अपनों को बचाने व 'उदयपुर संकल्प' को अपनाने के बीच मझधार में हिमाचल कांग्रेस, भूपेश बघेल ने जानी जमीनी हकीकत
शिमला, 08 अगस्त: आने वाले विधानसभा चुनावों की तैयारियों को अंतिम रूप देने के मकसद से कांग्रेस पार्टी के केंद्रीय पर्यवेक्षक और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने अपने दो दिनों के प्रवास के दौरान लगातार बैठकों में शामिल होकर जायजा लिया और स्पष्ट किया कि कांग्रेस पार्टी चुनावों में टिकट का आवंटन सर्वेक्षण की रिपोर्ट और प्रत्याशी की परफार्मेंस के आधार पर करेगी। हालांकि, हिमाचल कांग्रेस उदयपुर संकल्प को अपनाने में अभी कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखा पा रही है, जिससे अब एक बार फिर गेंद पार्टी आलाकमान के पाले में है। भूपेश बघेल शिमला के बाद अब दिल्ली में कांग्रेस आलाकमान के साथ बैठक कर जमीनी हकीकत पर अपनी रिर्पोट देंगे।

हिमाचल में पार्टी में चल रही गुटबाजी को लेकर भूपेश बघेल यहां खासे चिंतित नजर आए और उन्होंने तमाम नेताओं को एकता का पाठ पढ़ाया। उन्होंने कहा कि पार्टी को सत्ता में लाने के लिए एकजुट होना होगा। लेकिन लगातार मंथन के बावजूद पार्टी में टिकट आवंटन को लेकर कोई आम सहमति नहीं बन पाई। पार्टी ने इसी बैठक में करीब 30 चुनाव क्षेत्रों के टिकट तय कर लेने का दावा किया था, लेकिन सहमति के अभाव में मामला अनसुलझा रहा।
दरअसल, टिकट के लिए दावेदारी जताने वाले ज्यादातर नेता कांग्रेस अध्यक्ष प्रतिभा सिंह के करीबी हैं। उनमें कुछ ऐसे भी हैं जो पिछला चुनाव भारी मतों से हारे हैं। इस फिर से टिकट की दावेदारी करने लगे हैं, जबकि पार्टी के एक धड़े की दलील है कि टिकट के लिए मापदंड समय रहते तय होने चाहिएं, जिसमें पिछला चुनाव पांच हजार मतों से अधिक से हारने वालों को इस बार टिकट नहीं दिया जाना चाहिए। इसके साथ ही उदयपुर संकल्प को अपनाने की भी पैरवी की गई। लेकिन उदयपुर संकल्प को लेकर पार्टी अध्यक्ष प्रतिभा सिंह और चुनाव प्रबंधन समिति के अध्यक्ष सुखविंदर सिंह के बीच मतभेद उभर कर सामने आए।
बैठक के दौरान चुनाव प्रबंधन समिति के अध्यक्ष सुखविन्दर सिंह सुक्खू ने चुनावों में प्रभावी जीत के लिए उदयपुर संकल्प को अपनाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि परिवारवाद पर रोक लगनी चाहिए, ताकि नये लोगों को भी चुनाव में भाग लेने का मौका मिल सके। उन्होंने कहा कि पार्टी टिकट के लिए समय रहते मापदंड तय करे और बार-बार चुनाव हारने वालों को टिकट न दिया जाए। वहीं, उन्होंने नेताओं के कामकाज के आकलन पर भी जोर दिया और कहा कि टिकट के लिए चुनाव जीतने की क्षमता ही सबसे बड़ा मापदंड होना चाहिए।
लेकिन यहां पेचीदा महौल इसलिये पैदा होने लगा है कि पार्टी जहां उदयपुर संकल्प को अपनाने की बात कर रही है। तो दूसरी और पिछले चुनावों में चुनाव हारे कई नेता किसी भी कीमत पर अपनी टिकट की दावेदारी नहीं छोडना चाह रहे हैं। जिससे टिकट की आस में इंतजार में बैठे दूसरे नेताओं का अब सब्र का बांध टूटने लगा है।
इससे पहले, भूपेश बघेल ने पार्टी के विधायकों और विभिन्न समितियों के अध्यक्षों से विचार विमर्श करके फीडबैक लिया। और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रतिभा सिंह ने चुनावी तैयारियों पर प्रजेंटेशन दी । नेता प्रतिपक्ष, कार्यकारी अध्यक्षों ने भी पार्टी का फीडबैक केंद्रीय पर्यवेक्षकों को अपनी रिपोर्ट दी। विधानसभा चुनावों को लेकर गठित अलग-अलग समितियों के पदाधिकारियों के साथ बैठक कर तैयारियों का जायजा लिया गया। हाईकमान की ओर से जिला स्तर पर तैनात पर्यवेक्षकों की रिपोर्ट पर भी चर्चा की गई। शिमला से लौटने के बाद बघेल हाईकमान के पास अपनी विस्तृत रिपोर्ट भी सौंपेंगे। इसके आधार पर आगामी चुनावी रणनीति तैयार की जाएगी। वहीं तय किया गया कि आने वाले दिनों में पार्टी सत्तारूढ़ भाजपा सरकार को घेरने के लिए पूरी ताकत के साथ किस तरीके से मैदान में उतरेगी। मंडल व जिला स्तर पर सरकार के खिलाफ आंदोलन का रास्ता भी अपनाया जायेगा।
बताया जा रहा है कि कांग्रेस आलाकमान ने हिमाचल प्रदेश में सत्ता हथियाने के लिए अपने वफादार नेताओं को नियुक्त किया है। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और राजस्थान के उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट कांग्रेस आलाकमान के करीबी सहयोगी हैं। कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी ने अपने अनुभवी और युवा नेता को हिमाचल की बागडोर सौंपकर सुलह की कोशिश की है। प्रताप सिंह बाजवा पड़ोसी राज्य पंजाब से कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं। आजकल नेता भी विपक्ष की भूमिका में हैं। ऐसे में कांग्रेस बाजवा के जरिए राज्य की सीमा से लगे इलाकों पर फोकस करने की तैयारी कर रही है। कांग्रेस छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री और राजस्थान के उपमुख्यमंत्री का पद देकर हिमाचल में पुरानी पेंशन बहाल करने का कार्ड भी खेलेगी। इन दो वरिष्ठ नेताओं के जरिए कांग्रेस प्रदेश के मजदूरों को जिताने के लिए हर पारी खेलेगी।
प्रदेश में 68 सीटें हैं और 2017 के विधानसभा चुनाव में यहां भाजपा को बड़ी जीत मिली थी। तब भाजपा को 44 सीटों पर जीत हासिल हुई थी । और उसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में भी वह चारों सीटें जीतने में कामयाब रही थी। लेकिन, बीते साल नवंबर में हुए उपचुनाव में भाजपा तीन विधानसभा सीटों और मंडी लोकसभा सीट पर उपचुनाव में बुरी तरह हारी। राज्य ने अब तक कोई सरकार नहीं दोहराई है। इसे कांग्रेस एक मौके के तौर पर देख रही है।












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