Sambhal Violence: 22 आरोपियों को इलाहाबाद हाई कोर्ट से राहत, कार्रवाई पर क्यों लगी रोक? क्या दलील दी?
Sambhal Violence: उत्तर प्रदेश के संभल में शाही जामा मस्जिद सर्वे (Shahi Jama Masjid Survey) को लेकर नवंबर 2024 में हुई हिंसा एक बार फिर चर्चा में है। इस मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 22 आरोपियों को अंतरिम राहत देते हुए उनके खिलाफ चल रही आपराधिक कार्रवाई पर फिलहाल रोक लगा दी है। कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार और अन्य पक्षों से जवाब भी मांगा है।
यह आदेश ऐसे समय आया है जब संभल हिंसा से जुड़े मामलों की जांच और न्यायिक प्रक्रिया लगातार आगे बढ़ रही है। हाई कोर्ट के इस फैसले ने न सिर्फ आरोपियों को राहत दी है, बल्कि पूरे मामले को लेकर कानूनी बहस भी तेज कर दी है।

क्या है हाई कोर्ट का ताजा आदेश?
इलाहाबाद हाई कोर्ट की जस्टिस वाणी रंजन अग्रवाल की पीठ ने 22 आरोपियों की याचिका पर सुनवाई करते हुए उनके खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही पर अंतरिम रोक लगा दी। अदालत ने राज्य सरकार और अन्य संबंधित पक्षों को अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।
कोर्ट ने मामले को चार सप्ताह बाद दोबारा सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है। अपने आदेश में अदालत ने कहा कि पहली नजर में मामला विचार योग्य प्रतीत होता है, इसलिए अंतिम निर्णय होने तक आगे की कार्रवाई पर रोक लगाना उचित होगा।
आरोपियों ने किस आधार पर दी चुनौती?
22 आरोपियों ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 528 के तहत हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। यह धारा हाई कोर्ट को अपनी अंतर्निहित शक्तियों का इस्तेमाल करने का अधिकार देती है, ताकि न्याय के हित में उचित आदेश पारित किए जा सकें।
याचिकाकर्ताओं ने 20 फरवरी 2025 और 15 मई 2025 को पारित उन आदेशों को भी चुनौती दी, जिनके जरिए ट्रायल कोर्ट ने उनके खिलाफ संज्ञान लिया था और आगे की प्रक्रिया शुरू की थी।
आरोपियों का कहना है कि उनके खिलाफ दर्ज मुकदमा तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों के उचित परीक्षण के बिना आगे बढ़ाया गया। उनका दावा है कि केस में उनके खिलाफ पर्याप्त और ठोस सबूत मौजूद नहीं हैं।
वकीलों ने कोर्ट में क्या दलील दी?
सुनवाई के दौरान आरोपियों की ओर से पेश वकीलों ने अदालत को बताया कि 24 नवंबर 2024 को दर्ज एफआईआर झूठे और निराधार आरोपों पर आधारित है। उनका कहना था कि मामला दुर्भावनापूर्ण तरीके से दर्ज किया गया और इसका उद्देश्य केवल आरोपियों को परेशान करना था।
याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी कहा गया कि कई आरोपियों के नाम कुछ वीडियो फुटेज के आधार पर जोड़े गए हैं। हालांकि, ऐसा कोई ठोस इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि वे कथित हिंसा में सीधे तौर पर शामिल थे।
वकीलों ने कोर्ट का ध्यान एक अन्य मामले की ओर भी दिलाया। उन्होंने बताया कि इसी प्रकरण में हाई कोर्ट की एक समन्वय पीठ ने 13 मई 2026 को चार अन्य आरोपियों के खिलाफ चल रही कार्रवाई पर भी रोक लगाई थी। इसलिए वर्तमान याचिका में भी समान राहत दी जानी चाहिए।
मामला दर्ज कैसे हुआ था?
यह केस एक सब-इंस्पेक्टर की शिकायत के आधार पर संभल के थाना शहर क्षेत्र में दर्ज किया गया था। पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS), सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने से संबंधित कानून और आर्म्स एक्ट की विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज किया था।
जांच एजेंसियों का आरोप है कि हिंसक प्रदर्शन के दौरान सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया, पुलिस और सुरक्षा बलों पर हमला किया गया तथा कानून-व्यवस्था को गंभीर चुनौती दी गई।
क्या है शाही जामा मस्जिद सर्वे विवाद?
संभल का यह मामला एक स्थानीय अदालत के आदेश से शुरू हुआ था। एक हिंदू पक्षकार ने अदालत में दावा किया था कि जिस स्थान पर वर्तमान में शाही जामा मस्जिद मौजूद है, वहां पहले हरिहर मंदिर था। याचिका में ऐतिहासिक और धार्मिक दावों के आधार पर सर्वे की मांग की गई थी।
स्थानीय अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान मस्जिद परिसर के सर्वे का आदेश दिया। इसके बाद सर्वेक्षण की प्रक्रिया शुरू हुई, जिसने पूरे क्षेत्र में राजनीतिक और सामाजिक बहस को जन्म दिया।
सर्वे के पहले चरण के बाद दूसरा चरण आयोजित किया गया। इसी दौरान बड़ी संख्या में लोग विरोध प्रदर्शन के लिए एकत्र हुए और हालात अचानक तनावपूर्ण हो गए।
24 नवंबर 2024 को क्या हुआ था?
24 नवंबर 2024 को सर्वे के दूसरे दौर के दौरान स्थिति हिंसक हो गई। प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच टकराव हुआ। देखते ही देखते पथराव, आगजनी और हिंसा की घटनाएं सामने आने लगीं।
पुलिस के अनुसार, भीड़ ने सुरक्षा व्यवस्था को तोड़ने की कोशिश की, जबकि प्रदर्शनकारियों का आरोप था कि उनकी भावनाओं की अनदेखी की जा रही थी। दोनों पक्षों के बीच टकराव इतना बढ़ गया कि पूरे इलाके में भारी तनाव फैल गया।
हिंसा में चार लोगों की मौत हो गई थी, जबकि कई पुलिसकर्मी और आम नागरिक घायल हुए थे। इसके बाद प्रशासन ने क्षेत्र में अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात किए और हालात को नियंत्रण में लाने के लिए व्यापक अभियान चलाया।
हिंसा के बाद कितनी एफआईआर दर्ज हुईं?
संभल हिंसा के बाद पुलिस ने अलग-अलग घटनाओं को आधार बनाकर कुल 12 एफआईआर दर्ज की थीं। इनमें हत्या, दंगा, सरकारी कार्य में बाधा, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और हथियारों के इस्तेमाल जैसे गंभीर आरोप शामिल किए गए।
पुलिस ने कई लोगों को गिरफ्तार किया और बड़ी संख्या में संदिग्धों की पहचान के लिए वीडियो फुटेज, सीसीटीवी रिकॉर्डिंग और अन्य तकनीकी साक्ष्यों का सहारा लिया।
इन्हीं मामलों में से एक एफआईआर के तहत 22 आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई चल रही थी, जिस पर अब हाई कोर्ट ने अंतरिम रोक लगा दी है।
हाई कोर्ट की रोक का क्या मतलब है?
यह समझना जरूरी है कि हाई कोर्ट ने फिलहाल केवल कार्रवाई पर रोक लगाई है, मामले को पूरी तरह खत्म नहीं किया है। इसका मतलब यह है कि जब तक अदालत इस याचिका पर अंतिम फैसला नहीं देती, तब तक संबंधित आरोपियों के खिलाफ ट्रायल या अन्य न्यायिक कार्रवाई आगे नहीं बढ़ेगी।
अदालत अब राज्य सरकार और अन्य पक्षों के जवाब का इंतजार करेगी। इसके बाद दोनों पक्षों की दलीलें सुनकर यह तय किया जाएगा कि केस को जारी रखा जाए या याचिकाकर्ताओं को और राहत दी जाए।
आगे क्या होगा?
अब इस मामले में अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद होगी। राज्य सरकार को अपना पक्ष रखने का अवसर मिलेगा। यदि सरकार आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य होने का दावा करती है, तो अदालत उन साक्ष्यों की जांच करेगी।
दूसरी ओर, याचिकाकर्ता यह साबित करने की कोशिश करेंगे कि उनके खिलाफ दर्ज मुकदमा कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है और उन्हें गलत तरीके से आरोपी बनाया गया है।
फिलहाल इतना तय है कि संभल हिंसा और शाही जामा मस्जिद सर्वे से जुड़ा यह मामला आने वाले समय में भी कानूनी, राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर चर्चा का केंद्र बना रहेगा।













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