उज्जैन: भक्तों की मनोकामना पूरी करते हैं चिंतामण गणेश, भगवान राम, सीता और लक्ष्मण ने किया था पूजन
उज्जैन, 1 सितंबर: इन दिनों देशभर में गणेश उत्सव का पावन पर्व बड़े ही भक्ति भाव के साथ मनाया जा रहा है। प्रदेश के सभी गणेश मंदिरों में पूजन अर्चन का सिलसिला जारी है, तो वहीं मध्य प्रदेश की धार्मिक नगरी उज्जैन में गणेश उत्सव के पावन पर्व का हर्षोल्लास देखने मिल रहा है, जहां शहर के अति प्राचीन चिंतामन गणेश मंदिर में भक्तों की बड़ी संख्या भगवान गणेश का पूजन अर्चन करने के लिए पहुंच रही है। धार्मिक नगरी उज्जैन स्थित भगवान चिंतामन गणेश का यह मंदिर अति प्राचीन है, जहां इतिहास में भी इस मंदिर का उल्लेख है। मंदिर से जुड़ी कई मान्यताएं आज भी प्रचलित है।
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कुछ इस तरह हुई मंदिर की स्थापना
भगवान चिंतामन गणेश का यह मंदिर अति प्राचीन है, जो धार्मिक नगरी उज्जैन में स्थित है। इस मंदिर से जुड़ी कई मान्यताएं आज भी प्रचलित हैं। वहीं जानकारों की मानें तो यह मंदिर अति प्राचीन है। मंदिर के पुजारियों ने कहा कि, मंदिर में विराजमान भगवान गणेश की पूजा, वनवास के दौरान भगवान राम, मां सीता, और लक्ष्मण कर चुके हैं। ऐसा बताया जाता है कि, मंदिर के पास स्थित बावड़ी को भगवान लक्ष्मण ने अपने बाण से अवतरित किया था। वहीं भगवान राम ने चिंतामन गणेश, भगवान लक्ष्मण ने इच्छा मन गणेश, और मां सीता ने सिद्धिविनायक गणेश का पूजन अर्चन किया था।

3 स्वरूप में विराजमान है बप्पा
धार्मिक नगरी उज्जैन स्थित भगवान चिंतामन गणेश का यह मंदिर काफी प्राचीन है, जो मंदिर आने वाले भक्तों को सनातन परंपरा से परिचित कराता है। इस मंदिर में भगवान गणेश की तीन स्वरूपों में पूजा होती है, जिनमें भगवान गणेश यहां चिंतामण, इच्छामन, और सिद्धिविनायक रूप में विराजमान हैं। यह मंदिर देश का एकमात्र ऐसा मंदिर है, जहां 3 स्वरूपों में भगवान गणेश की पूजा-अर्चना होती है। यही कारण है कि, यह मंदिर देश भर में भगवान गणेश के सिद्ध मंदिरों में अपना स्थान रखता है।

दूर-दूर से दर्शन के लिए पहुंचते हैं भक्त
भगवान चिंतामन गणेश का यह मंदिर अत्यधिक प्राचीन और चमत्कारिक होने के कारण यहां दूर-दूर से श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। ऐसी मान्यता है कि, मंदिर में भगवान चिंतामन गणेश के दर्शन करने से भक्तों की हर मनोकामना पूरी होती है। इतना ही नहीं इस मंदिर में उल्टा स्वास्तिक बनाने की परंपरा है। वहीं मंदिर में श्रद्धालु संतान होने के बाद अपनी संतान का वजन करवा कर उन्हें लड्डुओं में तोलते हैं, और फिर इन्हीं लड्डुओं का भोग लगाकर प्रसाद बांटा जाता है।












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