क्या अखिलेश यादव से नहीं संभल पा रही समाजवादी पार्टी? प्रेस कॉन्फ्रेंस की 5 बड़ी 'चूक'
लखनऊ, 15 अप्रैल: यूपी विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने अपने प्रदर्शन में काफी सुधार किया है। पार्टी तो मानकर चल रही थी कि अखिलेश यादव दोबारा मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं। लेकिन, वोटों के गणित में भारतीय जनता पार्टी इससे काफी आगे निकल गई। जब, पार्टी अध्यक्ष ने आजमगढ़ सीट से अपनी लोकसभा सदस्यता छोड़कर, करहल की विधायकी रखने का ऐलान किया तो लगा कि उत्तर प्रदेश में बीजेपी की मजबूत सत्ता को सपा जैसी ताकतवर विपक्ष का मुकाबला करना पड़ेगा। लेकिन, महज एक महीने में ही हालात ने अचानक करवट लेनी शुरू कर दी। समाजवादी पार्टी के सबसे बड़े वोट बैंक के कुछ नेताओं ने ही नेतृत्व को घेरना शुरू कर दिया। विधान परिषद के चुनाव में शर्मनाक प्रदर्शन ने तो और स्थिति खराब कर दी। लेकिन, फिर भी सपा अध्यक्ष का जो अंदाज दिख रहा है, उससे नहीं लगता कि वह सामने खड़े हो रहे संकट को महसूस कर पा रहे हैं। इसकी 5 वजहें हैं, जिसका संकेत गुरुवार की अपने प्रेस कांफ्रेंस में उन्होंने खुद जाहिर कर दिए हैं।

डैमेज कंट्रोल के बजाय मुसीबतें तो नहीं बढ़ा रहे अखिलेश ?
विधानसभा चुनावों के बाद विधान परिषद के चुनाव परिणाम ने यूपी में समाजवादी पार्टी के अंदरूनी घमासान को पूरी तरह से सतह पर ला दिया है। सबसे बड़ी बात ये है कि मुस्लिम नेताओं ने पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव के खिलाफ बगवात का झंडा बुलंद कर दिया है। इस्तीफे शुरू हैं। उनकी नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठाए जा रहे हैं। मुसलमानों कों सिर्फ वोट बैंक के लिए इस्तेमाल करने के आरोप सार्वजनिक मंच से लग रहे हैं। पार्टी के सबसे बड़े मुस्लिम चेहरे आजम खान के मीडिया सलाहकार फसाहत खान तो यहां तक कह चुके हैं कि सीएम योगी आदित्यनाथ सही कहते हैं कि अखिलेश ही नहीं चाहते कि वे और उनका परिवार जेल से बाहर आए। उनके आरोपों के बाद पार्टी नेता सलमान जावेद राईन ने इस्तीफा दिया, फिर एक और नेता कासिम राईन ने सभी पदों को तोबा कर दिया। लेकिन, पार्टी में आग लगी है और अखिलेश यादव का इस ओर ध्यान नहीं जा रहा है। वह कह रहे हैं कि वो तो अभी सुन रहे हैं, हार की समीक्षा का अभी वक्त नहीं आया है। जब चुनाव आयोग पूरी डिटेल देगा तो फिर इसके लिए भी फुर्सत निकालेंगे।
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आजम खान पर कुछ भी बोलने से इनकार
मुसलमान नेताओं का दावा है कि विधानसभा चुनावों में उनका 90 फीसदी वोट भाजपा को हराने के नाम पर सपा को गया है। जेल में होते हुए भी सपा के सबसे बड़े मुस्लिम चेहरे आजम खान हैं। वह अखिलेश के पिता मुलायम सिंह यादव के दौर के नेता हैं। लेकिन, मैनपुरी में पार्टी कार्यकर्ताओं से बैठक के बाद जब प्रेस कांफ्रेंस में आजम पर उनसे सवाल किया गया तो अखिलेश ने पहले तो कह दिया कि इस मुद्दे पर बोलने के लिए प्रेस कांफ्रेंस नहीं बुलाई है। लेकिन, जब दोबारा सवाल हुआ तो उन्होंने दो टूक कह दिया कि 'छोड़िए इन बातों को...' अखिलेश चाहते तो कुछ और भी कुछ कहकर सवाल को टाल सकते थे। अखिलेश का यह रवैया आजम समर्थकों में सही संदेश नहीं पहुंचा रहा होगा। यही वजह है कि चाचा शिवपाल यादव के साथ-साथ आजम खान के भी दूसरे विकल्प देखने की खबरों को हवा मिल रही है।

क्या अखिलेश यादव को कोई अभिमान तो नहीं हुआ?
अखिलेश यादव जब 2012 में सपा के पूर्ण बहुमत आने के बाद मुख्यमंत्री बने थे तो पार्टी की उस कामयाबी के पीछे उनके पिता मुलायम सिंह यादव और चाचा शिवपाल यादव का खड़ा किया हुआ मजबूत संगठन था। 2014, 2017, 2019 और 2022- यूपी में चार-चार चुनाव हुए हैं और अखिलेश यादव भाजपा को हरा पाने में असफल हुए हैं। इस दौरान पार्टी की अगुवाई पूरी तरह से उनके हाथ में रही है। जाहिर है कि जब कोई पार्टी चुनाव हारती है तभी कमियों पर भी सवाल उठाए जाते हैं। लेकिन, जब उनसे पार्टी नेताओं की ओर से उठाए जा रहे सवालों के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कह दिया कि 'इन सारे मुद्दों पर दो महीने पहले क्यों नहीं चर्चा की गई?' यह बात सही है कि पिछले चुनावों में भाजपा के विरोध में खड़ी पार्टियों और वोटरों ने अखिलेश यादव के लिए पूरी जी-जान लगा दिया था। फिर भी अगर हार हुई है तो अखिलेश उसके कारणों की तलाश कर सकते हैं। लेकिन, उनके अंदाज से लग रहा है कि वह अभी चुनावी भीड़ को देखकर 'ऐ पुलिस...ऐ पुलिस....' वाले 'गुमान' से नहीं उबर पाए हैं।

बुलडोजर पर तंज
37 वर्षों बाद यदि किसी सरकार की यूपी की सत्ता में दोबारा वापसी हुई है तो उसमें प्रदेश की कानून-व्यवस्था के मुद्दे का बहुत बड़ा रोल है। खासकर अखिलेश के पिछले शासन ने इसमें काफी काम किया है। सीएम योगी आदित्यनाथ ने बुलडोजर को यूपी की सुधरी हुई कानून-व्यवस्था का प्रतीक बना दिया है। लेकिन, अखिलेश यादव अभी भी 'बुलडोजर बाबा' कहकर सत्ताधारी पार्टी को घेरना चाहते हैं। विरोधी जो भी कहें, लेकिन यह सच्चाई है कि एक आम आदमी के मन में अपराधियों और माफियाओं के खिलाफ योगी के बुलडोजर ने विश्वास पैदा किया है। अखिलेश चाहें तो इसकी वजह से किसी के साथ हुई नाइंसाफी पर सवाल जरूर खड़े कर सकते हैं। सीधे बुलडोजर की कार्रवाई पर सवाल उठाने से वह खुद ही सवाल बन सकते हैं। क्योंकि, इसकी लोकप्रियता तो मध्य प्रदेश तक पहुंच चुकी है। अगर सवाल उठाना है तो वाकई अगर इसकी वजह से किसी बेगुनाह को नुकसान होता है तो सकारात्मक तरीके से उसके साथ खड़े होकर अपना पक्ष ज्यादा मजबूत करने का उनके पास मौका बचा हुआ है।

धार्मिक पूजा-पाठ पर सवाल उठाने की प्रवृत्ति
पूजा-पाठ, नियम-ध्यान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की दिनचर्या में शामिल है। ऐसा नहीं है कि वह मुख्यमंत्री बनने के बाद मीडिया वालों को बुलाकर यह सब कर रहे हैं। उनके वस्त्र का भगवा रंग भी आज का नहीं है। वह अपने पद पर नहीं थे, तब भी ये सब करते थे। अगर आज मीडिया उनके इस कार्यकलाप को कवर करती है तो यह उसके टीआरपी का विषय है। ऐसे में अगर वह सीएम योगी की इस छवि पर चर्चा करेंगे तो उन्हें सियासी नुकसान पहुंचाने की जगह अपना ही काम ज्यादा बिगाड़ेंगे। लेकिन, लगता है कि सपा के मुखिया से अभी भी यह चूक हो रही है। यह बात जरूर है कि पूजा करना किसी का निजी मामला है। लेकिन, सीएम होने की वजह से अगर उन्हें कवर मिलता है तो इसे कतई धार्मिक क्रिया-कलापों का प्रदर्शन नहीं माना जा सकता। विरोधी इस तरह के मुद्दे उठाकर भारतीय जनता पार्टी को घेर पाएंगे, अभी तक ऐसा नहीं लगा है। उलटे पार्टी को इस तरह के सवालों से फायदा ही मिलता रहा है और कई दल अब सौफ्ट हिंदुत्व की ओर मुड़ने को मजबूर हुए हैं। समाजवादी पार्टी को भी इसपर नए सिरे से काम करना पड़ सकता है।












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