कांग्रेस का गढ़ कैसे बनी रायबरेली? फिरोज गांधी का यहां जीजा जैसा क्यों होता था सत्कार? दिलचस्प कहानी

रायबरेली लोकसभा सीट (Raebareli Lok Sabha Seat) को पारंपरिक रूप से नेहरू गांधी परिवार की सीट कहा जाता है। लेकिन, हाल ही में इस सीट का प्रतिनिधित्व करने वाली कांग्रेस की पूर्व अध्यक्षा सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) ने यहां से लोकसभा का चुनाव (Lok Sabha Chunav 2024) ना लड़ने का फैसला किया है।

1952 के बाद से ही यहां, फिरोज गांधी (Feroze Gandhi) के बाद से कांग्रेस का कब्जा रहा है। 2004 से लगातार सोनिया गांधी यहां से सांसद चुनी जाती रही हैं। लेकिन, रायबरेली की सीट को आखिर कांग्रेस की पुश्तैनी सीट क्यों कहा जाता है? आखिर कैसे रायबरेली की सीट कांग्रेस की पुश्तैनी सीट बन गई?

Raebareli Lok Sabha Seat

रायबरेली में कांग्रेस का 1952 से दबदबा रहा है। 1952 में हुए भारत के पहले आम चुनाव में फिरोज गांधी ने रायबरेली से चुनाव लड़ा था। वह 1957 का आम चुनाव भी इस सीट से जीते। बताया जाता है कि इंदिरा गांधी के पति फिरोज गांधी इलाहाबाद से अपने राजनीतिक भविष्य की शुरुआत करने की सोच रहे थे और वह वहां, अपनी राजनीतिक गतिविधियों को भी करने लगे थे।

लेकिन, इलाहाबाद से फिरोज को 1952 के पहले आम चुनाव में अपने घरेलू मैदान से चुनाव में आना मुश्किल था। क्योंकि, कांग्रेस के लिए इलाहाबाद से कई दिग्गज नेताओं और स्वतंत्रता सेनानियों की पहले से ही लंबी लिस्ट थी। जिसमें, खुद पंडित जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री समेत कई अन्य कांग्रेसी नेता लाइन में लगे थे। इन दिग्गजों के सामने उनको मुकाबला करना आसान नहीं था।

जिसके चलते फिरोज को भी दूसरे स्वतंत्रता सेनानियों की तरह अन्य निर्वाचन क्षेत्र की तलाश करनी पड़ी। बताया जा रहा है कि, रायबरेली में फिरोज को एक स्वतंत्रता सेनानी रफी अहमद किदवई ने बुलाया था। स्वतंत्रता सेनानी रफी अहमद किदवई अपने ज़माने के महान राजनेता थे। फिरोज गांधी भी उनके अनुयायी थे। इसलिए जब वह इलाहाबाद से चुनाव नहीं लड़ सके, तो रफी ने उन्हें रायबरेली बुलाया। रफी ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान रायबरेली में अच्छा काम किया था, इसलिए वहां उनका बहुत सम्मान किया जाता था। चुनाव में फिरोज को रफी किदवई का पूरा साथ मिला और उन्होंने भी कड़ी मेहनत की।

'जीजा' की तरह सेवा-सत्कार
इसके साथ ही खुद इंदिरा गांधी ने भी अपने पति के लिए कई दिनों तक चुनाव प्रचार किया। पंडित नेहरू ने भी फिरोज के लिए चुनाव प्रचार के दौरान रायबरेली में तीन-चार सभाएं की। इन सब का नतीजा यह हुआ कि, फिरोज गांधी को उनके पहले चुनाव में ही जीत मिली।

फिरोज गांधी को लेकर बताया जाता है कि, उनको रायबरेली में जीजा की तरह सम्मान मिलता था। जनसत्ता ने अपनी एक रिपोर्ट में बर्टिल फॉक द्वारा लिखित फिरोज गांधी की जीवनी 'Feroze: The Forgotten Gandhi' के हवाले से इस बात का जिक्र किया है कि, जब फिरोज गांधी चुनाव प्रचार के लिए गांवों में घूमते रहते थे, तो लोग उन्हें 'जीजा' की तरह सेवा-सत्कार देते थे।

बता दें कि, 1960 में फिरोज गांधी की मौत के बाद इंदिरा गांधी रायबरेली से सांसद रहीं। इसके साथ ही नेहरू-गांधी परिवार के ही अरुण नेहरू और शीला कौल ने भी इस सीट का प्रतिनिधित्व किया। आजादी के बाद से अब तक सिर्फ तीन बार (1977, 1996 और 1998) में ऐसा हुआ है, जब रायबरेली से कांग्रेस का सांसद न रहा हो। 1952 से यहां कांग्रेस धीरे-धीरे मजबूत होती रही। उसका गांव-गांव संगठन बनता गया।

चूंकि, लगातार सत्ता में पार्टी बनी रही, ऐसे में इस दल के नेता भी मजबूत होते गए। जिले में विकास के लिए फैक्ट्रियां लगने लगीं तो यहां के लोगों का सामाजिक ताना-बाना भी बदलने लगा और जिसका कांग्रेस को भी लगातार लाभ मिलता रहा। शायद इसी का नतीजा है कि, बीते चार चुनाव सोनिया गांधी ने 50 फीसद मतों से ज्यादा वोट मिले।

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