कन्नौज से कट गया लालू यादव के दामाद का टिकट, अखिलेश यादव ने कन्नौज से भरा नामांकन

समाजवादी पार्टी ने कन्नौज लोकसभा सीट से तेज प्रताप यादव को अपना उम्मीदवार घोषित किया था। लेकिन अब अखिलेश ने खुद यहां से चुनाव लड़ने का फैसला किया है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने भतीजे तेज प्रताप यादव का टिकट काट कर खुद कन्नौज लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र से नामांकन दाखिल कर दिया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक कन्नौज में तेज प्रताप यादव के चुनाव लड़ने से पार्टी कार्यकर्ता नाखुश नजर रहे थे। पार्टी के स्थानीय कार्यकर्ता और अन्य नेता अखिलेश यादव को ही कन्नौज से चुनाव लड़ने की मांग कर रहे थे। उन्होंने अखिलेश यादव से अपना फैसला बदलने की गुजारिश की थी।

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इससे पहले कन्नौज से चुनाव लड़ने को लेकर अखिलेश यादव का रिएक्शन आया था। उन्होंने कहा था कि जब प्रत्याशी नामांकन करेगा तो पता चल जाएगा कि वहां से उम्मीदवार कौन है। आजतक की रिपोर्ट के मुताबिक अखिलेश ने कहा, 'आप बस नामांकन तक के लिए इंतजार करिए। नामांकन होगा तो अपने आप पता चल जाएगा कि कौन चुनाव लड़ने जा रहा है।'

कन्नौज के बारे में बात करते हुए अखिलेश यादव ने कहा था कि यहां की जनता जो कहेगी वो वो करेंगे। आजतक की रिपोर्ट के मुताबिक, पार्टी इस संबंध में जल्द ही कोई अंतिम और आधिकारिक फैसला लेने वाली है।

बता दें कि 22 अप्रैल को समाजवादी पार्टी ने अपने उम्मीदवारों की लिस्ट जारी की थी, इस लिस्ट में दो उम्मीदवारों के नाम थे। जिसमें कन्नौज सीट से सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अपने परिवार के सदस्य और लालू प्रसाद यादव के दामाद तेज प्रताप यादव को मैदान में उतारा था

पहले से ही ये दावा किया जा रहा था कि अखिलेश यादव 25 अप्रैल को कन्नौज सीट से नामांकन दाखिल कर सकते हैं। इससे पहले खबर यह थी कि समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव लोकसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे।

माना जा रहा था कि अखिलेश अब उत्तर प्रदेश में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका निभाना चाहते हैं और 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए यूपी में बने रहना चाहते हैं। इससे पहले अखिलेश यादव ने मैनपुरी के करहल से विधायक बनने के बाद आजमगढ़ लोकसभा सीट से इस्तीफा दे दिया था।

नेता प्रतिपक्ष बनना अधिक फायदेमंद

एक विधायक की तुलना में सांसद का पद भले ही श्रेष्ठ माना जाता हो मगर नेता प्रतिपक्ष के पास कैबिनेट मंत्री की तरह कई अधिकार होते हैं। प्रदेश की सियासत के आधार पर भी नेता प्रतिपक्ष का पद अहम माना जाता है। जबकि सांसद के पास निधि और कुछ विशेषाधिकार ही होते हैं। यही वजह थी कि अखिलेश ने सांसद रहने के बजाए विधायक बनना चुना था।

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