करोड़ों बांटने वाली BCCI का कभी लता मंगेशकर ने बचाया था सम्मान, म्यूजिक कॉन्सर्ट कर जुटाए थे पैसे
आईसीसी टी20 वर्ल्ड कप 2024 की चैंपियन टीम इंडिया के लिए करोड़ों बांट रही बीसीसीआई (BCCI) हमेशा से मलामाल नहीं थी, एक समय ऐसा था जब बोर्ड के पास पैसों की भारी कमी थी। टी20 फॉर्मेट में विश्व विजेता बनने के बाद स्वदेश पहुंची भारतीय टीम का गुरुवार को भव्य स्वागत किया गया। इस दौरान बोर्ड ने उनपर पैसों की जमकर बारिश की।
मुंबई में टीम इंडिया की विजय परेड खुली बस में नरीमन प्वाइंट से शुरू होकर वानखेड़े स्टेडियम में पहुंची। यहां टीम को बीसीसीआई ने 125 करोड़ रुपये की इनामी राशि देकर सम्मानित किया, लेकिन साल 1983 में जब कपिल देव की अगुवाई वाली टीम वनडे वर्ल्ड कप में वेस्टइंडीज को हराकर विश्व विजेता बनी तो उन्हें देने के लिए बोर्ड के पास कुछ खास नहीं था।

कपिल देव की कप्तानी वाली भारतीय टीम ने वेस्टइंडीज के खिलाफ 43 रन से जीत दर्ज कर एक नया इतिहास लिखा था। हालांकि, इस विजेता टीम को प्रोत्साहित करने के लिए बीसीसीआई के पास पैसे नहीं थे। बोर्ड ने खिलाड़ियों को सिर्फ 25-25 हजार देने का ऐलान किया था।
इस दौरान बीसीसीआई अध्यक्ष स्वर्गीय एनकेपी साल्वे ने भारतीय क्रिकेट के दिग्गज मित्र राज सिंह डूंगरपुर से समाधान के लिए संपर्क किया। डूंगरपुर ने अपने एक मित्र और देश के सबसे बड़े क्रिकेट प्रशंसकों में से एक लता मंगेशकर से राष्ट्रीय राजधानी के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में निःशुल्क संगीत कार्यक्रम आयोजित करने का अनुरोध किया। तब मशहूर गायिका लता मंगेशकर ने बोर्ड और खिलाड़ियों के सम्मान में एक बड़ा कदम उठाया।
लगा मंगेशकर के दो घंटे के कार्यक्रम के दौरान स्टेडियम खचाखच भरा हुआ था, जिससे अंततः यह सुनिश्चित हो गया कि बीसीसीआई के पास विश्व कप विजेता टीम को एक-एक लाख रुपये का नकद पुरस्कार देने के लिए धन जमा हो गया है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, लगा मंगेशकर ने म्यूजिक कॉन्सर्ट कर खिलाड़ियों के लिए अच्छा खासा फंड जुटा लिया था, और जो भी पैसे आए उससे खिलाड़ियों को एक-एक लाख रुपये दिए थे, लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है, और भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड दुनिया के सबसे अमीर बोर्ड में गिना जाता है।
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इससे पहले जब महेंद्र सिंह धोनी की कप्तानी वाली टीम श्रीलंका को हराकर 28 साल बाद फिर से वनडे में विश्व विजेता बनी तो बीसीसीआई ने 39 करोड़ रुपये की पुरस्कार राशि दी थी। ऐसे में प्रत्येक खिलाड़ी के हिस्से में दो-दो करोड़ रुपये आए थे। बाकी राशि कोचिंग स्टाफ को मिली थी। इससे स्पष्ट होता है कि 1983 के बाद हर टूर्नामेंट के साथ टीम की स्थिति बदलती चली गई और बोर्ड का खजाना भरता गया।












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