किसानों को सबने ठगा, राजनीतिक दलों का आईना दिखाती 42 वर्ष से अधूरी सरयू नहर परियोजना
Farmer's protest and Saryu Canal Project लखनऊ। किसानों के नाम पर पूरे देश में बवाल मचा हुआ है। कोई किसानों के पक्ष में तो कोई उनके विरोध में है। राजनीतिक दल भी एकमत नहीं हैं। किसान आन्दोलन को खालिस्तानी, आतंकवादी और भी न जाने क्या-क्या उपाधियां मिल चुकी हैं। विरोधी दल सोशल मीडिया के माध्यम से किसान आन्दोलन को समर्थन दे रहे हैं तो केंद्र सरकार कह रही है कि किसान आन्दोलन निरर्थक है। सरकार उनके साथ है। उनके हितों के लिए ही नया कानून लाया गया है। ऐसे में किसान के हितों के लिए लड़ने का दावा करने वाले सभी राजनीतिक दलों के वायदे-इरादे को सरयू नहर परियोजना आईना दिखाती है जिसमें सब कुछ बहुत साफ़-साफ़ देखा जा सकता है। किसान सभी के लिए वोट हैं। जनता के पैसों का सरकारें और अफसर खुला दुरुपयोग करते हैं। आप खुद पढ़कर सच्चाई को जान और महसूस कर सकते हैं।

1978 में शुरू हुई लेकिन अभी भी अधूरी नहर परियोजना
उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले से वर्ष 1978 में सरयू नहर परियोजना की शुरुआत हुई। लागत तय हुई 48 करोड़। इस महत्वाकांक्षी नहर से राज्य के कुल दस जिलों के किसानों को लाभ मिलना था। मतलब उनके खेतों को भरपूर पानी सिंचाई के लिए उपलब्ध होना था। लाभ पाने वाले जिले बेहद पिछड़े हैं और यहां किसानों की जोत भी बहुत कम है। मतलब गरीब भी हैं यहां के ज्यादातर किसान।10 हजार करोड़ खर्च, 10 जिलों को मिलना था फायदा। बीते 42 वर्षों में इस परियोजना पर 48 करोड़ की जगह 10 हजार करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं, पर परियोजना है कि आज भी अधूरी है। 34 वर्ष तक यह परियोजना राज्य की थी और वर्ष 2012 में इसे राष्ट्रीय सिंचाई परियोजना घोषित किया गया फिर भी गति लगभग वैसी की वैसी है। इन 42 वर्षों में उत्तर प्रदेश में सक्रिय सभी राजनीतिक दलों ने दो से चार बार तक सरकारें बना ली। सभी दल किसानों के हितैषी भी कहते रहे। पर, परियोजना आज भी हिचकोले खा रही है। यह परियोजना पूरी होती तो बहराइच, गोंडा, बलरामपुर, श्रावस्ती, बस्ती, सिद्धार्थनगर, संतकबीरनगर, महराजगंज एवं गोरखपुर तक के किसानों को लाभ मिलता।

31 सौ किलोमीटर बननी है नहर
परियोजना के मूल प्लान के मुताबिक कुल 31 सौ किलोमीटर नहर का निर्माण होना था। इसमें बड़ी नहरें, छोटी नहरें, कुलाबे आदि के माध्यम से सभी दस जिलों के किसानों के खेतों तक लाभ पहुंचाना था। परियोजना के तहत कई पुरानी नहरों को भी इसका हिस्सा बना दिया गया और ग्रामीणों को लगा कि अब उन्हें हमेशा पानी मिलेगा, पर उनके अरमान हवा हो गए। संतकबीरनगर जिले में बखिरा झील से निकलने वाली एक छोटी सी नहर भी इसका हिस्सा बनी। नहर को चौड़ा किया गया। कच्ची पटरियां पक्की सड़क में तब्दील हो गयीं। झील का पानी आना बंद हो गया और सरयू नहर का पानी वर्षों से नहीं पहुँचा। छोटे-छोटे किसान अब बारिश या अपने ट्यूबवेल के सहारे हैं। अब नहर में झाड़ियां उग आई हैं। निश्चित ही इसकी सफाई के नाम पर भी रकम खर्च की जाएगी।सहज कल्पना की जा सकती है कि जो भी अधिकारी-कर्मचारी इस नहर के शिलान्यास का हिस्सा बने होंगे, सबके सब रिटायर हो चुके होंगे। कई तो दुनिया में भी नहीं होंगे। गोंडा, बहराइच में एक किस्सा आम है। वहां के लोग व्यंग्य करते हुए कहते हैं-सरयू नहर बनी चाहे नहीं बनी लेकिन लखनऊ में गोमतीनगर जरुर बस गया। उल्लेख जरूरी है कि गोमतीनगर लखनऊ शहर की महत्वपूर्ण आवासीय कालोनी है और कोई भी महत्वपूर्ण व्यक्ति यहां कोठी बनाकर खुश होता है।

कई बार बंद और शुरू हुई परियोजना
ऐसा भी नहीं है कि नेताओं ने कुछ नहीं किया। किया और बहुत कुछ किया। उनकी ही कृपा से परियोजना पांच बार बंद और फिर शुरू हुई। सबसे पहले सरयू नहर परियोजना वर्ष 1980 में बंद हुई और 1982 में फिर शुरू हुई। वर्ष 1987 में फिर बंद हो गयी। अगले वर्ष यानी 1988 में फिर चालू हो गयी। फिर 1996 में बंद हुई। एक बार फिर चालू होकर वर्ष 2007 में फिर बंद हो गयी। वर्ष 2009 में फिर इस पर ग्रहण लगा। वर्ष 2012 में इसे राष्ट्रीय सिंचाई परियोजना का हिस्सा बनाकर पांच वर्ष में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया। जब काम नहीं पूरा हुआ तो सरकारों ने दो वर्ष के लिए फिर बढ़ा दिया। काम अभी भी पूरा नहीं हुआ है। हालांकि अफसरों की मानें तो अब कुछ ख़ास काम नहीं बाकी है। पर, कोई भी व्यक्ति इन जिलों में दौरा करके इस महत्वपूर्ण परियोजना की सच्चाई जान सकता है। नहरें सूखी पड़ी हैं।
कागजी दावे: हजारों हेक्टेयर में हो रही सिंचाई
सरकारी कागजों में कितना दम है, इसका अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि ये अफसर अधूरी परियोजना से भी हजारों हेक्टेयर फसलों की सिंचाई भी शुरू कर दी है। आंखों में धूल झोंकने वाली इस रिपोर्ट पर किसी भी जिम्मेदार का ध्यान नहीं है क्योंकि उन्हें सरकारी खजाने से भरपूर तनख्वाह मिल रही है। बाकी सरकारी महकमों में कमीशनखोरी किसी से नहीं छिपी है। बावजूद इसके सत्तारूढ़ भाजपा, कांग्रेस, सपा, बसपा और बाकी छुटभैय्ये दल भी कागज में किसानों के हितैषी हैं। उनके लिए संघर्ष कर रहे हैं। लेकिन यह अकेली परियोजना इनके वायदे-इरादों को बेनकाब करती है।
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