क्या आजम खान से पिंड छुड़ाना चाहते हैं अखिलेश यादव?
लखनऊ, 24 अप्रैल: क्या अखिलेश-मुलायम, आजम खान से पिंड छुड़ाना चाहते हैं? क्या वे चाहते हैं कि आजम खान जेल के अंदर ही रहे? सबसे पहले यह सवाल योगी आदित्यनाथ ने चुनाव के समय उठाया था। लेकिन अब एक महीने बाद शिवपाल यादव ने इसी सवाल को दोहराया है। उन्होंने कहा है, आजम खान दो साल से जेल में बंद हैं। लेकिन अखिलेश और नेता जी (मुलायम) ने उन्हें बाहर निकालने के लिए कोई संघर्ष नहीं किया। क्या आजम खान बेहद नाराज हैं और शिवपाल यादव उन्हीं के अल्फाज अपने मुंह से कह रहे हैं? आजम खान के समर्थक अखिलेश के रवैये से नाराज हैं। वे अपनी नाराजगी का अब खुल कर इजहार भी कर रहे हैं। अगर आजम खान अखिलेश यादव से नाराज हुए तो सपा पर इसका क्या असर पड़ेगा? सवाल का एक दूसरा पहलू भी है। क्या अखिलेश, आजम खान को अपनी राजनीति के लिए अपरिहार्य नहीं मानते, इसलिए उनकी अनदेखी कर रहे हैं?
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दो को किनारे लगाया, अब तीसरे की बारी!
राजनीतिक पंडितों का कहना है कि अखिलेश सपा को नये सांचे में ढालना चाहते हैं। वरिष्ठ नेता उनकी सोच को साकार करने में बाधा बन रहे हैं। इसलिए वे अपने मार्ग के अवरोध को एक-एक कर किनारे लगा रहे हैं। मुलायम सिंह यादव, आजम खान, शिवपाल यादव सपा को खड़ा करने वाले नेता हैं। मुलायम सिंह अब बुजुर्ग हो चले हैं। बीमार भी रहते हैं। अखिलेश ने पहले मुलायम सिंह को दरकिनार किया। फिर शिवपाल यादव को सपा से अलग होना पड़ा। उन्हें प्रगतिशील समाजवादी पार्टी बनानी पड़ी। अब बचे आजाम खान। कहा जा रहा है अखिलेश यादव आजम खान के मामले में जानबूझ कर चुप्पी साधे हुए हैं ताकि वे जेल में रह कर अप्रासंगिक हो जाएं। विधानसभा चुनाव के समय ही ये बात साफ हो गयी थी कि अखिलेश अब आजम खान और शिवपाल यादव को कोई तबज्जो नहीं देने वाले। आजमा खान ने अपने 12 समर्थकों के लिए टिकट मांगे थे। लेकिन अखिलेश ने इंकार कर दिया था। सिर्फ आजम खान और उनके बेटे अबदुल्ला आजम को टिकट मिला था। इसी तरह शिवपाल ने अखिलेश यादव के साथ मिल कर चुनाव लड़ने का फैसला लिया था। उन्होंने कम से कम 35 सीटें मांगी थीं। लेकिन शिवपाल की नयी नवेली पार्टी के किसी नेता को सीट नहीं मिली। सिर्फ शिवपाल को ही एक सीट मिली थी। मुलायम सिंह के जमाने में शिवपाल और आजम खान की तूती बोलती थी। लेकिन अखिलेश ने इनको हाशिये पर डाल रखा है। दोनों अपनी डूबती राजनीति को बचाने के लिए छटपटा रहे हैं। इसलिए अब शिवपाल ने आजम खान का मुद्दा उठा कर अखिलेश यादव पर वार किया है।

आजम खान को नेता प्रतिपक्ष क्यों नहीं बनाया?
2022 के विधानसभा चुनाव रिजल्ट के बाद मायावती ने कहा था, बसपा की हार की सबसे बड़ी वजह ये थी कि मुस्लिम वोटर सपा की तरफ चले गये। ये बात सही भी है। इस बार सपा ने 47 से 111 की छलांग लगायी। सीटों की यह बढ़ोतरी मुस्लिम समुदाय के जनसमर्थन से ही मुमकिन हुई। 2022 में सपा के 34 मुस्लिम विधायक जीते हैं। लेकिन अब मुस्लिम नेता अखिलेश से नाराज बताये जा रहे हैं। पिछले महीने अखिलेश यादव जब खुद नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी पर काबिज हो गये तो आजम खान के समर्थकों को ये बात अखर गयी। उनका कहना था कि आजम खान दसवीं बार विधायक बने हैं। वे सपा के सबसे वरिष्ठ विधायकों में एक हैं। ऐसे में अगर वे नेता प्रतिपक्ष बनते तो जेल से बाहर आने की कानूनी लड़ाई में उन्हें मदद मिल सकती थी। अखिलेश यादव पूर्व मुख्यमंत्री रह चुके थे। उन्हें आजम खान के प्रति उदारता दिखानी चाहिए थी। अपोजिशन लीडर बनना अखिलेश यादव के लिए उतना महत्वपूर्ण नहीं था जितना आजम खान के लिए था।

अगर आजम नाराज हुए तो क्या होगा ?
जब 1989 में मुलायम सिंह पहली बार मुख्यमंत्री बने थे तब उन्होंने आजम खान के साथ मिल कर यादव-मुस्लिम का जिताऊ समीकरण बनाया था। धीरे-धीरे आजम खान की गिनती बड़े मुस्लिम नेता के रूप में होने लगी। मुस्लिम समाज में उनकी पैठ बढ़ी तो वे सपा के मजबूत नेता बन के उभरे। लेकिन 2009 में जयाप्रदा के मुद्दे पर उनकी मुलायम सिंह यादव से ठन गयी थी। 2009 के लोकसभा चुनाव में अमर सिंह के कहने पर मुलायम सिंह ने जयाप्रदा को रामपुर से टिकट दिया था। आजम खान ने इसका विरोध किया। चुनाव के समय भी आजमा खान ने जयाप्रदा को हराने की भरपूर कोशिश की। लेकिन इसके बाद भी जयाप्रदा जीत गयीं थीं। तब मुलायम सिंह यादव मुस्लिम समुदाय में सबसे लोकप्रिय नेता थे। उनका कद आजम खान से बड़ा था। 16 मई को नतीजे घोषित हुए। आजम खान के विरोध के बाद भी जयाप्रदा ने रामपुर से चुनाव जीत लिया था। इसके एक हफ्ते बाद ही मुलायम सिंह ने आजम खान को सपा से निकाल दिया था। तब यूपी की राजनीति में मुलायम सिंह की इतनी पकड़ थी कि आजम खान उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाये। 2010 में वे फिर सपा में आ गये। लेकिन अब परिस्थिति बदली हुई है। अखिलेश की वो हैसियत नहीं है जो मुलायम सिंह यादव की हुआ करती थी। जेल में बंद होने से मुस्लिम समाज की सहानुभूति आजम खान से जुड़ी हुई है। उनका आरोप है कि अखिलेश यादव मुसलमानों के हक में कुछ भी नहीं बोल रहे। इसके विरोध में सपा के एक मुस्लिम नेता सलमान जावेद ने इस्तीफा दे दिया था। अगर नाराज मुस्लिम समुदाय अगले चुनाव में बसपा की तरफ चला गया तो क्या होगा ? 2007 में मुस्लिम समुदाय के जनसमर्थन से ही मायावती सत्ता में आयीं थीं। अगर अखिलेश यूं ही खामोश रहे तो इतिहास फिर अपने को दोहरा सकता है।












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