UP में लड़खड़ाती कांग्रेस के सामने वजूद बचाने की चुनौती, क्या 2022 में कमाल दिखा पाएंगी प्रियंका गांधी

लखनऊ, 18 अगस्त: उत्तर प्रदेश में पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी केवल पूर्वी यूपी के प्रभारी का जिम्मा संभाल रही थीं। चुनाव में मिली करारी हार के बाद कांग्रेस ने उनको पूरे यूपी का प्रभार पकड़ाया ताकि कांग्रेस की डूबती नैया को किनारा मिल सके। लेकिन प्रियंका की लाख कोशिशों के बावजूद संगठन में वह तेजी नहीं आ पा रही है जो चुनाव से पहले दिखनी चाहिए। पार्टी के नेताओं का कहना है कि पार्टी को असंतुष्ट नेताओं को भी मनाने के साथ ही यूपी में गठबंधन को लेकर स्थिति साफ करनी चाहिए ताकि पार्टी का कार्यकर्ता किसी तरह के भ्रम में न रहे। चुनाव से ठीक पहले गठबंधन करना पार्टी के लिए हमेशा नुकसानदायक साबित हुआ है।

प्रियंका गांधी

हालांकि लगातार झटके पर झटका खा रहीं प्रियंका अब युवा जोश के साथ ही अनुभवी लोगों को भी साथ लेकर चलने का प्रयास कर रहीं है लेकिन यूपी में कांग्रेस की लड़खड़ाती चाल को दुरुस्त करने के लिए प्रियंका को अभी चुनाव से पहले बहुत कुछ करने की जरुरत है। राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो अगले विधानसभा चुनाव में प्रियंका के संगठनात्मक कौशल की परीक्षा होनी है और यह चुनाव की प्रियंका के आगे की राह भी तय करेगा।

संगठन को नए कलेवर में खड़ा करने की कोशिश
प्रियंका गांधी पिछले दो वर्षों से लगातार यूपी कांग्रेस को बदलने का प्रयास कर रही हैं। इसके लिए उन्होंने कांग्रेस के संगठनात्मक ढांचे को दुरुस्त करने का काम किया है प्रदेश में 500 सदस्यों वाली जम्बो कार्यकारिणी को छोटा करने का प्रयास किया। प्रियंका ने पिछड़ी जाति से ताल्लुक रखने वाले अजय कुमार लल्लू को प्रदेश अध्यक्ष बनाया लेकिन वह संगठन के लिए कुछ खास नहीं कर पाए हैं। यूपी में 115 सदस्यीय कार्यकारिणी का गठन किया गया जिसमें 16 महामंत्री और छह उपाध्यक्ष बनाए गए। हालांकि चुनाव को देखते हुए कार्यकारिणी के गठन में जातिगत समीकरण का पूरा ख्याल रखा गया। कार्यकारिणी में 41 अपर कास्ट के नेताओं को जगह दी गई।

priyanka

कांग्रेस में जातिगत समीकरण को लेकर कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता अंशु अवस्थी ने वन इंडिया डॉट काम को बताया, '' निश्चिततौर पर हमारे सामने चुनौतियां थीं। वर्ष 2017 की अपेक्षा हमारा संगठनात्मक ढांचा मजबूत हुआ है और प्रदेश की 30 हजार ग्राम पंचायतें हैं और इसमें 168000 बूथ हैं उस पर हमने अपना संगठन मजबूत कर लिया है। बूथ स्तर पर, ग्राम सभा स्तर पर, न्याय पंचायत स्तर पर और जो ब्लॉक हैं उनपर अपने कार्यकर्ताओं को खड़ा करने का काम किया है। इसी का परिणाम है कि पंचायत चुनाव में हम 271 को सदस्यों को विजय दिलवायी, 511 जगह पर हम रनर रहे और 683 सीटों पर तीसरे स्थान पर रहे। जिला पंचायत चुनाव में पार्टी को एक करोड़ वोट मिला है। यह हमारे लिए बूस्टर का काम है। संगठन को मजबूत करने की जो चुनौति थी वह प्रियंका गांधी के आने के बाद पटरी पर आयी है, जिसका असर अगले चुनाव में देखने को मिलेगा।''

यूपी में जिलाध्यक्षों की तैनाती में भी जातिगत समीकरण का ख्याल
कांग्रेस की यूपी प्रभारी प्रियंका गांधी ने जिस तरह से प्रदेश की कार्यकारिणी में उन जातियों के नेताओं को जगह दी जिन जातियों ने बीजेपी को वोट किया था उसी तरह जिलों में भी जिलाध्यक्षों की नियुक्ति के समय भी जातिगत समीकण का पूरा ध्यान दिया गया। इसमें अपर कास्ट, मुस्लिम और पिछड़ी जातियों का भी समायोजन किया गया है। प्रियंका ने कांग्रेस को संगठन के लिहाज से छह जोन में बांटा था। आगरा, मेरठ, बुंदेलखंड, बरेली, अवध और पूर्वांचल। रणनीति के हिसाब से हर जोन की जिम्मेदारी एक उपाध्यक्ष को सौंपी गई है।

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गठबंधन को लेकर प्रियंका ने नहीं खोले अपने पत्ते
यूपी विधानसभा चुनाव में अभी करीब सात महीने का समय बचा है। ऐसे में कांग्रेस ने हालांकि अपने पत्ते नहीं खोले हैं कि किसके साथ गठबंधन होना है या नहीं होना है। प्रिंयका इस बात को कई बार कह चुकी हैं कि गठबंधन के रास्ते हमेशा खुले हैं। हालांकि प्रदेश के एक पदाधिकारी कहते हैं कि अभी यह तय नहीं हुआ है कि किसके साथ जाएंगे लेकिन इससे कार्यकर्ताओं में भ्रम की स्थिति बनी हुई है। पार्टी को यह साफ करना चाहिए कि गठबंधन होगा या नहीं। एक बार स्थिति स्पष्ट होने पर कार्यकर्ता पूरे मनोयोग से चुनाव की तैयारियों में जुट जाएगा नहीं तो चुनाव से ठीक पहले गठबंधन की घोषणा से पार्टी का ही नुकसान होगा।

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