उपचुनाव में हार जीत से ज्यादा मुस्लिम वोटर तय करेगा आम चुनाव 2024 के लिए अपना रुख, जानिए
लखनऊ, 21 जून: उत्तर प्रदेश में हाल ही में सम्पन्न हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी को प्रचंड जीत हासिल हुई थी लेकिन दूसरी ओर सपा और बसपा को निराशा हाथ लगी थी। बसपा को केवल एक सीट से संतोष करना पड़ा था तो सपा को मुस्लिमों वोट बैँक के सहयोग से 111 सीटों पर जीत हासिल हुई थी। बसपा की मुखिया मायावती ने हमेशा यह दावा किया कि बीजेपी को सिर्फ बसपा की हरा सकती है। बहनजी ने अपनी रणनीति के तहत ही अपने सबसे बड़े नेता और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव को सतीश मिश्रा को आजमगढ़ में प्रचार से दूर रखा ताकि मुस्लिम वोट बैंक को साधा जा सके। राजनीतिक पंडितों की माने तो मुस्लिम वोटरों का रुख लोकसभा उपचुनाव में हार जीत से ज्यादा आम चुनाव 2024 के लिए एक लाइन तय करेगा कि वह सपा के साथ खड़ा रहेगा या बहनजी का साथ देगा।

उपचुनाव में हार जीत से ज्यादा 2024 के लिए तय होगा एजेंडा
यूपी विधानसभा में जीत का परचम लहराने वाली सपा के लिए मुस्लिम वोटर वरदान साबित हुए थे। लेकिन आजमगढ़ के उपचुनाव में मुस्लिम समुदाय भी दोराहे पर खड़ा नजर आ रहा है। मुस्लिम फिर एक बार अखिलेश का साथ दे या इस बार मायावती के पाले में जाकर गुड्डु जमाली के लिए मतदान करे इसको लेकर वह फैसला नहीं कर पा रहा है। राजनीतिक पंडितों की माने तो यह मुस्लिम समुदाय के लिए परीक्षा की घड़ी है क्योंकि उनका रुख ही यह तय करेगा कि जीत किसकी होगी। हालांकि आजमगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार हेमंत कुमार का कहना है कि हार जीत से ज्यादा मुसलमानों के रुख से 2024 की लाइन तय हो जाएगी कि वह आने वाले समय में सपा या बसपा किसके साथ खड़ा होगा।

बसपा जीती तो पहले की तरह मुस्लिम नेताओं पर फोकस करेंगी मायावती
यूपी विधानसभा चुनाव में बसपा की मुखिया मायावती बार बार यही बयान देती रहीं कि बीजेपी को सिर्फ बसपा ही हरा सकती हैं। मायावती ने इस चुनाव में मुस्लिम समुदाय को टिकट भी दिया था लेकिन चुनाव में मतदान के दौरान मुस्लिम वोटरों का रुझान पूरी तरह से सपा के साथ नजर आया। लेकिन आजमगढ़ के उपचुनाव में मायावती ने एक जमाली को टिकट देकर तगड़ा दांव खेला है। मुसलमान यदि बसपा केसाथ आए और जमाली जीते तो आने वाले समय में मायावती का पूरा फोकस मुस्लिम समुदाय की तरफ हो जाएगा और पार्टी में मुस्लिम नेताओं को आगे बढ़ाते नजर आएंगी।

समाजवादी पार्टी जीती तो 2022 के ट्रेंड पर आगे बढ़ेंगे अखिलेश
विधानसभा चुनाव में जिस तरह से मुस्लिम समुदाय ने अखिलेश का साथ दिया उसे देखते हुए सपा एक बार फिर मुस्लिम वोट बैंक पर भरोसा कर रही है। सपा को लगता है मुस्लिम समुदाय सपा के साथ ही खड़ा होगा और जीत सपा की होगी। सपा के नेता राजीव राय कहते हैं कि मुसलमानों ने हमेशा सपा का साथ दिया है और इस चुनाव में भी उनका साथ मिलेगा। अखिलेश यादव ने मुस्लिम समुदाय के लिए जितनी लड़ाई लड़ी है उतना शायद किसी पार्टी के नेता ने नहीं लड़ी है। हालांकि राजनीतिक पंडितों की माने तो मुसलमानों का झुकाव किधर होगा यह साफतौर पर दिखाई नहीं दे रहा है लेकिन सपा पूरी तरह से आश्वस्त है कि वह एक बार फिर इस समुदाय का भरोसा जीतने में कामयाब रहेगी। यदि मुस्लिम समुदाय का साथ मिला तो 2024 से पहले अखिलेश एक बार फिर 2022 के ट्रेंड पर आगे बढ़ते नजर आएंगे।

दलित-मुस्लिम V/S मुस्लिम-यादव समीकरण की होगी परख
आजमगढ़ के उपचुनाव में इस बार दलित-मुस्लिम V/S मुस्लिम-यादव समीकरण की भी परख होनी है। यदि आमगढ़ में बसपा ने बाजी मारी तो दलित-मुस्लिम समीकरण आने वाले समय में और मजबूत बनकर उभरेगा और मायावती इस रणनीति के तहत ही आगे बढ़ेंगी। उसी तरह यदि मुसलमानों ने एक बार फिर सपा का साथ दिया और मुस्लिम-यादव समीकरण हावी रहा तो अखिलेश इस समीकरण के बूते ही 2024 के आम चुनाव में उतरेंगे। हालांकि अभी यह कहना काफी मुश्किल है कि इनमें से कौन सा समीकरण हावी होगा।

सतीश मिश्रा को चुनाव से दूर रखकर मायावती ने चला है नया दांव
आजमगढ़ का रण जीतने के लिए मायावती ने इस बार अपने सबसे खास और वरिष्ठ नेता सतीश मिश्रा को चुनाव प्रचार से दूर रखा है। सतीश मिश्रा ही वह शख्स थे जो विधानसभा चुनाव के दौरान अयोध्या से लेकर काशी तक बसपा को सोशल इंजीनियरिंग को आगे बढ़ाते नजर आए थे। फिर क्या वजह रही कि वह इस बार चुनाव प्रचार से दूर हैं और उनको स्टार प्रचारकों की सूची में भी शामिल नहीं किया गया। राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो इसके मायावती की भी सोची समझी रणनीति काम कर रही है। दरअसल मुस्लिम विरादरी में सतीश मिश्रा को लेकर काफी नाराजगी थी। कई नेताओं ने गंभीर आरोप लगाकर पार्टी छोड़ी थी। लिहाजा मायावती नहीं चाहती थीं कि मुस्लिम बिरादरी के बीच सतीश मिश्रा प्रचार करें। इसलिए उनको पूरी कैंपेनिंग से दूर रखा गया है।












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