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स्टिंग ऑपरेशन से उजागर हुआ मुजफ्फरनगर दंगों का सच- सब पॉलिटिकल स्टंट था

लखनऊ। मुजफ्फरनगर दंगों की आग में जल रहा था, किचन में तवे पर रोटियां छोड़कर महिलाएं अपने मासूम बच्‍चों को सीने से लगाये इधर-उधर भाग रहीं थी, सड़कों का रंग-नहरों में बहने वाला बेरंग पानी लाल हो चुका था और मौत की चींखे मुजफ्फरनगर को अपने आगोश में ले चुकी थीa मगर राजधानी लखनऊ में बैठे आला अधिकारियों को कोई फर्क तक नहीं पड़ा। लखनऊ में फोन की घंटियां बजने लगी और जवाब मिला कि ''जो हो रहा है होने दो''।

इतना ही नहीं दंगा की आग में राजनीतिक प्रेशर ने पुलिस के हाथ बांध दिये। ये बात हम नहीं बल्कि खुद वो पुलिसवाले कह रहे हैं जिन्‍हें दंगे पर कार्रवाई के आदेश नहीं मिले। मंगलवार को न्‍यूज चैनल आजतक ने स्टिंग ऑपरेशन (ऑपरेशन दंगा) के माध्‍यम से दंगे की सच्‍चाई को उजागर किया तो पूरे सूबे में खलबली मच गई। न्‍यूज चैनल पर ये ऑपरेशन 2 घंटे तक चला और इन्‍हीं 2 घंटों के बीच मामले से जुड़े पुलिसकर्मियों को या तो लाइन हाजिर कर दिया गया या फिर उनका तब्‍दला क्राइम ब्रांच में कर दिया गया।

स्‍टिंग ऑपरेशन की बात करें तो खुफिया कैमरे में सीओ जानसठ जगतराम जोशी और एसडीएम आरसी त्रिपाठी के अलावा एसपी क्राइम कल्पना सक्सेना, एसओ फुगाना आरएस भगौर, एसओ शाहपुर सत्यप्रकाश सिंह, एसएचओ भोपा समरपाल सिंह, एसएचओ मीरापुर एके गौतम और हटाए गए इंस्पेक्टर बुढ़ाना ऋषिपाल सिंह भी बोलते नजर आ रहे हैं। वह साफ कहते दिखाई दे रहे हैं कि कवाल में शाहनवाज और मलिकपुरा के दो युवकों की हत्या के बाद तलाशी अभियान चलाकर सात संदिग्ध आरोपियों को हिरासत में लिया था। तभी एक कद्दावर सपा नेता ने फोन कर सातों को छुड़वा दिया। एफआईआर भी फर्जी कराई गई।

एसएचओ मीरापुर बोल रहे हैं कि सपा नेता ने डीएम-एसएसपी को हटवाया जबकि दोनों अधिकारी अच्छा काम कर रहे थे। हिरासत में लिए युवकों को भी छुड़वा दिया। एसएचओ भोपा समरपाल सिंह कह रहे हैं कि कवाल कांड के बाद डीएम-एसएसपी का तबादला गलत हुआ। यदि चार दिन बाद तबादला होता, तो शायद दंगा नहीं होता। गौरतलब है कि दंगे की आग जब बुढ़ाना, फुगाना और शाहपुर के देहात क्षेत्र में पहुंची तो वहां पुलिस फोर्स की भारी कमी रही। जब तक फोर्स पहुंची, तब तक बहुत कुछ हो चुका था। उधर, स्टिंग ऑपरेशन का प्रसारण होने के बाद मुंह खोलने वाले पुलिस वालों पर गाज गिरनी शुरू हो गई। एसएसपी ने एसओ फुगाना आरएस भगौर को लाइनहाजिर कर दिया।

सबसे चौकाने वाली बात ये है कि इस स्‍टिंग ऑपरेशन में सपा के कद्दावर मंत्री आजम खान का नाम सामने आया है। वीडियो में आजम नाम लिया गया है और ये नाम उस संबंध में लिया गया है। कहा गया है कि आजम का फोन आया और सातों आरोपियों को छोड़ दिया गया। इस मामले में आजम खान ने कहा है कि उनका इस मामले से कोई लेना-देना नहीं है और न ही वह इस बारे में कोई सफाई देना चाहते हैं। खान ने मीडिया से कहा कि जिस समाचार चैनल ने स्टिंग ऑपरेशन करने की कोशिश की है, उसको जांच भी कर लेनी चाहिये और मुझे सजा भी सुना देनी चाहिये। उन्होंने कहा कि चैनल ने अपने शब्द उन पुलिसकर्मियों के मुंह में डाले हैं, जिन्हें उस ऑपरेशन का आधार बनाया गया है। इसके अलावा उसके रिपोर्टर द्वारा पूछे गये सवाल को नहीं सुनाया गया, यह सही नहीं है।

खान ने कहा कि उनके अधिकारियों और दफ्तर के टेलीफोन नम्बरों के विवरण की जांच की जानी चाहिये। अगर यह साबित हो जाए कि उन्होंने किसी पुलिस अधिकारी को टेलीफोन किया था, तो उन्हें जो सजा देना चाहें, दे दी जाए।

स्टिंग ऑपरेशन में क्या कहा अफसरों ने

बहुत कुछ पॉलिटिकल है: मैं क्या कहूं... बहुत कुछ पॉलिटिकल है। मुस्लिमों को लग रहा है .... हिंदुओं को लग रहा है कि मुस्लिम एपीजमेंट (तुष्टीकरण) बहुत हो रहा है। (कल्पना सक्सेना, एसपी क्राइम मुजफ्फरनगर)

ऊपर से आदेश आया कि छोड़ दो:

हत्या के बाद सात-आठ लोगों को पकड़ लिया था। चश्मदीदों ने उनके नाम बताए थे। लेकिन एफआईआर फर्जी करा दी गई। पकड़े गए लोगों में से सिर्फ एक का नाम था। बाद में ऊपर से आदेश आ गया उनको छोड़ने का। कहा गया कि जब एफआईआर में नाम नहीं है तो डिटेन करने की क्या जरूरत है। (जेआर जोशी, सीओ जानसठ)

कोई भी घटना होती है... नेता तुरंत आकर बैठ जाते हैं

पकड़े गए लोग प्राइम सस्पेक्ट थे। लेकिन उन्हें छोड़ने के लिए कह दिया गया। वही मेजर मिस्टेक हुई। दूसरी कम्युनिटी में गलत मैसेज चला गया। दुर्भाग्य है पूरे देश का, इस सिस्टम का, जैसे कोई घटना होती है... नेता तुरंत आकर बैठ जाते हैं। (आरसी त्रिपाठी, एसडीएम जानसठ)

जो हो रहा है होने दो...

पुलिस मौके पर पहुंच गई थी लेकिन कम थी। अफसरों से घंटो संपर्क नहीं हो पाया। असलहा ज्यादा थे नहीं। जो थे वे चल नहीं रहे थे। आजम प्रेशराइज कर रहे थे। उन्होंने कहा जो हो रहा है होने दो आप कुछ नहीं करेंगे। (आर एस भगौर, एसआई फुगाना)

सब पॉलिटिकल स्टंट है

पहले वाले डीएम एसएसपी घटना मैनेज कर लेते। ये सच है कि इस घटना में हत्या हुई। लेकिन ये भी सच है कि हत्या के बावजूद घटना ने कोई सांप्रदायिक रंग नहीं लिया। दिक्कत तब शुरू हुई जब डीएम और एसएसपी ने घर घर तलाशी लेनी शुरू की। इस पर उनका तबादला कर दिया गया। सब पॉलिटिकल स्टंट है। सपा के लोग उन्हें हटवाने में जुटे थे। डीएम -एसएसपी उनके काम नहीं कर रहे थे राइट या रांग। (अनिरुद्ध कुमार गौतम, एसएचओ मीरापुर)

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