यूपी चुनाव में चंद्रशेखर: बसपा के साथ ही क्यों गठबंधन करना चाहते हैं आसपा चीफ, क्या है भविष्य?
लखनऊ, 16 दिसंबर। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2022 की तैयारी में सभी पार्टियां दम लगा रही हैं। भाजपा और सपा छोटे दलों के साथ गठबंधन कर आमने-सामने है। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी के नेतृत्व में पार्टी इस बार सबसे ज्यादा किसान और महिला वर्ग को टारगेट कर रही है। बसपा अपने दम पर चुनाव लड़ने में जुटी हुई है। उत्तर प्रदेश में दलित, ओबीसी और मुस्लिम वोटों का ऐसा समीकरण है जो सत्ता में उलटफेर करता रहा है। इस चुनाव में मुस्लिम वोट पर दावेदारी करने के लिए असदुद्दीन ओवैसी अपनी पार्टी एआईएमआईएम के साथ उतरे हैं। शिवपाल यादव और भतीजे अखिलेश के बीच गठबंधन तय हो चुका है। इस चुनाव में एक और अहम किरदार हैं भीम आर्मी चीफ चंद्रशेखर जिन्होंने आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) बनाई है और दलित वोटों पर दावेदारी करते हैं। यूपी चुनाव में इस बार सबसे ज्यादा मारामारी दलित वोटों के लिए है। दलित वोटबैंक पर बसपा की पकड़ कमजोर पड़ने के बाद जो पार्टियां उसे अपनी तरफ रिझाने में लगी है उनमें आजाद समाज पार्टी सबसे आगे है। चंद्रशेखर यूपी में पहले हुए चुनावों में भी बसपा के साथ गठबंधन की कोशिशें करते रहे लेकिन मायावती ने साफ मना कर दिया। यूपी की दलित राजनीति में चंद्रशेखर अपनी पैठ बनाना चाहते हैं और गठबंधन के लिए बसपा ही क्यों उनकी प्राथमिकता है, इसके पीछे कई वजहें हैं।

भीम आर्मी सामाजिक संगठन, आजाद समाज पार्टी राजनीतिक दल
चंद्रशेखर आजाद खुद को भीमराव अंबेडकर और कांशीराम के अनुयायी कहते हैं। 2017 में सहारनपुर जिले के शब्बीरपुर में हुई दलित-ठाकुर जातीय हिंसा में आरोपी बनाए जाने के बाद पहली बार उनका नाम मीडिया की सुर्खियों में आया था। दलितों और वंचितों के लिए काम करने वाले सामाजिक संगठन भीम आर्मी के अध्यक्ष के तौर पर उन्होंने अपनी पहचान बनाई। सहारनपुर हिंसा में उनकी गिरफ्तारी हुई और उनके खिलाफ एनएसए लगाया गया। कई महीने वे जेल में भी रहे। कांशीराम ने जिस तरह से पहले दलितों के हक में संघर्ष के लिए सामाजिक संगठन बामसेफ और डीएसफोर बनाया था, उसके बाद चुनाव लड़ने के लिए बहुजन समाज पार्टी की स्थापना की थी, ठीक उसी तरह से चंद्रशेखर आजाद पहले सामाजिक संगठन भीम आर्मी के सह संस्थापक बने और चुनावी राजनीति में उतरने के लिए कांशीराम की जयंती पर 15 मार्च 2020 को आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के गठन का ऐलान किया। कांशीराम ने अंबेडकर के जिस दलित आंदोलन को आगे बढ़ाया, अब चंद्रशेखर खुद को उस आंदोलन का अगुवा कहते हैं। इसलिए वे कांशीराम की बसपा के साथ अपना रिश्ता जोड़ने की कोशिश करते रहे हैं लेकिन मायावती ने उनकी कोशिशों को कभी सफल नहीं होने दिया।

कांशीराम के मूवमेंट को आगे बढ़ाना चाहते हैं चंद्रशेखर
यूपी में दलितों की आबादी करीब 20 फीसदी है। कांशीराम दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों को बहुजन कहते थे और इनके जीवन में बदलाव वे मूवमेंट के जरिए लाना चाहते थे। राजनीतिक सत्ता में भागीदारी भी उनके मूवमेंट की विचारधारा का हिस्सा था। बसपा बनाकर वे यूपी की सत्ता तक पहुंच भी गए और दलित मायावती को उन्होंने मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठाया। यूपी के दलितों के बीच कांशीराम ने जनाधार बनाया और बसपा दलितों की पार्टी कही जाने लगी। कांशीराम की उत्तराधिकारी मायावती आगे चलकर दलितों की राजनीति की लाइन से हट गई और सवर्णों में खासकर ब्राह्मण वोट के लिए बहुजन हिताय की जगह सर्वजन हिताय का नारा दिया। मायावती के नेतृत्व में बसपा का जनाधार दलितों में कम हुआ। फिर भी बसपा की पहचान दलितों की पार्टी के तौर पर ही है। चंद्रशेखर बसपा को मायावती की नहीं, कांशीराम की पार्टी कहते हैं। दलित राजनीति के जरिए सत्ता तक पहुंचने वाली बसपा के साथ मिलकर काम करने में ही चंद्रशेखर अपना भविष्य देखते हैं। चंद्रशेखर ने भीम आर्मी और आजाद समाज पार्टी के जरिए दलित चेहरे के तौर पर भले ही अपनी पहचान बनाई हो लेकिन अभी तक उनका कोई राजनीतिक कद नहीं बन पाया है। दलितों की राजनीति करने की वजह से ही बसपा उनकी पहली पसंद हैं लेकिन मायावती चंद्रशेखर को खतरे के तौर पर देखती हैं।

चंद्रशेखर के प्रति मायावती का क्या है रवैया?
2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान मायावती ने खुलकर चंद्रशेखर को भाजपा का एजेंट बताया था। उन्होंने कहा था कि बसपा के दलित वोट को काटने के लिए चंद्रशेखर को भाजपा ने खड़ा किया है। पहले शब्बीरपुर कांड कराया फिर चंद्रशेखर को जेल भेजा और फिर लोकसभा चुनाव से पहले उसे रिहा कराया। मायावती ने कहा था कि भाजपा ने भीम आर्मी संगठन को बनवाया है और चंद्रशेखर को बसपा में घुसाने की साजिश रच रही है ताकि उसके जरिए गुप्तचरी हो सके। मायावती चंद्रशेखर के खिलाफ बयान देती रही हैं और इधर चंद्रशेखर मायावती को मनाने की कोशिश करते रहे हैं। हाल में उन्होंने मायावती को यहां तक प्रस्ताव दे दिया कि अगर 2022 के चुनाव में बसपा साथ दे तो 2024 में मायावती को वो प्रधानमंत्री बनवा देंगे। इसी सप्ताह एक न्यूज चैनल के साथ बातचीत में चंद्रशेखर ने फिर मायावती के साथ बातचीत करने की मंशा जाहिर की। बहरहाल, चंद्रशेखर यूपी चुनाव 2022 में केतली चुनाव चिन्ह के साथ उतरने की तैयारी कर रहे हैं और गठबंधन के लिए साथी तलाश रहे हैं।

'कांशीराम की सैद्धांतिक विरासत मेरे पास है'
चंद्रशेखर कहते हैं कि कांशीराम की राजनीतिक विरासत मायावती के पास है लेकिन सैद्धांतिक विरासत मेरे पास है। चंद्रशेखर और उनके समर्थकों ने हाथरस कांड के खिलाफ जबर्दस्त प्रदर्शन किया था। सीएए-एनआरसी के खिलाफ प्रदर्शन कर चंद्रशेखर गिरफ्तार भी हुए थे। किसान आंदोलन को भी उन्होंने समर्थन दिया। इस तरह से चंद्रशेखर बहुजन को साधने में लगे हैं। मायावती खुद को दलितों का एकमात्र नेता मानती हैं। चंद्रशेखर भी खुद को कांशीराम की तरह बहुजन का नेता कहते हैं। चंद्रशेखर और उनके संगठन का असर पश्चिमी यूपी के दलितों पर माना जाता है लेकिन यह वोट में कितना बदल पाएगा, इसका आंकलन अभी नहीं हो सका है। दलितों का चेहरा बनकर उभरे चंद्रशेखर आजाद फिलहाल राजनीतिक वजूद के लिए संघर्ष कर रहे हैं। बिहार चुनाव में उनको कोई खास सफलता नहीं मिल पाई लेकिन यूपी पंचायत चुनाव में आजाद समाज पार्टी को पश्चिमी यूपी में सफलता मिली। चंद्रशेखर आजाद समाज पार्टी का विस्तार करने में लगे हैं और यूपी चुनाव 2022 उनके लिए बहुत अहम है। चंद्रशेखर की पार्टी उत्तराखंड, मणिपुर, गोवा और पंजाब चुनाव भी लड़ रही है।। कांशीराम की विरासत को वो मायावती के रहते हुए कैसे आगे ले जा पाएंगे, यह उनके सामने बड़ी चुनौती है। वैसे दलित वोटबैंक के लिए चंद्रशेखर का साथ अखिलेश देंगे कि नहीं, अभी साफ नहीं हो पाया है।
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