बीजेपी और गठबंधन पर दलितों की पैनी नजर, जानिए क्या मायावती की पकड़ हो रही ढ़ीली
लखनऊ, 5 फरवरी: यूपी में दलितों की आबादी लगभग 20 फीसदी है और ये चुनाव में एक महत्वपूर्ण वोटिंग ब्लॉक हैं। यूपी की 80 लोकसभा सीटों में से 17 अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं। इनमें से 2019 के आम चुनाव में बीजेपी ने हाथरस सीट समेत 14 में जीत हासिल की थी। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने दो और अपना दल ने एक सीट जीती। यूपी की 403 सदस्यीय विधानसभा के चुनाव में इस बार देखा जा रहा है कि अब दलित वोटर भी किसी राजनीतिक दल के सामने अपने पत्ते नहीं खोल रहा है चाहे वह मायावती ही क्यों न हों। तो फिर इस बार दलित वोटरों का वोट किस करवट बैठेगा ये देखना काफी दिलचस्प होगा।

1993 के बाद लगातार बसपा को मिलती गई बढ़त
दरअसल दलित मतदाता भी अपनी ताकत को बखूबी पहचानते हैं। इसी ताकत के दम पर उन्होंने बसपा को सत्ता के शिखर तक पहुंचाया। वर्ष 1993 में बसपा चुनावी मैदान में पहली बार उतरी थी। इस चनुाव में उसकी मतों में हिस्सेदारी लगभग 11 फीसदी थी। बसपा ने तब 67 सीटों पर जीत हासिल की थी। 1996 के चुनाव में वोट शेयर बढ़कर 19 फीसदी तक पहुंच गया। इसके बाद 2002 के चुनाव में मतों की हिस्सेदारी 23 फीसदी तक पहुंच गई थी और 98 सीटों पर उसे जीत हासिल हुई थी। धीरे धीरे बसपा दलित मतदाताओं में अपनी पैठ बनाने लगी थी। इसके बाद असली कमाल तो 2007 में हुआ जब बसपा को 30 फीसदी वोट मिले थे और 206 सीटों के साथ उसने पुर्ण बहुमत की सरकार बनाई। हालांकि इसमें मायावती की सोशल इंजीनियरिंग का भ कमाल रहा।

2012 के चुनाव से लगातार आ रही बसपा के ग्राफ में गिरावट
पूर्ण बहुत की सरकार बनने के बाद अगले चुनाव में बसपा को हार मिली और 2012 में यूपी में सपा की सरकार बन गई। इस चुनाव में बसपा का ग्राफ गिरा वह तीस फीसदी से गिरकर 25 फीसदी पर पहुंच गई और सीटों की संख्या गिरकर 80 तक पहुंच गई। इसके बाद 2017 के चुनाव में बसपा का वोट शेयर 22 फीसदी पर आ गया और सीटों की संख्या 19 पर आ गई। यानी सीओं की संख्या में तेजी से गिरावट देखी गई। बावजूद इसके मायावती इस बार भी दलित मतदाताओं के दम पर चुनाव में ताल ठोक रही हैं और सोशल इंजनीयरिंग के बल पर एक बार फिर यूपी में चुनाव परिणाम बदलने का दावा कर रही हैं।

पश्चिम में दलितों को साधने में जुटे सभी दल
यूं तो पश्चिमी यूपी में जाटव, खटीक, भुइयार, पासी, बाल्मिकी जेसी अनुसूचित वर्ग की अलग अलग विरादरियां हैं पर इसमें पचास फीसदी से अधिक वोट जाटवों का माना जाता है। यूं तो यह दावा किया जा रहा है कि ज्यादातर दलित इस बार भी बसपा के साथ है लेकिन उनकी संख्या भी कम नहीं है जो बीजेपी या गठबंधन की राह पकड़ सकते हैं। इन मतदाताओं को साधने के लिए सभी दलों ने अपनी ताकत लगा दी है। पहले चरण में दस फरवरी को आगरा में भी चुनाव है और इस इलाके को दलित बाहुल्य माना जाता है। यहां की मेयर रह चुकी बेबीरानी मौर्या को बीजेपी जाटव समाज में बड़ा चेहरा बनाने में जुटी हुई है। आगरा की 9 सीटों में बीजेपी ने पिछली बार सभी सीटें जीत ली थीं। पिछले चुनाव में ही दलितों ने बीजेपी के पक्ष में अपना रूझान दिखा दिया था। यही कारण था कि मायावती ने अपना चुनावी आगाज आगरा से ही किया। पश्चिमी यूपी की 34 सीटें ऐसी हैं जहां दलित मतदाताओं की संख्या दस हजार से लेकर 95 हजार तक है।

हाथरस की घटना को विपक्ष ने भुनाया
हाथरस की घटना के खिलाफ यूपी में अपनी जमीन वापस पाने की कोशिश कर रही कांग्रेस ने पूरे राज्य और राष्ट्रीय राजधानी में हाथरस की घटना के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया था। कांग्रेस नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा 3 अक्टूबर को हाथरस के बूलगढ़ी गांव पहुंचे थे और पीड़ित परिवार से मुलाकात की थी। इसके बाद पार्टी ने परिवार को वित्तीय सहायता के रूप में 10 लाख रुपये दिए थे। कांग्रेस प्रवक्ता सुरेंद्र राजपूत का दावा है कि कांग्रेस को छोड़कर, यूपी में सभी राजनीतिक दलों ने दलितों का शोषण किया है। निराश दलित अब कांग्रेस में शामिल होना चाहते हैं। समाजवादी पार्टी (सपा) प्रमुख अखिलेश यादव और बसपा सुप्रीमो मायावती भी सोशल मीडिया पर हाथरस के मुद्दे और दलितों की दुर्दशा को उठाते रहे हैं।
मेरठ कॉलेज में राजनीति विज्ञान के पूर्व प्रोफेसर डॉ रमेश अम्बेडकर बताते हैं,
"बसपा का संगठनात्मक ढांचा लोकसभा चुनाव के बाद से खराब हो गया है और बड़ी संख्या में दलित युवा पश्चिमी यूपी में भीम आर्मी जैसे संगठनों में शामिल हो रहे हैं। जिस तरह से चंद्रशेखर ने कांशीराम के जन्मदिन पर अपनी नई पार्टी की घोषणा की, वह बसपा का विकल्प बनना चाहते हैं।"












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