पुलिस के खेल का शिकार, भाई के गुनाह के लिए काटी दस साल की जेल
"पुलिस ने मेरे भाई की जगह गिरफ्तार कर मुझे जेल भेज दिया, क्योंकि उन्हें केस के लिए एक बंदे की जरूरत थी, भले ही वो बेगुनाह हो और मैं किसी प्रमाण-पत्र के जरिए खुद अपने आप को साबित ना कर सका।"
बिजनौर। उत्तर प्रदेश के बिजनौर में पुलिस ने अपना 'गुड वर्क' दिखाने के लिए एक भाई के जुर्म में दूसरे भाई को जेल भेज दिया और ये शख्स दस साल तक जेल में बंद रहा। दस साल जेल में काटने के बाद इसी शुक्रवार को बाला सिंह नाम का ये शख्स रिहा हुआ है।

शु्क्रवार को 43 साल के बाला सिंह जेल से बाहर आए तो मीडिया के कई लोग गेट पर मौजूद थे, एक ऐसे शख्स की कहानी जानने के लिए जो दस साल से जेल में बंद था, बिना किसी गुनाह के। बाला ने जेल से छूटने पर कहा कि मैंने अपनी जिंदगी के सबसे अहम दस साल जेल में बिता दिए क्योंकि पुलिस ने मुझे मेरे भाई पप्पू की जगह मुझे गिरफ्तार कर जेल भेज दिया और मैं बाला होते हुए भी खुद को बाला साबित ना कर सका क्योंकि मेरे पास कोई ऐसा प्रमाण-पत्र नहीं था।
दस साल बाद फिंगर प्रिंट ने खोला राज
पुलिस ने बताया कि 2001 में बिजनौर के सबुदाला गांव में हुई एक हत्या के मामले में चार लोगों को नामजद किया गया था, जिसमें बाला के भाई पप्पू का भी नाम था। तीन लोगों को तो पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया लेकिन पप्पू फरार हो गया। कोर्ट के लगातार दबाव के चलते पुलिस ने 30 अप्रैल 2006 को पप्पू के भाई बाला सिंह को गिरफ्तार कर उसे पप्पू कहते हुए कोर्ट में पेश कर दिया और जेल भेज दिया। तमाम कोशिशों के बावजूद बाला खुद को बाला साबित ना कर सका और पप्पू बनकर जेल काटता रहा। जेलर डीसी मिश्रा ने बताया कि एक पुराने केस में पप्पू के फिंगरप्रिंट हमारे पास थे, हमने जब बाला के फिंगरप्रिंट पुराने फिंगरप्रिंट से मिलान के लिए लैब भेजे तो हमें पता चला कि दरअसल दोनों अलग-अलग आदमी है। जिसके बाद बाला की रिहाई हो सकी।
बाला सिंह का कहना है ''जेल से बाहर आ गया हूं लेकिन 33 साल का आदमी आज 43 साल का है, मेरी जवानी के दस साल कौन देगा मुझे? मेरे ऊपर उस वक्त जो जिम्मेदारियां थीं, मेरे जो सपने थे उनका क्या होगा? उनके साथ कौन इंसाफ करेगा?'' इतना कहते हुए बाला फूट-फूट कर रोने लगते हैं। ऐसे में उनके पास खड़े रिश्तेदार और घर के लोग उनका ढांढ़स बंधाते हैं। रायपुर सादात पुलिस स्टेशन के अन्तर्गत आने वाले साहूवाला में बाला का परिवार रहता है। मेहनत-मजदूरी करने वाला परिवार 10 साल पहले आसानी से अपना गुजर-बसर कर रहा था लेकिन बाला के जेल जाने के बाद परिवार की आर्थिक हालत बदतर हो गई है।












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