सपा-कांग्रेस के साथ आते ही बीजेपी की बढ़ गई चुनौती, राज्यसभा चुनाव में कैसे बिगड़ गया गणित? जानिए
यूपी में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव के लिए सीटों का बंटवारा किया है। लेकिन, उससे पहले ही इंडिया ब्लॉक की वजह से भाजपा को राज्यसभा चुनाव में मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। पार्टी के आठवें उम्मीदवार संजय सेठ की जीत की संभावना का गणित बिगड़ने की आशंका है।
27 फरवरी को यूपी की 10 राज्यसभा सीटों के लिए चुनाव होने हैं। लेकिन, बीजेपी ने आठवें प्रत्याशी के तौर पर पूर्व सांसद संजय सेठ को उतारकर मतदान जरूरी बना दी है।

सपा-भाजपा दोनों के पास विधायकों की आवश्यक संख्या की कमी
अगर यूपी विधानसभा में मौजूदा समीकरण को देखें तो सपा और भाजपा दोनों के पास विधायकों की गिनती अपने दम पर कम पड़ रही है।
मौजूदा संख्या गणित के मुताबिक यूपी में राज्यसभा के प्रत्येक उम्मीदवार के पक्ष में 37 विधायकों के समर्थन की जरूरत है। सपा को अपने तीनों उम्मीदवारों जया बच्चान, आलोक रंजन और रामजी लाल सुमन की जीत सुनिश्तित करने के लिए 111 एमएलए के समर्थन की आवश्यकता पड़ेगी।
लेकिन, समाजवादी पार्टी के पास अपने 108 और कांग्रेस के 2 विधायक मिलाकर कुल 110 एमएलए हैं। सपा के दो विधायक रमाकांत यादव और इरफान सोलंकी आपराधिक मामलों में जेल में पड़े हैं। मतलब इनकी संख्या घटकर सिर्फ 108 रह जाती है। मतलब, इन्हें 3 और विधायकों का जुगाड़ करना है।
बीजेपी का आंकड़ा सपा से कमजोर
लेकिन, अगर बीजेपी के संख्या गणित को देखें तो वह आवश्यक आंकड़े से ज्यादा पीछे छूटती नजर आ रही है। भाजपा को अपने आठों उम्मीदवारों को संसद के ऊपरी सदन पहुंचाने के लिए 296 विधायकों के समर्थन की आवश्यकता है।
भाजपा के पास अपने 252 विधायक हैं। इसके अलावा अपना दल (सोनेलाल) के 13, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (SBSP) के 6 को मिलाकर आंकड़ा पहुंच जाता है 277 विधायकों का। लेकिन यहां भी एसबीएसपी के एक विधायक अब्बास अंसारी अभी जेल में बंद हैं। तो आंकड़ा घटकर 276 रह जाता है।
लेकिन, हाल ही में आरएलडी ने भाजपा के पक्ष में रुख मोड़ लिया है, जिसके 10 विधायकों के समर्थन से कुल विधायकों की संख्या 286 तक पहुंच जाती है। लेकिन, आवश्यकता से यह फिर भी यह 10 विधायक पीछे है।
बसपा के एक विधायक मतदान से रह सकते हैं दूर
एक चर्चा ये है कि बसपा के एकमात्र एमएलए उमा शंकर सिंह मतदान से गैर-हाजिर रह सकते हैं। ऐसा होने पर भी भाजपा से ज्यादा सपा आवश्यक संख्या गणित के नजदीक पहुंच सकती है।
सपा के पक्ष में बदला एक और समीकरण
सपा की एक और समर्थक दल है अपना दल (कमेरावादी)। इसकी विधायक पल्लवी पटेल ने पहले सपा उम्मीदवारों के नाम देखकर ही अखिलेश यादव के खिलाफ मोर्चा खोला था और पीडीए की अनदेखी करने की वजह से उनके उम्मीदवारों को वोट नहीं देने की बात कही थी।
लेकिन, सपा-कांग्रेस में गठबंधन होने के बाद उनका सुर भी बदल गया है और अब वह कहने लगी हैं कि अखिलेश यादव तो उनके बड़े भाई हैं। इससे भी समाजवादी पार्टी का पलड़ा, बीजेपी पर भारी पड़ता नजर आ रहा है और हो सकता है कि मतदान के दिन तक वह अपने फैसले पर पुनर्विचार को तैयार हो जाएं।
राजा भैया के पास 'आखिरी' ताले की चाबी!
अब सारा दारोमदार जनसत्ता दल-लोकतांत्रिक के नेता रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया के फैसले पर है। पार्टी के दो विधायक हैं। कुंडा से खुद राजा भैया हैं और बाबागंज से विनोद सरोज हैं।
जानकारी के मुतबिक सपा और भाजपा दोनों ही पार्टियां अंदर ही अंदर उन्हें मनाने में लगे हैं। अखिलेश तो अपने प्रदेश अध्यक्ष नरेश उत्तम पटेल को उनसे मिलने के लिए प्रतापगढ़ तक भेज चुके हैं। कहा जाता है कि खुद अखिलेश यादव की राजा भैया से बात हो चुकी है।
ऐसे में संख्या गणित फिलहाल बीजेपी से ज्यादा सपा के पक्ष में झुका हुआ महसूस हो रहा है और अगर समाजवादी पार्टी के तीनों उम्मीदवार राज्यसभा का चुवाव जीत गए तो भाजपा के आठवें उम्मीदवार वाला रणनीतिक दांव फेल कर जाएगा और यह लोकसभा चुनाव से पहले बड़ा झटका होगा।












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