आजमगढ़-रामपुर के बाद अब "मैनपुरी-रामपुर" में BJP बढ़ाएगी अखिलेश यादव की टेंशन

समाजवादी पार्टी (Samajwadi Party) को अपने दो गढ़ों मैनपुरी लोकसभा सीट और रामपुर विधानसभा सीट को सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (Bhartiya Janta Party) से बचाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाना पड़ेगा। अखिलेश के नेतृत्व वाली पार्टी इसी तरह के प्रयास में विफल रही थी जब बीजेपी ने आजमगढ़ और रामपुर संसदीय सीटों को उससे छीन लिया था। मैनपुरी और रामपुर में पांच दिसंबर को उपचुनाव होंगे और आठ नवंबर को नतीजे आएंगे। सूत्रों की माने तो जिस तरह से बीजेपी आजमगढ़-रामपुर लोकसभा उपचुनाव में अखिलेश को हराया था उसी तरह अब वह मैनपुरी-रामपुर में होने जा रहे उपचुनाव में दोबारा झटका देने की तैयारी में जुटी हुई है।

योगी आदित्यनाथ

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    मोदी लहर में भी बीजेपी नहीं जीत पाई ये दोनों सीटें

    रामपुर-मैनपुरी दोनों ही सपा के ऐसे अभेद्य किले थे कि भाजपा 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में मोदी-भाजपा की लहरों में जीत नहीं पाई और 2017 और 2022 के यूपी विधानसभा चुनावों में रामपुर में विफल रही। यह पूछे जाने पर कि सपा किन सीटों को बरकरार रखने के लिए मैदान में उतरेगी, राष्ट्रीय सचिव और राज्य के प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी ने कहा कि, "पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पार्टी के शीर्ष नेताओं के साथ बैठकर फैसला करेंगे। लेकिन पार्टी से चाहे जो भी नामांकन दायर करे, वह दोनों सीटों पर जीत हासिल करेगी।

    परिवार के किसी सदस्य पर ही दांव लगांऐंगे अखिलेश

    चुनाव आयोग ने शनिवार को दोनों सीटों पर चुनाव की घोषणा कर दी, लेकिन मुलायम के पोते और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के दामाद तेज प्रताप सिंह यादव का नाम तेजी से अंदरखाने चल रहा है। मुलायम के 10 अक्टूबर को निधन के बाद। दरअसल, 34 वर्षीय तेज प्रताप सिंह यादव ने 2014 के लोकसभा उपचुनाव (जब मुलायम ने आजमगढ़ को बरकरार रखने के लिए इसे खाली किया था) में उसी सीट पर जीत हासिल की थी, जब अखिलेश यादव यूपी के मुख्यमंत्री थे। 2019 में जब मुलायम ने मैनपुरी सीट से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की तो तेज प्रताप उनके चुनाव प्रभारी थे।

    मैनुपरी का उपचुनाव सपा के लिए आसान नहीं होगा

    इटावा के सैफई में एक स्थानीय पत्रकार ओवेस सिंह ने कहा कि, "मैनपुरी का चुनाव सपा के लिए मुश्किल होगा। भाजपा सीट जीतने की हर मुमकिन कोशिश करेगी। भाजपा एक संयुक्त ताकत है जबकि यादव परिवार विभाजित है।'' हालांकि प्रगतिशील समाजवादी पार्टी-लोहिया (पीएसपी-एल) के प्रमुख शिवपाल यादव, जिनके बारे में ऐसी अटकलें थीं कि वह खुद को अपने बड़े भाई मुलायम सिंह यादव की राजनीतिक विरासत के उत्तराधिकारी के रूप में पेश करना चाहते थे, अभी अपना रुख स्पष्ट नहीं कर रहे हैं।

    मुलायम के निधन के बाद अखिलेश-शिवपाल में घटी हैं दूरियां

    ओवैस कहते हैं कि,

    ''हालांकि शिवपाल और अखिलेश के बीच अनबन के बावजूद शिवपाल ने अपने मूल संबंध को बनाए रखा है। हालांकि, अगर शिवपाल सपा के खिलाफ चुनाव में हिस्सा लेने का फैसला करते हैं, तो सपा की मुश्किल और बढ़ जाएगी। शिवपाल जसवंत नगर विधानसभा सीट से मौजूदा विधायक हैं, जिसका एक बड़ा हिस्सा मैनपुरी निर्वाचन क्षेत्र का हिस्सा है। सपा प्रमुख अखिलेश मैनपुरी के एक अन्य विधानसभा क्षेत्र - करहल से विधायक हैं। शिवपाल का मैनपुरी सदर, किशनी और भोगांव विधानसभा क्षेत्रों पर भी खासा प्रभाव माना जाता है।''

    रामपुर में आजम परिवार पर ही दांव लगाएगी सपा

    इधर, मैनपुरी की तुलना में रामपुर की स्थिति थोड़ी स्पष्ट दिखती है। संभावना है कि आजम को उनकी पत्नी तज़ीन फातिमा या उनकी बहू स्वार से विधायक अब्दुल्ला आजम की पत्नी मिल जाएंगी। तज़ीन ने 2019 में एक बार उपचुनाव में सीट जीती थी जब आजम ने रामपुर एलएस सीट पर अपनी जीत के बाद इसे खाली कर दिया था। 73 वर्षीय तज़ीन की तबीयत ठीक नहीं है। सपा को हाल ही में रामपुर उपचुनाव में हार का सामना करना पड़ा था। राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो आजम परिवार से किसी को मैदान में नहीं उतारने से पार्टी को रामपुर उपचुनाव में हार का सामना करना पड़ासपा के पूर्व जिलाध्यक्ष वीरेंद्र सिंह ने कहते हैं,

    ''देखते हैं कि आजम खान रामपुर सीट से चुनाव लड़ने के लिए किसे चुनते हैं। उनका एक बड़ा परिवार है और रामपुर भी उनका परिवार है। जो भी होगा उनकी मर्जी से ही तय होगा। पार्टी के चीफ जल्द ही इसपर कोई निर्णय लेंगे।"

    दरअसल 2019 के अभद्र भाषा के मामले में रामपुर के एमपी-एमएलए अदालत द्वारा तीन साल की जेल की सजा के बाद अपने विधायक आजम खान की अयोग्यता के कारण मुलायम सिंह यादव और रामपुर विधानसभा सीट के निधन के बाद मैनपुरी खाली हो गई थी। दोनों सीटों पर सपा परिवार के सदस्यों को मैदान में उतार सकती है। दोनों सीटों पर सपा के लिए सहानुभूति सबसे बड़ा कारक है। मुलायम की मौत और आजम खां पर हो रहे कथित अत्याचार को पार्टी मुद्दा बनाएगी।

    आकाश सक्सेना पर बीजेपी लगा सकती है दांव

    यह सीट आजम खान ने 10 बार और उनकी पत्नी तजीन फातमा ने एक बार जीती। भाजपा या जनसंघ ने इसे कभी नहीं जीता। देखना होगा कि रामपुर सीट पर बीजेपी फिर से आकाश सक्सेना को मैदान में उतारती है या नहीं। उन्होंने 2022 के चुनाव में आजम के खिलाफ सीट से चुनाव लड़ा था और दूसरे नंबर पर रहे थे। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त को पत्र लिखा था जिसमें खान की सजा और एमपी-एमएलए अदालत द्वारा तीन साल की जेल की सजा के मद्देनजर विधान सभा के रूप में आजम खान की सदस्यता समाप्त करने की मांग की गई थी।

    पीएसपी-एल नेता दीपक मिश्रा ने कहते हैं कि,

    "शिवपाल जी ने कहा था कि मैनपुरी उपचुनाव के लिए पीएसपी-एल का संसदीय बोर्ड पार्टी की दिशा तय करेगा। एक तो यह निश्चित है कि शिवपाल जी जो कुछ भी करेंगे वह नेताजी (मुलायम) की राजनीतिक विरासत के अनुरूप और सम्मान के साथ होगा।''

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