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लॉकडाउन में 43 दिन से यूपी के संभल में फंसे दिल्ली के 10 स्टूडेंट्स, गेहूं की कटाई कर कमाए पैसे, पीएम से मांगी मदद

संभल। लॉकडाउन में दिल्ली के 10 स्टूडेंट्स संभल जिले के गांव असालतपुर जारई में 43 दिन से फंसे हैं। एग्‍जाम खत्म होने पर गंगा स्नान करने आए स्टूडेंट्स के पैसे भी खत्म हो गए। ये सभी एक विद्यार्थी के मामा के यहां रह रहे हैं। मामा की माली हालत देखकर उनकी मदद करने के मकसद से इनमें से कुछ स्टूडेंट्स ने गेहूं काटकर कुछ पैसे भी जुटाए हैं। इन विद्यार्थियों ने जिला प्रशासन से दिल्ली या अपने दूसरे रिश्तेदारों के घर भेजने की व्यवस्था करने की मांग की थी, लेकिन व्यवस्था नहीं हो पाई। उन्हें उम्मीद थी कि 3 मई को लॉकडाउन खत्म हो जाएगा लेकिन इसकी अवधि बढ़ने से वे मायूस हो गए हैं। छात्रों ने पीएम मोदी से मदद की गुहार लगाई है।

एडीएम ने कहा- अनु​मति मिल जाएगी तो भेज देंगे

एडीएम ने कहा- अनु​मति मिल जाएगी तो भेज देंगे

एडीएम संभल कमलेश कुमार ने रविवार को बताया, मैंने विशेष सचिव गृह से बात की है उन्होंने कहा कि जहां के छात्र, कर्मचारी या मजदूर हैं उनका एक चार्ट बनाकर हमारे पास भेजा जाए, उसके बाद उस राज्य से अनुमति मांगी जाएगी उनसे जब अनुमति मिल जाएगी तो हम उनको भेज देंगे। बता दें, दिल्ली के पंजाबी बाग निवासी शीतल, उमंग, गौतम, सुमित, सोनू, मुस्कान, खुशबू व करन परीक्षा खत्म होने के बाद 21 मार्च की सुबह गढ़मुक्तेश्वर गंगा नहाने आए थे। इनके साथ पंजाबी बाग में नानी के यहां आए गाजियाबाद के साहिबाबाद निवासी आकाश व श्रुति भी हो लिए। 22 मार्च को जनता कर्फ्यू था। परिजनों के कहने पर सभी गांव असालतपुर जारई में शीतल के रिश्ते के मामा भगवान कुमार के यहां आ गए।

लॉकडाउन में बेरोजगार हुए मामा

लॉकडाउन में बेरोजगार हुए मामा

25 मार्च से लॉकडाउन हो गया। भगवान कुमार पत्नी व तीन बच्चों के साथ छोटे से घर में रहते हैं। लॉकडाउन में वह भी बेरोजगार हो गए। भगवान कुमार 43 दिन से इन बच्चों को बड़ी मुश्किल से भोजन करा रहे हैं। अब उन्हें प्रशासन से मदद की उम्मीद है। भगवान कुमार ने बताया कि मेहनत मजदूरी कर अपने परिवार का पालन पोषण करता हूं। लॉकडाउन में परिवार का ही पेट भरने में परेशानी हो रही है। ऐसे में दस और लोगों का खर्च चलाना मुश्किल है।

मामा का घर छोटा, दिल बड़ा

मामा का घर छोटा, दिल बड़ा

दस विद्यार्थियों को रिश्ते के मामा भगवान कुमार के घर लेकर आई शीतल ने कहा, उनके मामा और मामी का घर छोटा है लेकिन दिल बड़ा है। एक कमरे और छप्पर के छोटे से घर में हम 10 विद्यार्थियों को ठहरना पड़ा तो पहले दिन ही दिक्कत खड़ी हो गई, मामी ने पड़ोस में रहने वाले मामा के बड़े भाई का कमरा खुलवा दिया। हम उसमें ठहर गए। इतने दिनों में हमारे रुपए खर्च हो गए। हमने देखा की मामा की माली हालत बहुत अच्छी नहीं है। उनके भी तीन बच्चे हैं।

जेब खाली हुई तो की गेहूं की कटाई

जेब खाली हुई तो की गेहूं की कटाई

जब हमारी जेब खाली होने लगी तो हम परेशान हो गए। हमें खाली समय काटना भी मुश्किल हो रहा था तो हमने गेहूं की कटाई के लिए गांव वालों से संपर्क किया और काम मिल गया। शीतल ने बताया कि करन, सोनू, गौतम, आकाश, सुमित ने दो से ढाई दिन तक गेहूं काटे। यह सब गेहूं काटना नहीं जानते थे, लेकिन जेब खर्च के लिए रुपये जुटाने के लिए कटाई की। इसमें करन को 200 रुपए, सोनू, गौतम और सुमित 100-100 रुपए और आकाश को 150 रुपए मिले।

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