम हुआ...उन मुद्दों को लेकर जनता के बीच में जाएंगे।"

बीजेपी की रणनीति-मुजफ्फरनगर दंगों की याद दिलाते रहना

बीजेपी की रणनीति-मुजफ्फरनगर दंगों की याद दिलाते रहना

यह बात किसी से छिपी नहीं है कि 2013 में मुजफ्फरनगर में तत्कालीन सरकार वहां भड़के सांप्रदायिक दंगे को रोकने में किस कदर नाकाम रही थी। कितने बेकसूरों की जानें चली गईं, हजारों लोग अपने ही शहर में शरणार्थी बन गए थे। इस दंगों के जख्मों ने जमीन पर ऐसा चुनावी समीकरण तैयार किया कि बीजेपी को काफी समर्थन मिला। यह बात भी तथ्यात्मक रूप से सही है कि 2017 से अबतक योगी आदित्यनाथ सरकार के दौरान प्रदेश में सांप्रदायिक दंगे नहीं हुए हैं। यही वजह है कि जो किसान कृषि कानूनों के चलते भाजपा से छिटकने लगे थे, उनके फिर से साथ आने की पार्टी उम्मीद तो कर ही रही है, लेकिन उसने 2013 के दंगों का याद दिलाना नहीं छोड़ा है।

1,000 साल का वास्ता क्यों दे रहे हैं सीएम योगी ?

1,000 साल का वास्ता क्यों दे रहे हैं सीएम योगी ?

यही वजह है कि अंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया को दिए इंटरव्यू में एक सवाल के जवाब में यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने कहा है, 'मैंने कहा है कि जमीनी सच्चाई को जरूर समझना चाहिए। और जमीनी सच्चाई ये है कि पश्चिमी यूपी में जाट और अन्य मुजफ्फरनगर दंगों और अपने अपमान को नहीं भुला सकते। कोई भी स्वाभिमानी समाज इसे 1,000 साल तक नहीं भूलेगा।'

पश्चिमी यूपी के जाटों पर क्यों है बीजेपी को इतना भरोसा ?

पश्चिमी यूपी के जाटों पर क्यों है बीजेपी को इतना भरोसा ?

बीजेपी जानती है कि सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव और रालोद के सर्वेसर्वा जयंत चौधरी की चुनावी दोस्ती के बीच में मुजफ्फरनगर दंगा बहुत ही कमजोर कड़ी है। अगर बीजेपी उसे तोड़ने में कामयाब रही तो फिर इन 'दोनों लड़कों' का भी हाल कम से कम जाट बेल्ट में 2017 जैसा ही हो सकता है। यही वजह है कि मुख्यमंत्री ने कहा है, 'क्या पश्चिमी यूपी के जाट उनके खिलाफ दर्ज फर्जी मामलों, मुजफ्फरनगर दंगों के समय हुई सामूहिक हत्याओं को कभी भूल सकते हैं? क्या वे सहारनपुर, मेरठ, कोसी कलां, बिजनौर के दंगों को भुला सकते हैं?'

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