कब लौटेंगी भारत की कलाकृतियां, जवाब किसी के पास नहीं

31 मई, नई दिल्ली। जर्मनी ने नाइजीरिया से साम्राज्यवादी दौर में चुराई गई कलाकृति 'बेनिन ब्रॉन्जेज' लौटाने का फैसला किया है. भारत से भी ब्रिटिश राज के दौरान बड़ी संख्या में कलाकृतियां और हीरे-जवाहारात चुराए गए थे, उनको लेकर संघर्ष जारी है.

the uphill battle to repatriate indias stolen treasures

भारत से चुराए गए और अब ब्रिटेन में रखे गए साज-ओ-सामान की सूची बहुत लंबी है. जाहिर है, ब्रिटेन उस वक्त सबसे बड़ा राज था और भारत उसके ताज का सबसे चमकता नगीना था. जिन कलाकृतियों को चुराकर या तोहफे बताकर भारत से ब्रिटेन ले जाया गया था उनमें 105.6 कैरट का कोहिनूर हीरा भी शामिल है, जो महारानी विक्टोरिया के ताज में सजाया गया. इसके अलावा अमरावती के स्मारक से बुद्ध का स्मृति चिह्न और टीपू सुल्तान से छीना गया लकड़ी का एक बाघ भी शामिल है.

आज ये तमाम कलाकृतियां ब्रिटिश संग्रहालय, पिट रिवर्स म्यूजियम और विक्टोरिया व अलबर्ट म्यूजियम जैसी जगहों पर नुमाइश के लिए रखी गई हैं. विक्टोरिया व अल्बर्ट म्यूजियम में ही कांसे के कई बुत रखे हैं जो बेनिन साम्राज्य से 18वीं सदी में हासिल किए गए थे. यह आज का नाइजीरिया है. इन्हीं में से बहुत से बुत जर्मनी पहुंच गए थे जिन्हें लौटाने का ऐलान हाल ही में किया गया है.

ब्रिटिश राज के दौरान भारत से ब्रिटेन ले जाई गईं कलाकृतियों को लेकर बहुत से भारतीय आज भी संवेदनशील हैं. अनुराग सक्सेना ने 2014 में एक संस्था इंडिया प्राइड प्रोजेक्ट की स्थापना की जिसका मकसद ऐतिहासिक कलाकृतियों को स्वदेश लाना है. वह कहते हैं, "आपने हमारी जिंदगियां छीनीं. हमारे प्राकृतिक संसाधन छीने. हमारी विरासत छीनी. आप हमारी जिंदगियां और संसाधन तो वापस नहीं दे सकते, कम से कम हमारी विरासत तो लौटा दो. जो उसका है, वो अगर आपने नहीं लौटाया तो किसी देश का साम्राज्यीकरण खत्म कहां हुआ?"

सक्सेना की संस्था ने कई योजनाएं शुरू की हैं जिनमें से कुछ पर विवाद भी रहा है. मसलन, 2018 में संस्था के कुछ सदस्य ब्रिटेन के संग्रहालयों में गए और वहां मौजूद कलाकृतियों की तस्वीरें ऐसे कागजों के साथ लीं, जिन पर लिखा था - मैं यहां कैसे आया? या मैं देवता हूं नुमाइश की चीज नहीं.

सक्सेना ने डीडब्ल्यू को बताया कि आईपीपी स्वयंसेवकों का एक नेटवर्क है जो भारत की चुरा ली गई विरासत वापस लाने के लिए काम कर रहा है. सक्सेना मानते हैं कि इतिहास भूगोल से जुड़ा होता है और देशों, संग्रहालयों, नागरिकों व अधिकारियों को समझना चाहिए कि क्यों ऐसा करना (कलाकृतियां लौटाना) एक सही कदम होगा. वह बताते हैं, "हमने एक अकादमिक मुद्दे को सामाजिक अभियान में बदल दिया है."

आईपीपी ने अब तक अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में कई भारतीय कलाकृतियां खोजी हैं लेकिन इनमें से ज्यादातर 1947 के बाद मंदिरों से चुराई गई थीं. मसलन, एक चुराई गई कलाकृति बाद में जर्मनी में मिली और 2019 की अपनी भारत यात्रा के दौरान जर्मन चांसलर अंगेला मैर्केल ने उसे लौटा दिया.

इन कलाकृतियों में सबसे चर्चित नाम कोहिनूर हीरे का है, जिस पर भारत के अलावा, पाकिस्तान और ईरान भी दावा करते रहे हैं. 2016 में इसकी कहानी में तब एक मोड़ आया जब 2016 में भारत के सॉलिसिटर जनरल ने सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान कहा कि यह हीरा ना चुराया गया था, ना ले जाया गया था बल्कि पंजाब के तत्कालीन शासक रणजीत सिंह ने अंग्रेजों की सिखों को मदद की एवज में खुद दिया था. इस बयान के कुछ ही दिन पहले ब्रिटिश राज परिवार के प्रिंस विलियम और उनकी पत्नी कैथरीन भारत दौरे पर गए थे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिले थे. अगर किसी दिन प्रिंस विलियम सम्राट बनते हैं तो ताज उनकी पत्नी के सिर पर होगा.

भारत सरकार के इस बयान ने काफी विवाद पैदा किया था. हालांकि चार साल बाद भारत सरकार ने फिर से ब्रिटिश सरकार से कोहिनूर समेत सारी कलाकृतियां लौटाने का आग्रह किया. इसके जवाब में ब्रिटिश विदेश मंत्रालय ने लिखा, "ब्रिटिश म्यूजियम एक्ट 1963 के तहत राष्ट्रीय संग्रहालयों से चीजें हटाना वर्जित है. सरकार की इस कानून को बदलने की कोई योजना नहीं है." हालांकि इस कानून के बावजूद कुछ ब्रिटिश संस्थाओं ने पूर्व ब्रिटिश कॉलोनियों को चीजें लौटाई हैं. एडिनबरा यूनिवर्सिटी ने 2019 में श्रीलंका को वेदा की नौ खोपड़ियां लौटाई थीं. मैनचेस्टर यूनिवर्सिटी के म्यूजियम ने उसी साल ऑस्ट्रेलिया के आदिवासी समुदाय से जुड़ीं 43 कलाकृतियां लौटाई थीं.

Source: DW

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