यूपी चुनाव की सियासत में ताकतवर बनकर कैसे उभरे संजय निषाद, एक मुकदमे ने बना दिया निषादों का बड़ा नेता
लखनऊ, 12 नवंबर। 2013 में निर्बल इंडियन शोषित हमारा आम दल (निषाद) पार्टी बनी थी और आठ सालों के भीतर यह उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपनी ऐसी जगह बना चुकी है जहां सपा और भाजपा जैसी बड़ी पार्टियां गठबंधन करने के लिए उसके पास आ रही है। पूर्वांचल में कई सीटों पर निषाद समुदाय का दबदबा है और इनका वोट हार-जीत के अंतर को पलटकर परिणाम को भी बदल सकता है। निषाद पार्टी ने सपा के साथ मिलकर गोरखपुर संसदीय सीट पर 2018 के उपचुनाव में भाजपा को मात दे दी थी जबकि यह योगी आदित्यनाथ का मजबूत किला माना जाता था। इसके बाद भाजपा के लिए निषाद पार्टी को साथ में लाना राजनीतिक मजबूरी बन गई। निषाद पार्टी को प्रदेश की राजनीति में अहम बनाने में इसके अध्यक्ष संजय निषाद का जुझारूपन काम आया। इलेक्ट्रो होम्योपैथ को मान्यता दिलाने के संघर्ष से शुरू हुआ संजय निषाद का सफर यूपी में सत्ता की सियासत तक कैसे पहुंचा, इसके पीछे पिछले आठ साल की लगातार उनकी मेहनत है। संजय निषाद से पहले उत्तर प्रदेश में जमुना निषाद निषादों के एक मात्र बड़े नेता थे। जमुना निषाद पिपराइच विधानसभा सीट से विधायक रहे थे और मायावती सरकार में मंत्री भी बने थे। 2010 में हादसे में उनके निधन के बाद निषादों का कोई बड़ा नेता नहीं रह गया। ऐसे में संजय निषाद अपने समुदाय को आरक्षण दिलाने के लिए संघर्ष करते हुए 2015 में उभरकर सामने आए। संजय निषाद को बड़ा नेता बनाने में 7 जून 2015 को हुए कसरवल कांड का बड़ा योगदान रहा।

क्या है सहजनवा का कसरवल कांड?
7 जून 2015 को राष्ट्रीय निषाद एकता परिषद के बैनर तले संजय निषाद, गोरखपुर और संत कबीर नगर के सीमावर्ती क्षेत्र सहजनवा के कसरवल में निषादों को पांच फीसदी आरक्षण देने की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे थे। निषाद समुदाय के सैकड़ों लोगों ने रेलवे ट्रैक जाम कर दिया। पुलिस प्रशासन समझाने आई तो भीड़ उग्र हो गई। भीड़ ने पथराव किया और पुलिस से टकराव के दौरान गोली चली जिसमें 22 साल का युवक मारा गया, कई पुलिसकर्मी और अफसर घायल हो गए। पुलिस का कहना था कि गोली आंदोलनकारियों की तरफ से चली थी। इस कांड में मुख्य आरोपी संजय निषाद समेत 36 लोगों पर मुकदमा दर्ज हुआ था। फरार संजय निषाद ने बाद में कोर्ट में आत्मसमर्पण कर दिया था और उनको जेल की हवा खानी पड़ी थी। कसरवाल कांड से मशहूर हुए संजय निषाद ने अपने समुदाय को निषाद पार्टी के साथ जोड़ना शुरू कर दिया और फिर 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में उतर गए। आइए निषादों के नेता बनने से पहले का संजय निषाद का संघर्ष जानते हैं।

2002 में बनाया था पूर्वांचल मेडिकल इलेक्ट्रो होम्योपैथी एसोसिएशन
संजय निषाद का जन्म गोरखपुर के कैंपियरगंज के जंगल बब्बन गांव में सात जून 1965 को सेना में सूबेदार मेजर विजय कुमार के घर में हुआ था। 1988 में होम्योपैथी चिकित्सा में डिग्री लेने के बाद वे प्रैक्टिस करने लगे। इलेक्ट्रो होम्योपैथी को मान्यता दिलाने क संघर्ष उन्होंने छेड़ा और 1988 में इलेक्ट्रो होम्योपैथी गण परिषद के संस्थापक महासचिव बने। 2002 में उन्होंने पूर्वांचल मेडिकल इलेक्ट्रो होम्योपैथी एसोसिएशन बनाया। इसके बाद उन्होंने निषादों को राजनीतिक रूप से संगठित करने के लिए दो संगठन बनाया- ऑल इंडिया बैकवर्ड एंड माइनारटीज वेलफेयर मिशन, शक्ति मुक्ति महासंग्राम। वे दोनों ही संगठन के संस्थापक राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे। फिर उन्होंने राष्ट्रीय निषाद एकता परिषद नाम से संगठन बनाया और इसके बैनर तले राजनीति में उतरने के लिए 2013 में निषाद पार्टी का गठन किया।

निषादों को आरक्षण दिलाने की मांग से चमकी संजय निषाद की राजनीति
संजय निषाद की राजनीति निषादों की 578 उपजातियों को अनुसूचित जाति में लाकर आरक्षण दिलाने की मांग से शुरू हुई थी। उन्होंने इसके लिए गांव-गांव जाकर निषादों को जागरूक और एकजुट करना शुरू किया। पहले छोटे-छोटे प्रदर्शन किए और 2015 के कसरवल में उग्र प्रदर्शन से वो लाइमलाइट में आ गए। जेल से जमानत पर बाहर निकलने के बाद वे फिर निषादों को एकजुट करने में लगे और जुलाई 2016 में चंपा देवी पार्क में विशाल रैली कर अपनी ताकत का प्रदर्शन किया। संजय निषाद ने निषादों को यह सिखाया कि इस समुदाय का वोट बैंक यूपी की राजनीति में कितनी ताकत रखता है। उन्होंने समर्थकों से कहा कि सत्ता तक पहुंचो तभी विकास करोगे। संजय निषाद ने किन विचारों से अपने समर्थकों को संगठित किया इसके लिए यह आलेख (संजय निषाद कैसे करते हैं निषादों को एकजुट) पढ़ सकते हैं

संजय निषाद और निषाद पार्टी की राजनीतिक सफलता
2017 में निषाद पार्टी ने उत्तर प्रदेश की 72 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ा और ज्ञानपुर सीट जीतकर विधानसभा में प्रवेश किया। एक सीट से चुनावी राजनीति में निषाद पार्टी का खाता खुल गया। विधानसभा चुनाव में भाजपा को मिली भारी सफलता के बाद योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने और उनकी गोरखपुर संसदीय सीट खाली हुई। सपा के साथ गठबंधन में मिले टिकट पर संजय निषाद के बेटे प्रवीण निषाद ने 2018 के उपचुनाव में भाजपा के इस गढ़ को छीन लिया। इसके बाद भाजपा ने निषाद पार्टी की ओर देखा और 2019 के लोकसभा चुनाव में संत कबीर नगर से प्रवीण निषाद को उतारा और वे फिर से सांसद बन गए। भाजपा ने हाल में संजय निषाद को यूपी में विधान परिषद का सदस्य बनाया है। फिलहाल संजय निषाद आरक्षण की मांग को लेकर लगातार भाजपा पर दबाव बना रहे हैं और भाजपा उनको मनाने में लगी रहती है। भाजपा निषाद पार्टी के साथ गठबंधन को हर हाल में बचाने में लगी है, इसी से संजय निषाद की ताकत का पता चलता है।












Click it and Unblock the Notifications