Sambhal में मस्जिद पर चला बुलडोजर, मलबे में 'I Love Muhammad' की गूंज, 8 पर केस दर्ज-सपा सांसद ने क्या कहा?

Sambhal Mosque Demolition: उत्तर प्रदेश के संभल जिले में प्रशासन द्वारा एक कथित अवैध मस्जिद के ध्वस्तीकरण के दौरान 49 'आई लव मुहम्मद' लिखे पोस्टर और पाकिस्तान के झंडे जैसा हरा झंडा मिलने के बाद नया विवाद खड़ा हो गया है। पुलिस ने मुतवल्ली समेत आठ लोगों के खिलाफ बीएनएस की धारा 353(2) (सार्वजनिक अशांति फैलाने वाले बयान) के तहत मामला दर्ज किया है। इस घटना ने एक बार फिर अतिक्रमण हटाने, धार्मिक स्थलों और अभिव्यक्ति की आजादी के मुद्दे को सुर्खियों में ला दिया है।

यह मामला सिर्फ एक मस्जिद के तोड़ने का नहीं, बल्कि जमीन के कानूनी दावे, अदालती प्रक्रिया, पोस्टरों की बरामदगी और विपक्षी राजनीति का मिश्रण है। आइए इस पूरे मामले को विस्तार से समझते हैं...

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6 जून को संभल के नखासा थाना क्षेत्र के कसेरुआ गांव में स्थित मुस्तफा कादरी मस्जिद पर प्रशासन ने बुलडोजर कार्रवाई शुरू की। प्रशासन का दावा है कि यह मस्जिद कब्रिस्तान के लिए आरक्षित सरकारी जमीन (लगभग 1200 वर्ग मीटर) पर अवैध रूप से बनाई गई थी। ध्वस्तीकरण के दौरान मस्जिद की ऊपरी मंजिल के मुख्य हॉल में एक तख्त के गद्दे के नीचे से A4 साइज के 49 पोस्टर बरामद हुए, जिन पर अंग्रेजी और उर्दू में 'आई लव मुहम्मद' लिखा था। साथ ही एक हरा झंडा भी मिला, जिसे पुलिस ने पाकिस्तान के झंडे जैसा बताया।

7 जून को पुलिस ने इसकी पुष्टि की और मुतवल्ली जाकिर समेत आठ लोगों जाकिर हुसैन, तसलीम, भूरे अली, शरफुद्दीन, दिल शरीफ और मोहब्बत अली के खिलाफ केस दर्ज किया। अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (उत्तर) कुलदीप सिंह ने बताया कि जांच चल रही है।

प्रशासन का पक्ष: पूरी तरह कानूनी कार्रवाई

जिला मजिस्ट्रेट अंकित खंडेलवाल और एसपी कृष्ण कुमार बिश्नोई ने स्पष्ट किया कि कार्रवाई रेवेन्यू कोर्ट के आदेश के बाद हुई।

  • तहसीलदार कोर्ट ने 21 अप्रैल को बेदखली का आदेश दिया था।
  • मस्जिद कमेटी ने डीएम कोर्ट में अपील की, लेकिन सबूत पेश नहीं कर पाई।
  • अपील खारिज होने के बाद भारी पुलिस बल की तैनाती में ध्वस्तीकरण किया गया।

प्रशासन का कहना है कि यह कोई धार्मिक कार्रवाई नहीं, बल्कि अवैध अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया है। जिले में सरकारी जमीन पर ऐसे कई अतिक्रमण हटाए जा रहे हैं।

SP MP Ziaur Rahman Barq का विरोध

समाजवादी पार्टी के संभल सांसद जियाउर रहमान बर्क ने इस कार्रवाई को 'गैर-कानूनी' और 'जुल्म' बताया। पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने कहा कि कसेराऊ मस्जिद में 'आई लव मुहम्मद' लिखे पोस्टर और एक हरा झंडा मिला। मेरे पास भी ऐसे पोस्टर हैं और मैं भी हरा झंडा रख सकता हूं। इसके लिए वे मेरे खिलाफ किस तरह का मामला दर्ज करेंगे? बर्क ने दावा किया कि मस्जिद करीब 150 साल पुरानी है और 1995 से उत्तर प्रदेश गजट में वक्फ संपत्ति के रूप में दर्ज है (1951 नंबर पर)। उन्होंने कहा कि वे कोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगे और पूछा कि 'आई लव मुहम्मद' कहने या हरा झंडा रखने से कौन सी धारा का उल्लंघन होता है? 'अगर मैं अपने अल्लाह और पैगंबर से प्यार करता हूं तो कौन सी धारा लागू होगी?'

'आई लव मुहम्मद' पोस्टर: धार्मिक भावना या सार्वजनिक अशांति?

पोस्टरों की बरामदगी सबसे विवादास्पद मुद्दा बन गई है। मुस्लिम समुदाय का एक वर्ग इसे धार्मिक भावना से जोड़ रहा है। पैगंबर मुहम्मद (सल्ल.) से मुहब्बत जताना इस्लाम में सामान्य है। कई लोग इसे व्यक्तिगत आस्था का हिस्सा मानते हैं।

दूसरी ओर, पुलिस का तर्क है कि ये पोस्टर मस्जिद के अंदर इस तरीके से रखे गए थे कि वे सार्वजनिक अशांति फैला सकते थे, खासकर जब कार्रवाई चल रही थी। धारा 353(2) BNS के तहत केस इसी आधार पर दर्ज हुआ है।

कानूनी पहलू क्या है? वक्फ एक्ट vs सरकारी जमीन

भारत में वक्फ संपत्तियां वक्फ बोर्ड के अधीन होती हैं। अगर मस्जिद 1995 गजट में दर्ज है, तो वक्फ बोर्ड का दावा मजबूत हो सकता है। लेकिन, प्रशासन कह रहा है कि जमीन कब्रिस्तान के लिए आरक्षित थी और मस्जिद अवैध निर्माण है। मस्जिद कमेटी सबूत नहीं दे पाई। वक्फ एक्ट के तहत विवादित संपत्तियों पर सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के कई फैसले हैं। आमतौर पर पुराने दस्तावेज और लगातार इस्तेमाल को मान्यता मिलती है। अगर बर्क अदालत गए, तो केस लंबा खिंच सकता है।

संभल के पिछले विवाद

संभल पहले भी सुर्खियों में रहा है कि 2024 के सर्वे और दंगे जैसे मुद्दों के कारण। इस क्षेत्र में हिंदू-मुस्लिम आबादी का संतुलन है और छोटी-छोटी घटनाएं राजनीतिक रंग ले लेती हैं। योगी सरकार के अतिक्रमण हटाओ अभियान में कई धार्मिक स्थल प्रभावित हुए हैं, जिसे विपक्ष 'मुस्लिम टारगेटिंग' बताता है।

तथ्य, कानून और संतुलन की जरूरत

संभल का यह मामला जटिल है। एक तरफ प्रशासन का दावा है कि अवैध निर्माण पर अदालती आदेश के बाद कार्रवाई। दूसरी तरफ विपक्ष का तर्क, पुरानी मस्जिद और धार्मिक भावनाओं का अपमान। पोस्टरों पर केस की जांच निष्पक्ष होनी चाहिए। अगर ये सिर्फ धार्मिक भावना जताते हैं, तो केस कमजोर पड़ सकता है। लेकिन अगर कोई उकसावा साबित होता है, तो कानूनी कार्रवाई जायज है।

भारतीय संविधान सभी को धर्म की आजादी देता है, लेकिन कोई भी कानून से ऊपर नहीं। वक्फ-सरकार विवादों का स्थायी समाधान सुप्रीम कोर्ट या विशेष ट्रिब्यूनल से निकल सकता है। फिलहाल संभल शांत है, लेकिन सोशल मीडिया और राजनीति इस आग को हवा दे रही है। उम्मीद है कि अदालत जल्द स्पष्टता लाएगी और दोनों पक्ष सबूतों पर बहस करेंगे, न कि भावनाओं पर।

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