मायावती की रैली में दिखा शंख, त्रिशूल और वैदिक मंत्रों का संगम, क्या 2007 वाला करिश्मा दोहरा पाएगी बसपा ?
लखनऊ, 7 सितम्बर: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव आने वाला है और सियासी पार्टियां और उनके कार्यकर्ता लगातार अपना चोला बदल रहे हैं। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की मुखिया मायावती ने मंगलवर को पार्टी की ओर से पूरे प्रदेश में चलायी जा रही प्रबुद्ध विचार गोष्ठियों का समापन कर दिया। इस कार्यक्रम के दौरान जो नजारा दिखाई दिया वो बसपा का पुराना रूप था। कार्यकर्ता लगातार नारेबाजी कर रहे थे। कहीं जयश्रीराम के नारे लग रहे थे तो कहीं हाथी नहीं गणेश हैं, ब्रह्मा, विष्णु महेश हैं। खास बात यह रही कि इस कार्यक्रम में शामिल होने के लिए विशेषतौर से काशी से ब्राह्मण बुलाए गए थे जो लगातार शंख बजा रहे थे और वैदिक मंत्रों का उच्चारण कर रहे थे।

बहुजन समाज पार्टी की ओर से चुनाव से पहले ब्राह्मणों को रिझाने के लिए पूरे प्रदेश में प्रबुद्ध वर्ग विचारगोष्ठियों काआयोजन किया गया था। कार्यक्रम में मायावती के संबोधन से पहले जय श्रीराम और जय परशुराम के नारे भी लगे। इसके साथ ही बसपा का वही पुराना नारा जो 2007 के चुनाव में लगता था 'हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा, विष्णु, महेश है' चारों तरफ गूंज रहा था। यही नहीं कुछ लोग तो ब्राह्मण शंख बजाएगा, हाथी चलता जाएगा के नारे भी लगा रहे थे।
रायबरेली से कार्यक्रम में शामिल होने आए जिला संयोजक कृष्णपाल तिवारी कहते हैं कि,
'' योगी आदित्यनाथ और बीजेपी की सरकार में ब्राह्मणेां पर बहुत अत्याचार हुआ। अबकी बार ब्राह्मण समाज सरकार को सबक सिखाएगा। बीते साढ़े चार साल में जिस तरह से ब्राह्मणों का उत्पीड़न हुआ उससे नाराजगी तो है ही। केवल विकास दुबे के परिजवार को जिस तरह से परेशान किया जा रहा है वह क्या है, ब्राह्मणों के अलावा सरकार को दूसरी जातियों में अपराधी क्यों नहीं दिखाई देते।''
बसपा 2007 का करिश्मा दोहराना चाहती है
इस सभा के जरिए मायावती 2007 की कामयाबी को फिर से दोहराना चाहती थीं। उस समय भी सतीश चंद्र मिश्र ने ब्राह्मण वोटरों के बीच जाकर सम्मेलन किए थे। इसका फायदा पार्टी को कितना मिलेगा यह आने वाले समय में देखने की बात है। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस और समाजवादी पार्टी पर आक्रामक रूप से निशाना साधते रहे हैं। सपा, वास्तव में, 2019 के लोकसभा चुनाव में उनकी सहयोगी थी। हालांकि मायावती इस बार कोई चांस नहीं ले रही हैं।

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मायातवी के लिए 2014, 2017 और 2019 का चुनाव अच्छा नहीं रहा
2014 का आम चुनाव मायावती की बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के लिए अच्छा नहीं रहा। लोकसभा में एक भी सीट जीतने में सफल नहीं रहीं। यह प्रदर्शन 2009 में पार्टी द्वारा जीती गई 21 सीटों की रिकॉर्ड से काफी नीचे था। यह हार तब हुई थी जब बसपा के पास देश भर में तीसरे सबसे अधिक वोट शेयर (4.2%) है। बसपा उत्तर प्रदेश विधानसभा में भी 2007 में 206 सीटों के उच्च स्तर से 2017 के चुनावों में सिर्फ 19 सीटों पर रही। सीटों में लगभग 90% की गिरावट दर्ज की गई। 2014 में, यह भाजपा थी जिसने लोकसभा की 80 में से 71 सीटें जीतकर राज्य में जीत हासिल की थी। तीन साल बाद, भगवा पार्टी ने 312 विधानसभा सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई।
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