Mahakal lok में टूटी मूर्तियों से क्या किसी अपशगुन की आशंका?, क्या कहते हैं ज्योतिषाचार्य
महाकाल लोक में तूफान से हुए नुकसान को लेकर ज्योतिषाचार्य अमर डब्बावाला ने अपना मत रखते हुए कहा की मूर्ति स्थापना से पहले की शासन-प्रशासन को शास्त्र के दृष्टिकोण से चिंतन कर लेना चाहिए था।

धार्मिक नगरी उज्जैन में रविवार की देर शाम आंधी और तूफान के चलते महाकाल लोक में भारी नुकसान हुआ था, जहां आंधी और तूफान के चलते महाकाल लोक में स्थित सप्तर्षियों की मूर्ति के साथ ही कई और भी मूर्तियां क्षतिग्रस्त हो गई थी। वहीं आंधी तूफान के बीच मूर्तियां टूटने के घटनाक्रम से ही आम जन में आक्रोश दिखाई दे रहा है तो वहीं सोशल मीडिया पर भी लोगों ने अपना आक्रोश व्यक्त किया। उधर, धार्मिक नगरी उज्जैन में ज्योतिषाचार्य अमर डब्बावाला ने अपना मत रखते हुए कहा की मूर्ति स्थापना से पहले की शासन-प्रशासन को शास्त्र के दृष्टिकोण से चिंतन कर लेना चाहिए था।
ज्योतिषाचार्य ने रखा मत
उज्जैन के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य अमर डब्बावाला के अनुसार महाकाल महा लोक में जिस प्रकार से मूर्तियां खंडित हुई है, उसके पीछे प्राकृतिक आपदा का प्रभाव तो है ही किंतु यदि हम वास्तु और शास्त्र के दृष्टिकोण से बात करें तो जो मूर्तियां जिस स्थान पर रखी हुई चाहिए थी, उस स्थान पर यथोचित उपचार पूर्व में किया जाता तो घटना नहीं घटती, और मूर्तियां खंडित नहीं होती। इन मूर्तियों को बनाने में क्या वास्तु के दृष्टिकोण से दर्शन किया गया था, या इस संबंध में चर्चा की गई थी, यदि वस्तु की बात करें तो शास्त्र कहता है पत्थर की मूर्तियां या धातु की मूर्तियां विशेष रूप से शास्त्रीय मत से उपयुक्त होती है। यदि मान लें की मूर्तियां उपयुक्त अवस्था में नहीं है, तो सामान्यतः शास्त्र दृष्टिकोण से नहीं माना जाता। शासन ने प्रशासन ने किसी भी प्रकार से इस विषय को लेकर के धर्म शास्त्र से संबंधित कोई चर्चा नहीं की, इस दृष्टिकोण से इस संबंध में चिंतन करने की आवश्यकता है।
ज्योतिषाचार्य ने कही ये बात
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ज्योतिषाचार्य अमर डब्बावाला ने कहा की, यहां पर जिस प्रकार से कार्य की पद्धति है, उस कार्य के संबंध में अलग-अलग प्रकार की विचारधारा सामने आती है। यदि हम बात करें कि जो घटना घटी है, उस घटना या दुर्घटना में यदि शासन-प्रशासन सावधानियां रखता है, या लापरवाही के संबंध का चिंतन पहले से ही कर लेता, यानी जब मूर्ति को स्थापित किया गया था तो उस समय प्राकृतिक आपदा के संबंध का भी चिंतन कर लेना चाहिए था, यदि आंधी आएगी, तूफान आएगा, वर्षा ऋतु होगी तो मूर्तियों पर क्या प्रभाव पड़ेगा, या मूर्ति के वजन के आधार पर उनके स्थापित करण की अवस्था को स्पष्ट कर देना था। इन बातों को बहुत बारीकी से देखने की आवश्यकता थी, किंतु किसी भी प्रकार से जानकारों का अभिमत इस विषय को लेकर नहीं किया गया।
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