UP Congress: अजय राय का कद बढ़ाकर मनोज सिन्हा की कमी को कैश कराना चाहती है कांग्रेस?

देश में अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने यूपी जैसे बड़े प्रदेश में अजय राय को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर कई सियासी समीकरण साधने का प्रयास किया है।

Manoj Sinha and Ajay Rai: कांग्रेस ने पूर्व मंत्री और पांच बार से विधायक रहे अजय राय को यूपी कांग्रेस की कमान सौंपी है। अजय राय को पूर्वांचल में एक दबंग और जुझारू छवि का नेता माना जाता है। दो बार वह पीएम मोदी के खिलाफ काशी से लोकसभा चुनाव भी लड़ चुके हैं। अजय राय का कद बड़ा करने के पीछे कांगेस का मकसद क्या है। क्या मनोज सिन्हा के राज्यपाल बनने के बाद पूर्वांचल में भूमिहार नेता का जो गैप पैदा हुआ है उसे कांग्रेस अजय राय को लाकर भरना चाहती है। राजनीतिक विश्लेषक भी दावा कर रहे हैं कि 2024 के लिहाज से ये कांग्रेस की सोची समझी रणनीति का एक हिस्सा हो सकता है।

अजय राय

पूर्वांचल की दो दर्जन लोकसभा सीटों पर अहम भूमिका में हैं भूमिहार वोटर

अगले साल होने वाला लोकसभा चुनाव बीजेपी ही नहीं कांग्रेस के लिए भी काफी अहम साबित होगा। कांग्रेस ने पूर्वांचल के दबंग नेता अजय राय को कमान सौंपकर एक तीर से कई निशाने साधने का प्रयास किया है। दरअसल पूर्वांचल की करीब 20 से अधिक लोकसभा सीटों पर भूमिहार वोटरों की संख्या ठीक ठाक है। यूं कहें कि ये वोटर हर चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाता है। बीजेपी ने मनोज सिन्हा का कद बढ़ाकर इस समुदाय का पूरा लाभ उठाया है।

मनोज सिन्हा के हटने का फायदा उठाना चाहती है कांग्रेस

2019 का लोकसभा चुनाव हारने के बाद मनोज सिन्हा को बीजेपी ने वहां से हटा लिया। मोदी और अमित शाह के खास माने जाने वाले सिन्हा को जम्मू कश्मीर का राज्यपाल बना दिया गया। सिन्हा के गाजीपुर से हटने के बाद इस समुदाय के लोग एक बड़े नेता की कमी को महसूस कर रहे थे। कांग्रेस के रणनीतिकारों ने इस चीज को भांपते हुए मनोज सिन्हा के जाने के बाद इस गैप को भरने के लिए अजय राय को बड़ा नेता बनाकर इस समुदाय के जरिए सवर्ण वोटरों को साधने का प्रयास किया है।

मोदी ने 2014 में मनोज सिन्हा को बनाया था रेलमंत्री

पूर्व सांसद मनोज सिन्हा 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर में भारी मतों से चुनाव जीतने में कामयाब हुए थे। चुनाव जीतने के बाद उन्हें पूर्वांचल के बड़े भूमिहार नेता के तौर पर मंत्रिमंडल में भी जगह मिली थी। 2014 से 2019 तक सिन्हा के जरिए बीजेपी ने इस समुदाय को साधने का प्रयास किया। बाद में सिन्हा को रेल मंत्रालय के साथ ही केंद्रीय संचार राज्य मंत्री की जिम्मेदारी भी दे दी गई थी। मनोज सिन्हा भी मोदी की उम्मीदों पर खरा उतरे थे।

2019 में हारने के बाद सिन्हा को नहीं मिली मंत्रिमंडल में जगह

2014 से पहले महज एक सांसद की हैसियत वाले मनोज सिन्हा का कद 2014-2019 के बीच काफी बढ़ गया और 2019 के चुनाव में बीजेपी ने दोबारा उन्हें गाजीपुर संसदीय सीट से मैदान में उतारा था। बीजेपी के साथ ही मनोज सिन्हा को भी विश्वास था कि वह अपने काम के दम पर दोबारा जीतने में कामयाब रहेंगे लेकिन 2019 में यूपी का सियासी समीकरण अचानक ही बदल गया। यूपी में सपा-बसपा के बीच गठबंधन हो गया और इस गठबंधन के उम्मीदवार के तौर पर बाहुबली मुख्तार अंसारी के भाई अफजाल ने बसपा से चुनाव लड़कर मनोज सिन्हा को बड़े अंतर से हरा दिया।

मोदी ने सिन्हा को सौंपी जम्मू कश्मीर की जिम्मेदारी

हालांकि 2019 के चुनाव में हारने के बाद बाद लगातार इस बात के कयास लगाए जा रहे थे कि मोदी के खास होने के नाते उनको राज्यसभा के रास्ते मंत्रिमंडल में जगह दी जाएगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। कुछ समय बाद उनको मोदी ने जम्मू कश्मीर का राज्यपाल बनाकर बड़ा इनाम दे दिया साथ ही पूर्वांचल में इस समुदाय को एक मैसेज देने की काशिश की कि अभी भी मनोज सिन्हा का कद कम नहीं हुआ है। मनोज सिन्हा पिछले तीन सालों से जम्मू कश्मीर में केंद्र सरकार के एजेंडे को लागू करने में जुटे हुए हैं।

बीजेपी के पास पूर्वांचल में नहीं है कोई बड़ा भूमिहार नेता

मनोज सिन्हा के जाने के बाद पूर्वांचल में एक बड़े भूमिहार नेता की रिक्तता पैदा हो गई थी। हालांकि जम्मू कश्मीर जाने के बावजूद मनोज सिन्हा का जुड़ाव गाजीपुर और वाराणसी से बना रहा लेकिन वह इस समुदाय की उम्मीदों पर उस तरह खरा नहीं उतर पाए जिस तरह से वह केंद्र में मंत्री रहते हुए किया करते थे। अब स्थिति ये है कि सिन्हा के जाने के बाद गाजीपुर और आसपास के जिलों में एक बड़े भूमिहार नेता की कमी महसूस की जा रही थी।

मनोज सिन्हा के हटने के बाद बीजेपी ने एके शर्मा को लांच किया

मनोज सिन्हा के राज्यपाल बनने के बाद पीएम मोदी ने हालांकि पूर्वांचल को एके शर्मा के रूप में एक भूमिहार नेता पैदा करने की कोशिश की लेकिन वह मनोज सिन्हा के मुकाबले खड़ा होने में नाकाम रहे। हालांकि पीएम मोदी की वजह से योगी सरकार में एके शर्मा को जगह तो मिल गई लेकिन वह मऊ के अलावा अन्य जिलों में अपनी छाप छोड़ने में सफल नहीं हुए। शर्मा के अलावा देवरिया यूपी के कैबिनेट मंत्री सूर्य प्रताप शाही भी इसी समुदाय से आते हैं लेकिन इनकी पहचान भी देविरया तक ही सिमट कर रह गई जिसके बाद बनारस से लेकर देवरिया या यूं कहें कि पूर्वांचल से लेकर पश्चिमी यूपी में एक बड़े भूमिहार नेता की कमी को कांग्रेस ने समय रहते भांपते हुए अजय राय को आगे बढ़ाने का फैसला कर लिया।

बड़े नेताओं के आगे उपेंद्र तिवारी, उत्पल राय को नहीं मिला उभरने का मौका

एके शर्मा और सूर्य प्रताप शाही के अलावा पूर्वांचल में भूमिहार समुदाय से जुड़े दो बड़े नेताओं को भी उभरने का नहीं मिला मौका। योगी आदित्यनाथ की पहली सरकार में स्वतंत्र प्रभार मंत्री के तौर पर काम करने वाले पूर्वांचल में तेजी से एक भूमिहार नेता के तौर पर उभर रहे थे लेकिन 2022 के चुनाव में वह फेफना विधानसभा सीट से चुनाव हार गए जिसके बाद उनका कद भी कम हो गया।

कड़े तेवर वाले नेता माने जाते हैं उपेंद्र तिवारी

तिवारी को पूर्वांचल में एक कड़े तेवर वाला नेता माना जाता है और 2012 में उन्होंने सपा के दिग्गज मंत्री अंबिका चौधरी को हराने का काम किया था। वहीं दूसरी ओर मऊ जिले के उत्पल राय भी एक जमाने में बसपा सरकार में राज्य मंत्री बने थे। बाद में वह बीजेपी में शामिल हो गए लेकिन मऊ से ही एके शर्मा के आने के बाद उनकी उम्मीदों पर भी पानी फिर गया। उत्पल राय ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में भी छात्र संघ का चुनाव लड़ा था और वहां से जीत हासिल की थी।

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार राजीव श्रीवास्तव कहते हैं,

पूर्वांचल में कल्पनाथ राय के बाद भूमिहार नेता में कोई बड़ा नेता हुआ तो वो मनोज सिन्हा हैं। मनोज सिन्हा के जम्मू कश्मीर का राज्यपाल बनने के बाद पूर्वांचल में इस समुदाय के नेता को लेकर एक बड़ा गैप पैदा हुआ है। ये हो सकता है कि कांग्रेस ने इस कमी को देखते हुए ही अजय राय का कद बड़ा करने की कोशिश की हो।

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