UP विधानसभा चुनाव में विपक्ष का निराशाजनक प्रदर्शन, क्या इन 5 गलतियों से लेंगे सबक

लखनऊ, 14 मार्च: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजे आ चुके हैं। बीजेपी (BJP) की प्रचंड जीत ने विपक्षी दलों को कई सबक दिए हैं। तमाम कोशिशों के बावजूद विपक्ष लोगों का विश्वास नहीं जीत सका। यह मतदाताओं को यह समझाने में पूरी तरह विफल रहा है कि यह जनता के लिए एक बेहतर, विश्वसनीय विकल्प है। पहले दिन से किंग मेकर मानी जाने वाली मायावती की बसपा सिर्फ एक सीट पर सिमट गई तो कांग्रेस की प्रियंका गांधी की कांग्रेस भी यूपी की जनता की उम्मीदों पर खरा उतर नहीं पायी। लेकिन राजनीतिक पंडितों का मानना है कि विपक्ष से कुछ चूकें हुई हैं और वो इस पर ध्यान देकर आगे के लिए सबक लेंगे तो काफी बेहतर होगा।

सपा में टिकटों का बंटवारे में दिखा झोल

सपा में टिकटों का बंटवारे में दिखा झोल

यूपी विधानसभा चुनाव में सपा के मुखिया अखिलेश यादव ने पूरी ताकत झोंक दी थी। पश्चिम से लेकर पूर्वांचल तक उन्होंने बड़े सधे हुए अंदाज में प्रचार प्रसार किया और गठबंधन भी किए लेकिन टिकटों के वितरण में वो चूक गए। यहीं से उनका खेल बिगड़ गया। राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो अखिलेश ने यदि टिकटों को बेहतर तरीके से बांटा होता तो उन्हें और ज्यादा सीटें मिल सकती थीं। एन वक्त पर टिकटों का वितरण होने से कई सीटों पर बागी ही सपा उम्मीदवारों के आमने सामने आए गए और उन्होंने ही खेल बिगाड़ दिया। यदि टिकटों के वितरणों को लेकर बागियों को साधने में अखिलेश कामयाब हुए होते तो उन्हें कामयाबी मिल सकती थी।

कांग्रेस के लिए क्या रहेंगी चुनौतियां

कांग्रेस के लिए क्या रहेंगी चुनौतियां

यूपी में चुनाव तो खत्म हो गए हैं लेकिन इस चुनाव से यह बात सामने आई है कि यूपी में कांग्रेस को खड़ा करने में प्रियंका के सामने अभी चुनौतियां कम नहीं हैं। आने वाले समय में प्रियंका की मुश्किलें और बढ़ने वाली हैं क्योंकि कांग्रेस के भीतर से ही अब बदलाव की मांग उठने लगी है। बीजेपी ने भी यह नैरेटिव सेट करने की कोशिश की है कि प्रियंका ही कांग्रेस का ट्रंप कॉर्ड थीं और वो भी अब पिछले दो चुनावों से फेल साबित हो रही हैं। आने वाले समय में इसको और तेजी से फैलाया जाएगा। यूं कहें तो संगठन के अंदर और बाहर दोनों चुनौतियों से प्रियंका को पार पाना होगा क्योंकि उनके लिए अब असली लड़ाई मिशन 2024 को लेकर है।

प्रियंका की विश्वसनीयता पर भी उठे सवाल

प्रियंका की विश्वसनीयता पर भी उठे सवाल

इन चुनावों ने कांग्रेस पार्टी को एक और बड़ा सबक भी दिया है, कांग्रेस ने एक बार फिर उत्तर प्रदेश में खोया हुआ गौरव हासिल करने का मौका गंवा दिया है। पार्टी अपने पुराने गढ़ अमेठी, रायबरेली और सुल्तानपुर में कहीं भी बीजेपी को टक्कर देती नहीं दिखी, जब प्रियंका गांधी ने पार्टी के प्रचार में अपनी पूरी ताकत झोंक दी। लेकिन पार्टी हर जगह बेदम नजर आ रही थी. कई जगह कांग्रेस प्रत्याशी अपनी जमानत तक नहीं बचा सके। भाजपा की ताकत का मुकाबला करने के लिए कांग्रेस को एक पार्टी संगठन और जमीनी कार्यकर्ताओं की जरूरत है। जो भविष्य में लगभग नामुमकिन सा लगता है। यह कांग्रेस के लिए भी बड़ी चिंता का विषय है, क्योंकि 2024 के लोकसभा चुनाव में सिर्फ 2 साल बचे हैं।

क्या लेट से उतरी मायावती को हुआ नुकसान

क्या लेट से उतरी मायावती को हुआ नुकसान

यह बहुजन समाज पार्टी का विधानसभा चुनाव में अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन है। लगता है कि मायावती उत्तर प्रदेश में अपनी जमीन खो चुकी हैं। इसके बेस वोटर ने बीजेपी की जीत में अहम भूमिका निभाई है। मुफ्त राशन योजना और अन्य सुविधाओं ने सत्तारूढ़ दल के लिए एक चुंबक के रूप में काम किया है, जिसने बसपा मतदाताओं के एक बड़े वर्ग को आकर्षित किया है। इसके बावजूद मायावती निश्चित रूप से खुद को आश्वस्त कर सकती हैं कि वह अभी भी मुस्लिम वोटों को विभाजित करने में सक्षम हैं, ऐसा करके वह भाजपा के कई समाजवादी पार्टी के उम्मीदवारों को हराने में सफल रही हैं। राजनीतिक पंडितों की माने तो जिस तरह से मायावती प्रचार के लिए बाहर निकलीं उससे जनता के बीच एक भ्रम की स्थिति बनी रही जिसका लाभ बीजेपी को मिला और दलित वोट बैंक में वह सेंधमारी करने में कामयाब रही।

क्या मायावती का गेम हो गया ओवर

क्या मायावती का गेम हो गया ओवर

मायावती के लिए सबसे बुरी खबर यह है कि उन्होंने अपनी पार्टी का करिश्माई चरित्र खो दिया है। अब मायावती के लिए उत्तर प्रदेश में अपनी पार्टी के लिए जमीन ढूंढना बहुत मुश्किल है। उनके पास सतीश चंद्र मिश्रा और काशी राम जैसे जुझारू, जमीनी नेता नहीं हैं। अपने मतदाताओं के अधिकारों के लिए लड़े बिना मायावती की कोई प्रासंगिकता नहीं है। मायावती के चुनाव प्रचार पर नजर डालें तो वह इस बार चुनाव में 18 मंडलों में केवल 18 जनसभाएं ही कर पायीं जिसका खासा असर मतदाताओं के उपर नहीं दिखायी दिया। अंतिम चरण के दौरान उनका बनारस पहुंचना भी उनके वोटरों को नहीं लुभा पाया।

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