क्यों मायावती से मायूस बसपा नेताओं के लिए अखिलेश यादव बन गए हैं पहली पसंद ?

लखनऊ: उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव में अब एक साल से भी कम रह गए हैं। इसको लेकर भाजपा के बाद अगर कोई पार्टी सबसे ज्यादा उत्साहित है तो वो है अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी। पार्टी का मनोबल बढ़ने की वजह ये है कि जिस तरह से बहुजन समाज पार्टी के नेता पिछले कुछ समय में 'बहनजी' से मायूस होकर सपा में आए है, उससे पार्टी को लग रहा है कि दलितों में भी उसका जनाधार बढ़ता जा रहा है। पार्टी को यकीन है कि आने वाले वक्त में ये सिलसिला यूं ही जारी रहने वाला है। सपा के रणनीतिकारों को लग रहा है कि करीब ढाई दशक पहले दोनों दलों के समर्थकों के बीच जो खाई बन गई थी, उसे तो पिछले लोकसभा चुनाव में खुद 'बहनजी' ही भर चुकी हैं, इसीलिए अब बीएसपी के बागियों की मदद से दलित वोटों को सपा के पक्ष में लाना ज्यादा मुश्किल काम नहीं रह गया है!

बसपा छोड़ने वाले नेताओं का सपा में हो रहा है स्वागत

बसपा छोड़ने वाले नेताओं का सपा में हो रहा है स्वागत

पिछले करीब 6 महीने में कम से कम दो दर्जन से ज्यादा नेता बसपा के हाथी से उतरकर सपा की साइकिल चलाने लगे हैं। वैसे राजनीतिक जानकारों की मानें तो लोकसभा का चुनाव हो या फिर विधानसभा का, यूपी में अपना चुनावी भविष्य दुरुस्त करने के लिए नेताओं के पाला बदलने का ट्रेंड हमेशा से रहा है और 2022 के चुनाव से पहले ऐसा अक्सर देखने को मिलेगा। लेकिन, समाजवादी पार्टी इसलिए गदगद हो रही है कि बीएसपी छोड़ने वालों की पहले पसंद वही बन रही है। मायावती ने 2019 के लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद समाजवादी पार्टी से गठबंधन तोड़ लिया था। लेकिन, पिछले साल 28 अक्टूबर को हुए राज्यसभा चुनाव के बाद बसपा में मायावती के नेतृत्व से असंतुष्ट होने वाले नेताओं की तो जैसे लाइन ही लग गई है। इनमें से तो कई बसपा के कुछ मौजूदा मुस्लिम विधायक भी हैं, जिन्हें लगता है कि बहनजी भाजपा के खिलाफ अपनी भूमिका ठीक से नहीं निभा रही हैं। अलीगढ़ के कोल विधानसभा के पूर्व बसपा विधायक जमीरुल्लाह कहते हैं, 'यूपी में एसपी ही एकमात्र ऐसी पार्टी है, जो अगले विधानसभा चुनाव में बीजेपी को कड़ी टक्कर दे सकती है। बीएसपी ने बीजेपी के साथ गुपचुप गठबंधन करके जनता को ठगा है।'

कई दलित नेताओं में बढ़ी है अपनी जाति के नेता बनने की चाह

कई दलित नेताओं में बढ़ी है अपनी जाति के नेता बनने की चाह

उधर समाजवादी पार्टी इस उम्मीद में है कि बसपा से आने वाले अनुसूचित जाति के नेताओं की वजह से दलितों में उसका वोट बैंक बढ़ रहा है। वैसे भी पार्टी इस वक्त दलितों को रिझाने-समझाने में पूरा जोर लगा रही है। समाजवादी पार्टी जिन दलित जातियों पर डोरे डालने की कोशिश कर रही है उनमें जाटव (मायावती के कोर वोटर) समेत गैर-जाटव जातियां भी शामिल हैं, जैसे कि वाल्मीकि, धोबी, पासी आदि। यूपी की जनसंख्या में ये जातियां करीब 21 फीसदी हैं। वैसे इन्हें सपा में शामिल करवाने का पार्टी नेताओं का मकसद और बीएसपी छोड़कर अखिलेश के साथ आने वाले राजनेताओं का लक्ष्य, दोनों में थोड़ा अंतर नजर आता है। मसलन, 19 फरवरी को सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव की मौजूदगी में बसपा के संस्थापक सदस्य रहे आरके चौधरी ने फिर से साइकिल थाम ली है। वह पिछले कुछ वर्षों में सबसे बड़े पासी (दलितों की एक जाति) नेता बनने के चक्कर में कई बार इधर से उधर हो चुके हैं। हालांकि, 2019 के लोकसभा चुनाव में लखनऊ के मोहनलालगंज (सुरक्षित) सीट से कांग्रेस का हाथ पकड़कर जब चुनाव लड़ा तो सिर्फ 4.7 फीसदी वोट ही जुटा सके थे।

दलित वोटरों के बीच जनाधार बढ़ाना चाहती है सपा

दलित वोटरों के बीच जनाधार बढ़ाना चाहती है सपा

लेकिन, समाजवादी पार्टी का अपना लक्ष्य है। उसे उम्मीद है कि बसपा से आए नेताओं की बदौलत वह दलितों के बीच अपनी साख निश्चित रूप से बढ़ा सकती है, क्योंकि उसे लगता है कि करीब ढाई दशकों से उसके साथ ज्यादा से जो दूरियां बनी हुई थी, उसे तो पिछले लोकसभा चुनाव में खुद मायावती ही दूर कर चुकी हैं। अब, उसी को हथियार बनाकर पार्टी बहनजी के दलित वोट बैंक को साधना चाहती है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय सचिव राजीव राय ने ईटी को बताया है, '(बसपा से आने वाले दलित नेता)वो अपने इलाकों के वोटरों के बीच जाएंगे और बताएंगे कि बीएसपी में रहते हुए कैसे मायावती की परछाई में रहकर काम करना होता है, जबकि हम उनके साथ सम्मानपूर्वक व्यवहार कर रहे हैं। पूर्व नेताओं के बीएसपी के परंपरागत वोटरों के बीच इस तरह की बातों से उनमें एक अलग संदेश जाएगा और उससे हमें बहुत ज्यादा मदद मिलेगी।'

बसपा से निकलने वालों की पहले पसंद क्यों बन रहे हैं अखिलेश ?

बसपा से निकलने वालों की पहले पसंद क्यों बन रहे हैं अखिलेश ?

हैरानी की वजह है कि दशकों तक बीएसपी में 'चूं' तक नहीं बोलने वाले पूर्व नेताओं ने जब बहनजी के खिलाफ जुबान खोलनी शुरू की है तो अपनी भावनाएं खुलकर बयां करनी शुरू कर दी हैं। उदाहरण के लिए सपा में शामिल होने वाले बीएसपी के एक पूर्व विधायक ने कहा है, 'बीएसपी में मेरे 25 साल रहने के दौरान, मैं एकबार भी बहनजी से नहीं मिला। मैं उनके साथ एक कप चाय नहीं पी। मेरा उनके साथ एक तस्वीर तक नहीं हैं, लेकिन पिछले दो महीने में अखिलेश यादव से मैं 5 बार मिल चुका हूं। सम्मान मायने रखता है।'

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