आवेदन शुल्क रखने के पीछे कांग्रेस का प्लान: "नॉन सीरियस कैंडिडेट" छटेंगे, फंड मिलने से सुधरेगी आर्थिक सेहत
लखनऊ, 18 सितंबर: उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने अपने प्रत्याशियों के लिए नया फरमान जारी किया है। कांग्रेस से टिकट लेने के लिए आवेदन के साथ ही सहयोग शुल्क भी लेने का निर्णय लिया है। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो कांग्रेस के रणनीतिकारों ने दो पहलुओं को ध्यान में रखते हुए ऐसा कदम उठाया है। एक तो शुल्क लगने से नॉन सीरियस कैंडिडेट अपने आप बाहर हो जाते हैं तो दूसरे इससे कांग्रेस को आर्थिक स्तर पर भी फायदा होगा। कांग्रेस यूपी में सन 1989 के बाद से ही सत्ता से बाहर है और केंद्र में भी अंतिम बार 2009 में कांग्रेस की सरकार बनी थी। इसकी वजह से कांग्रेस अंदरखाने भी आर्थिक संकट से जूझ रही है जिसकी वजह से उसको ऐसा कदम उठाना पड़ने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।

राज्य इकाई के अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू ने कांग्रेस 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में पार्टी टिकट के लिए प्रत्येक आवेदक से 'सहयोग राशि' (सहयोग शुल्क) के रूप में 11,000 रुपये लेने के लिए तैयार है। पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव के लिए केवल छह महीने के लिए, कांग्रेस न केवल संगठनात्मक अव्यवस्था के कारण, बल्कि अपने बड़े वित्तीय संकट के कारण भी खुद को एक अविश्वसनीय स्थिति में पाती है।
हरियाणा विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस कर चुकी है प्रयोग
यह पहली बार नहीं है जब कांग्रेस टिकट के इच्छुक उम्मीदवारों से पैसा जुटाने की कोशिश कर रही है। हरियाणा में 2019 के विधानसभा चुनाव में, सामान्य श्रेणी के उम्मीदवारों के लिए टिकट के लिए आवेदन शुल्क 5,000 रुपये और अनुसूचित जाति के उम्मीदवारों के लिए 2,000 रुपये निर्धारित किया गया था। दरअसल पिछले लोकसभा चुनाव से एक साल पहले मई 2018 में, कांग्रेस ने अपने समर्थकों से "लोकतंत्र को बहाल करने" में मदद करने का अनुरोध किया था।

चुनाव के समय पार्टियों ने किया था अपनी इनकम का खुलासा
कांग्रेस के एक प्रदेश महासचिव बताते हैं कि,
'' दरअसल 2004 में, जब कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सत्ता में आई, तो पार्टी ने 153 करोड़ रुपये की आय का खुलासा किया। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली भाजपा, जो अपने एनडीए सहयोगियों के साथ छह साल तक सत्ता में रही, ने 91.5 करोड़ रुपये की आय बताई थी। वित्तीय वर्ष 2013-14 तक कांग्रेस सबसे अधिक घोषित आय वाली पार्टी बनी रही। हालांकि, 2019-20 तक भाजपा की घोषित आय 3,623 करोड़ रुपये थी, जो कांग्रेस के 682.2 करोड़ रुपये से लगभग 400 प्रतिशत अधिक थी।''
कई राज्यों में सरकारें न होना भी आर्थिक तंगी की वजह
कांग्रेस के एक पदाधिकारी कहते हैं कि वर्तमान में, केवल तीन राज्य हैं जहां कांग्रेस के मुख्यमंत्री हैं। पंजाब, राजस्थान और छत्तीसगढ़। तीनों में, पिछले एक साल में उथल-पुथल देखी जा रही है। इसके अलावा कांग्रेस पार्टी महाराष्ट्र, तमिलनाडु और झारखंड में क्षेत्रीय दलों के साथ भी सत्ता साझा कर रही है, लेकिन इसके मंत्रियों के पास वैसा कोई मंत्रालय नहीं है जिससे वो पार्टी की मदद कर सकें। दरअसल सरकार में जब आप अच्छी स्थिति में हाते हैं तो आपके आय की स्रोत भी बढ़ती है लोग पार्टी फंड में अपना योगदान देने के लिए खुद ही आगे आते रहते हैं लेकिन अभी ऐसी स्थिति नहीं है जिसकी वजह से परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

भाजपा के पास 12 राज्यों में सरकार, 6 राज्यों में सत्ता में हिस्सेदारी
इस बीच, भाजपा के पास 12 राज्यों में अपने मुख्यमंत्री हैं और छह और राज्यों में सत्ता का हिस्सा है। साथ ही पिछले दो बार से बीजेपी केंद्र की सत्ता में बनी हुई है। इससे बाजार के निवेशकों और उद्योगपतियों के लिए भी बीजेपी में इनवेस्ट करना और अपने काम के बदले पार्टी फंड में पैसा देना आसान होता है। कांग्रेस पार्टी के पदाधिकारी ने कहा कि,"यही कारण है कि कांग्रेस के लिए राज्य के चुनाव जीतना उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि केंद्र में सरकार बनाना। राज्यों में एक के बाद एक सत्ता हाथ से निकलती जा रही है। एक समय था जब कांग्रेस के पास अधिकांश राज्य थे तब वो खुद ही पार्टी के प्रत्याशियों को चंदा देकर चुनाव लड़ाती थी लेकिन अब परिस्थितयां बदल चुकी हैं।''
विद्यांत कॉलेज में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर मनीष हिन्दवी कहते हैं कि,
'' देखिए कांग्रेस ने 11 हजार रुपए का जो आवेदन शुल्क रखा है उसे दो तरह से देख सकते हैं। पहला यह कि इस आवेदन शुल्क लगने से बहुत सारे नॉन सिरियस उम्मीदवार अपने आप बाहर हो जाते हैं। बहुत लोग इस विचार से आवेदन भर देते हैं कि चलो हम भी फार्म भर देते हैं लेकिन आवेदन शुल्क लगने से उम्मीदवार कम सामने आएंगे। जबकि दूसरा पहलू यह है कि कांग्रेस लंबे समय से सत्ता से बाहर रही है और अभी केवल तीन राज्यों में ही उनकी सरकार है। उनके पास आर्थिक स्तर पर भी संकट की स्थिति है। ऐसे में पार्टी भी यह सोचती है कि चलो इसी बहाने कुछ फंड मिल जाएगा जिससे चुनावी खर्च निपट जाएगा।''
इलेक्ट्रोरल बांड का फायदा भी कांग्रेस को नहीं मिल रहा है
हिन्दवी ने कहा कि यूपी की 403 विधानसभ क्षेत्रों से आवेदन पर गौर किया जाए तो यदि हम एक विधानसभा में दस उम्मीदवार भी औसतन रखते हैं तो करीब चार करोड़ से उपर की धनाराशि एकत्र हो जाएगी। यह एक औसत है उम्मीदवारों की संख्या ज्यादा भी हो सकती है।

"2017-18 में, मोदी सरकार ने राजनीतिक दलों को दान करने के लिए चुनावी बांड की शुरुआत की, जिसकी कोई ऊपरी सीमा नहीं थी। लेकिन आंकड़े बताते हैं कि इन बांडों से बीजेपी को सबसे ज्यादा फायदा हुआ है। वित्त वर्ष 2018 से जारी इलेक्टोरल बॉन्ड में से बीजेपी को 68 फीसदी चंदा मिला है, कांग्रेस को 11 फीसदी, जबकि बाकी 21 फीसदी अन्य सभी राजनीतिक दलों को मिला है।"












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