शिलाओं का उत्तर प्रदेश: सपा सरकार में भी 'पत्थरों की धूम

उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर अब सीएम अखिलेश यादव भी अपनी 'बुआ' की तरह पत्थरों का सहारा ले रहे हैं।

लखनऊ। सच यही है..सियासी पार्टियों का मकसद एक होता है, कुर्सी..कुर्सी और कुर्सी। अब उत्तर प्रदेश सूबे के मुखिया या कहें सीएम अखिलेश यादव को ही लीजिए, करीब पांच साल अपनों से ही जूझते जूझते गुजार दिए।

मौका फिर से जनादेश हासिल करने का आया तो इसी कुर्सी की चाहत ने इन्हें भी उन्हीं 'पत्थरों' के मोहजाल में उलझा दिया, जिन पत्थरों से अपनी सबसे बड़ी प्रतिद्वंदी 'बुआ' यानि बहुजन समाज पार्टी सुप्रीमो मायावती पर प्रहार करके लगभग पांच साल पहले सत्ता का स्वाद चखा था।

वर्ष 2017 की चुनावी जंग में एक बार फिर पत्थर ही कुर्सी की लड़ाई में निर्णायक होते दिखने वाले हैं।

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इसके सहारे सत्ता पर काबिज हुए अखिलेश!

इसके सहारे सत्ता पर काबिज हुए अखिलेश!

अभी वर्ष 2012 की ही तो बात है, जब यूपी विधानसभा के चुनावी समर में सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव से लेकर खुद रथ पर सवार अखिलेश यादव और उनके स्टार प्रचारक छोटी बड़ी चुनावी सभाओं में राजधानी लखनऊ के अंबेडकर पार्क में लगे 'पत्थर' के हाथियों की उपयोगिता और जनता के पैसे का दुरुपयोग का हवाला देते हुए बसपा नेत्री मायावती पर शब्दवाणों के सहारे सत्ता पर काबिज हुए थे।

मायावी हाथी बड़ी वजह!

मायावी हाथी बड़ी वजह!

हालांकि राजनीतिक विशलेषकों का आज भी यही मानना है कि पिछले विधानसभा चुनाव में सपा को मिले बहुमत के पीछे 'मायावी हाथी' भी एक बहुत बड़ी वजह रही थी।

फिर से बढ़ने लगी पत्थरों की कीमत

फिर से बढ़ने लगी पत्थरों की कीमत

इसके ठीक उलट इस बार के 2017 विधानसभा चुनाव में भी पत्थरों की उपोगिता भी एकाएक बढ़ती सी दिखने लगी है। यह बात और है कि इस बार 'पत्थरों' की आकृति और उनका आकार बदला बदला सा है। बीते चुनाव में बेशकीमती 'पत्थर' के हाथियों का राजनीतिक लाभ हासिल करने से चूकीं मायावती आज भी इन्हीं वजह से अपने विरोधियों के निशाने पर बनी हैं।

तीन सौ से अधिक परियोजनाओं का शिलान्यास

तीन सौ से अधिक परियोजनाओं का शिलान्यास

वहीं सीएम अखिलेश अपना ही नाम लिखे सैकड़ों बेजान 'पत्थरों के सहारे दूसरी पारी के प्रति खासे आशान्वित और उल्लास से भरे नजर आने लगे हैं। यदि आंकड़ों पर नजर डालें तब एक जानकारी के मुताबिक सीएम अखिलेश प्रदेश भर में पिछले करीब तीन माह में तीन सौ से पांच सौ छोटी-बड़ी परियोजनाओं के शिलान्यास, लोकापर्ण और आधारशिलाएं रख चुके हैं।

अच्छा तो ये है वजह!

अच्छा तो ये है वजह!

यही वजह है कि एक्सप्रेस-वे, लखनऊ मैट्रो से लेकर तमाम अधूरी परियोजनाओं का फीता काटकर वह स्वंय को विकास का मुख्यमंत्री साबित करने की दिन रात जुगत में लगे हैं।

विरोधी दल कहीं मुद्दा ना बना लें!

विरोधी दल कहीं मुद्दा ना बना लें!

इतना ही नहीं सीएम अखिलेश यादव की हर दिन बदलती 'बाडी लैंग्वेज' से इतना तो स्पष्ट है कि उनके दरा लगभग हर रोज होने वाले लोकापर्णो के बीच गूंजने वाली तालियों की करतल ध्वनि उनके आत्मविश्वास को दूना कर रही है लेकिन पार्टी के भीतर ही एक खेमा इस बात को लेकर भी खासा आशंकित है कि कहीं ज्यादातर अधूरी परियोजनाओं के लोकापर्ण के इन्हीं 'पत्थरों' को सपा के विरोधी दल लपककर चुनावी मुद्दा ना बना लें।

मुख्यमंत्री को हिसाब देना होगा!

मुख्यमंत्री को हिसाब देना होगा!

ऐसे में अपने ही हाथियों से जख्मी मायावती के साथ साथ भाजपा भी चुनावी सभाओं में सपा और उसके मुख्यमंत्री इन 'पत्थरों' का हिसाब तो मांग ही सकते हैं। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष केशव मौर्या का स्पष्ट कहना है कि वक्त आने दीजिए, मुख्यमंत्री जी को पाई पाई का हिसाब तो देना होगा।

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