लोकसभा उपचुनाव: अखिलेश यादव ने रामपुर-आजमगढ़ में चुनाव प्रचार से क्यों बनाई दूरी, जानिए इसकी वजहें

लखनऊ, 21 जून: उत्तर प्रदेश में आजमगढ़ और रामपुर लोकसभा उपचुनाव के लिए प्रचार का मंगलवार को आखिरी दिन था। सीएम योगी आदित्यनाथ ने रामपुर और आजमगढ़ दोनों जगहों पर चुनावी जनसभाओं को संबोधित किया वहीं दूसरी ओर सबसे बड़े विपक्षी दल समाजवादी पार्टी के सबसे बड़े नेता अखिलेश यादव पूरे उपचुनाव से नदारद रहे। अखिलेश यादव न तो रामपुर गए और न आजमगढ़। राजनीतिक पंडितों की माने तो इसके पीछे मुख्य कारण यह है कि आजमगढ़ में जहां जातिगत समीकरण उपर उन्हें भरोसा है वहीं दूसरी ओर रामपुर में वह आजम के पॉलिटिक्स और पॉवर की थाह लेना चाहते हैं।

आजमगढ़ की पांचों सीटें सपा के पास

आजमगढ़ की पांचों सीटें सपा के पास

दरअसल आजमगढ़ में चुनाव प्रचार नहीं करने के पीछे सबसे बड़ी वजह इस लोकसभा सीट का जातिगत समीकरण है। आजमगढ़ लोकसभा सीट पर उपचुनाव हो रहा है. इस लोकसभा क्षेत्र में 5 विधानसभा सीटें हैं: गोपालपुर, सगड़ी, मुबारकपुर, आजमगढ़ और मेहनगर। इन विधानसभाओं को मिलाकर आजमगढ़ लोकसभा सीट का गठन किया गया है। इस लोकसभा क्षेत्र में करीब 17 लाख मतदाता हैं, करीब 3 लाख 75 हजार यादव, 3 लाख ऊंची जाति के मतदाता, 2 लाख 50 हजार मुस्लिम, करीब 2 लाख 50 हजार दलित, राजभर के मतदाताओं की संख्या भी करीब 2 लाख हैं। अन्य पिछड़ी जातियों के मतदाता करीब 3 लाख मतदाता हैं।

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    अखिलेश को MY फैक्टर पर भरोसा?

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    यादव और मुस्लिम इस लोकसभा सीट पर जीत के सबसे बड़े कारक हैं। अखिलेश यादव की ताकत यही कोर वोट बैंक है। इसी के आधार पर अखिलेश यादव ने आजमगढ़ लोकसभा को अपना माना है. पिछले कुछ लोकसभा चुनाव और 2022 के विधानसभा चुनाव के नतीजों के रुझान पर गौर करें तो अखिलेश यादव के लिए यह सीट जीतना कोई मुश्किल काम नहीं है। समाजवादी पार्टी ने 2022 के विधानसभा चुनाव में आजमगढ़ जिले की सभी 10 सीटों पर जीत हासिल की थी। 2014 से अखिलेश यादव के इस्तीफे तक आजमगढ़ लोकसभा सीट समाजवादी पार्टी के पास थी।

    रामपुर से भी बनाई दूरी

    रामपुर से भी बनाई दूरी

    अखिलेश यादव रामपुर क्यों नहीं गए, यह समझने के लिए समाजवादी पार्टी की राजनीति को मुलायम सिंह यादव के जमाने से समझना होगा. मुलायम सिंह यादव की विशेषता यह थी कि उनके साथ ब्राह्मण, क्षत्रिय, कुर्मी, मुस्लिम लगभग हर जाति वर्ग के नेता थे। मुलायम सिंह के बारे में कहा जाता है कि वह जमीन से नेता हैं। किसी भी कार्यकर्ता से कभी भी मिल जाया करते थे, लेकिन अखिलेश यादव के साथ मामला कुछ और ही है. अखिलेश यादव की पूरी राजनीति जातिगत समीकरणों पर है, खासकर मुसलमानों और यादवों पर। वह केवल यादवों के नेता बनने की ओर बढ़ रहे हैं।

    चुनाव में आजम की प्रतिष्ठा दांव पर

    चुनाव में आजम की प्रतिष्ठा दांव पर

    अखिलेश यादव रामपुर नहीं गए क्योंकि उन्होंने उपचुनाव की पूरी जिम्मेदारी आजम खान को सौंप दी है। यहां प्रत्याशी समाजवादी है लेकिन प्रतिष्ठा आजम खां की दांव पर है। चुनाव जीते तो आजम खान की जीत होती है और अगर हार जाती है तो आजम खान की हार होती है। अखिलेश यादव न तो इसका श्रेय लेना चाहते हैं और न ही हार का दोष अपने ऊपर लेना चाहते हैं। भले ही रामपुर में समाजवादी उम्मीदवार असीम राजा हैं, लेकिन यहां फैसला आजम खान के राजनीतिक भविष्य का होगा। अगर समाजवादी पार्टी जीतती है तो आजम खान पार्टी में दूसरे नंबर पर होंगे और हारने पर उनकी स्थिति शिवपाल यादव की हो सकती है।

    आजम की पॉवर और पालिटिक्स की थाह लेना चाहते हैं अखिलेश

    आजम की पॉवर और पालिटिक्स की थाह लेना चाहते हैं अखिलेश

    इस समय समाजवादी पार्टी में ऐसा कोई नेता नहीं है जो अखिलेश यादव के किसी फैसले पर सवाल उठा सके या उनसे पूछ सके कि आपने यह फैसला क्यों लिया? अखिलेश यादव इस स्थिति को बनाए रखना चाहते हैं। समाजवादी पार्टी में आजम खान एकमात्र नेता हैं जो पार्टी में अखिलेश यादव के फैसलों को चुनौती दे सकते हैं। यह तभी संभव होगा जब आजम खान के प्रत्याशी रामपुर लोकसभा उपचुनाव में जीत हासिल करेंगे। उपचुनाव के बहाने ही वह रामपुर में आजम की पॉवर और पालिटिक्स की थाह लेना चाहते हैं।

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