FIFA 2022 : इस फुटबॉलर ने मैदान में घुटनों के बल बैठ, जीता करोड़ों का दिल
रैशफोर्ड ऐसे फुटबॉल खिलाड़ी हैं जो मानवीय और सामाजिक सरोकारों के लिए भी प्रतिबद्ध हैं। वे इंग्लैंड में नस्लीय भेदभाव को खत्म करने, बेघरों को आश्रय देने और भूखे बच्चों को भोजन देने के अभियान से जुड़े हैं।
विश्वकप फुटबॉल प्रतियोगिता, अहमद बिन अली स्टेडियम कतर। इंग्लैंड के स्टार स्ट्राइक मार्कस रैशफोर्ड ने जब वेल्स के खिलाफ गोल किया तो वे दौड़ते हुए आये और घुटनों के बल मैदान पर बैठ गये। फिर आंखें मूंदी और दोनों हाथों की उंगलियां आसामन की तरफ उठा दीं। ऐसा लग रहा था जैसे कि वे किसी बिछड़े प्रियजन को याद कर रहे हों। वह प्रियजन जो अब दिवंगत हो चुका है। रैशफोर्ड के लिए यह भावुक कर देने वाला पल था। वे अपने उस प्रिय प्रशंसक को याद कर रहे थे जिनकी हाल ही में कैंसर से मौत हो गयी थी। कोई दिग्गज खिलाड़ी इतने बड़े खेल मंच पर अपने प्रशंसक को याद करे, मैच के बीच में ही उसे श्रद्धांजलि दे, यह दिल को छू लेने वाल दृश्य था। रैशफोर्ड की इस उच्च भावना की जितनी तारीफ की जाय वह कम है।

प्रशंसक जो प्यारा बन गया
गारफील्ड हेवार्ड, यही नाम था उसका। मैनचेस्टर (इंग्लैंड) के लेवेनशुल्मे इलाके में रहता था। फुटबॉल का दीवाना था। मार्कस रैशफोर्ड का खेल देखना उसे दिलोजान से प्यारा था। बिना नागा वह रेशफोर्ड का मैच देखने आता था। रैशफोर्ड चाहे इंग्लैंड के लिए खेल रहे हों या मैनचेस्टर यूनाइटेड के लिए, हेवार्ड अपने साथियों के साथ हरदम उनका हौसला बढ़ाता। फिर तो रैशफोर्ड अपने प्रशंसक मार्कस के इतने नजदीक आये कि दोनों में पक्की दोस्ती हो गयी। ये दोस्ती पारिवारिक मित्रता में बदल गयी। हेवार्ड इतना दिलदार था कि रैशफोर्ड के भाई भी उसे बहुत पसंद करते थे। ये दोस्ती केवल औपचारिकता नहीं थी। दिल की गहराइयों में बसी थी। लेकिन हेवार्ड कैंसर से जूझ रहे थे। हाल ही में उनका निधन हो गया। कतर में जब रैशफोर्ड को ये बात मालूम हुई तो उन्होंने तय किया कि वे एक गोल के जरिये अपने अजीज दोस्त को श्रद्दांजलि देंगे। वेल्स के खिलाफ जैसे ही उन्होंने पहला गोल किया उन्होंने दोस्त को याद किया। वे मैदान पर घुटनों के बल बैठ कर और आसमान की तरफ उंगलिया उठा कर हेवार्ड को श्रद्धांजलि देने लगे। ये गोल अपने मित्र और प्रशंसक गारफील्ड हेवार्ड को समर्पित कर दिया।
क्या कहा रैशफोर्ड ने ?
गारफील्ड हेवार्ड केवल प्रशंसक ही नहीं था बल्कि वह फुटबॉल की बारीकियों को भी समझता था। मैच के बाद वह रैशफोर्ड को उसके खेल के बारे में बताता था। रैशफोर्ड के लिए हेवार्ड की क्या अहमियत थी, यह उनके बयान से ही साफ हो जाता है। वेल्स के साथ मैच खत्म होने पर रैशफोर्ड ने कहा, एक-दो दिन पहले मैंने अपने करीबी दोस्त को खो दिया। वह मेरा बहुत अच्छा दोस्त था। मैं खुशनसीब था कि वह मेरी जिंदगी में आया।
गरीबी से लड़ कर बने स्टार फुटबॉलर
रैशफोर्ड ऐसे फुटबॉल खिलाड़ी हैं जो मानवीय और सामाजिक सरोकारों के लिए भी प्रतिबद्ध हैं। वे इंग्लैंड में नस्लीय भेदभाव को खत्म करने, बेघरों को आश्रय देने और भूखे बच्चों को भोजन देने के अभियान से जुड़े हैं। उनकी इस कोशिश की न केवल ब्रिटेन में बल्कि दुनिया भर में तारीफ होती रही है। रैशफफोर्ड इंग्लैंड के एक श्रमिक परिवार में पैदा हुए। लेकिन गरीबी और तकलीफों को दरकिनार कर वे आज दुनिया के मशहूर खिलाड़ी बन चुके हैं। उनकी दादी वेस्टइंडीज के सेंट किट्स की रहने वाली थीं। उनकी मां ने सिंगल मदर के रूप में अकेले ही रैशफोर्ड और उनके भाई-बहनों का पालन पोषण किया। परिवार चलाने के लिए उन्हें कई काम करने पड़े। कभी-कभी वे रैशफोर्ड और उनके भाई-बहनों को खिलाने के लिए खुद भूखे सो जाती थीं। जिंदगी की इस सीख ने रैशफोर्ड को मानवीय रूप से संवेदनशील बना दिया। इसलिए वे आज मानवीय मूल्यों प्रति इतने समर्पित हैं।
रैशफोर्ड गोल्डेन बूट की रेस में
इस विश्वकप में मार्कस रैशफोर्ड इंग्लैंड के स्टार बन कर उभरे हैं। उनकी उम्र 25 साल है। वे अभी तक तीन गोल कर चुके हैं और तीन अन्य खिलाड़ियों के साथ गोल्डेन बूट की रेस में बने हुए हैं। वेल्स के खिलाफ उन्होंने दो गोल किये थे। उनका पहला गोल देखने लायक था। उन्हें फ्री किक लेना था। सामने वेल्स के रक्षकों की दीवार खड़ी थी। रैशफोर्ड ने एक ऊंची लेकिन सधी हुई किक लगायी। किक के बाद गेंद की रफ्तार थी 121 किलोमीटर प्रति घंटा। गेंद हवा में तैरती हुई तेजी से गोलपोस्ट के अंदर समा गयी। गेंद का एंगल ऐसा था कि गोलकीपर उसे डाइव लगाने के बाद भी नहीं रोक पाया। रैशफोर्ड दुनिया के बेहतरीन फॉरवर्ड माने जाते हैं। 2016 में उनका इंग्लैंड की राष्ट्रीय टीम में प्रवेश हुआ। जब इंग्लिश टीम यूरोपीय चैंम्पियनशिप के लिए मैदान में उतरी तो रैशफोर्ड सबसे युवा खिलाड़ी थे। तब उनकी उम्र केवल 17 साल थी। आज वे इंग्लैंड के अहम खिलाड़ी बन चुके हैं।












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