नर्मदा का अस्तित्व बचाने 35 महीने से निराहार संत 'समर्थ दादा गुरु', 2.5 लाख किमी की पदयात्रा कर चुके
विज्ञान के लिए किवदंती बन चुके 'महायोगी संत समर्थ दादा गुरु' बीते 35 महीनों से केवल नर्मदा जल पर आश्रित हैं। उन्होंने अन्न, भोजन, फलाहार सब त्याग दिया है। नर्मदा बचाओ आंदोलन के प्रणेता महायोगी 9 सितंबर को सागर आ रहे हैं...यहां समर्थ दादा गुरु 'नर्मदा चिंतन एक संवाद: नदी है तो सदी है' कार्यक्रम में शामिल होंगे।

महायोगी 'समर्थ दादा गुरु' के नाम से विख्यात संत आगामी 9 सितंबर को सागर आ रहे हैं। वे यहां सिरोंजा स्थित स्वामी विवेकानंद विश्वविद्यालय परिसर में आयोजित नर्मदा चिंतन एक संवाद कार्यक्रम में आएंगे। कार्यक्रम की जानकारी देते हुए विश्वविद्यालय के संस्थापक कुलपति डॉ. अनिल तिवारी ने बताया कि विश्व पर्यावरण के चिंतक एवं नर्मदा पथ के महायोगी दादा गुरू का सानिध्य सागर में प्राप्त होने जा रहा है। वे लगभग 3 वर्षाे से निराहार रहकर केवल नर्मदा जल पर आश्रित होकर नर्मदा परिक्रमा कर रहे हैं। वे इकलौते संत हैं जो निरंतर नर्मदा परिक्रमा कर रहे हैं। उनका नाम 7 दफा विश्व रिकॉर्ड में दर्ज हो चुका है।
ढाई लाख किलोमीटर चलकर जनजागरण यात्रा कर चुके हैं
भारतीय योग परंपरा के संत 'सर्मथ दादा गुरू' के सागर आने के कार्यक्रम की जानकारी देते हुए एसवीएन विवि के कुलपति डॉ. अनिल तिवारी ने बताया कि नर्मदा पथ के महायोगी दादा गुरू की सेवा साधना वर्ल्ड रिकार्ड में दर्ज है। लगभग ढाई लाख किलो मीटर सम्पूर्ण भारत वर्ष के अनेक प्रांतो में अखंड निराहार जन जागरण यात्रा कर चुके और आज भी जारी है। दादागुरु 3200 किलोमीटर की पैदल निराहार केवल नर्मदा जल पर नर्मदा सेवा परिक्रमा पूर्ण कर चुके हैं। तीन बार रक्त दान कर चुके ज्ञान विज्ञान के लिए अकल्पनीय अविश्वनीय किंतु सत्य प्रत्यक्ष दादागुरु की अखंड निराहार महाव्रत साधना देश दुनिया के लिए शोध का विषय बन चुकी है। देश दुनिया के पहले अवधूत संत हैं, जिनका नाम कई बार वर्ल्ड रिकार्ड में दर्ज हो चुका है। सदी की अकल्पनीय यात्रा में निकले दादागुरु ने प्रकृति पर्यावरण नदियों जल मिट्टी के संरक्षण व संवर्धन के लिए नर्मदा परिक्रमा की है। यह देश दुनिया की पहली ऐसी यात्रा है जिसमें कोई संत प्रकृति पर्यावरण जल मिट्टी के लिए निराहार चल रहे हैं।
35 माह से अखंड निराहार महाव्रत साधना कर रहे
35 माह से जारी अखंड निराहार महाव्रत साधना के दौरान प्रतिदिन की दिनचर्या जो आज भी निरंतर जारी है संपूर्ण भारत व नर्मदा तीर्थ क्षेत्र व अन्य प्रांतों में अखंड सत्संग धर्म सभाएं जन जागरण संवाद निस्तर सेवा कार्य कर रहे दादागुरु हमेशा कहते है हमारा भारतीय हिंदू दर्शन प्रकृति नर्मदा गंगा यमुना व पवित्र नदियां, पहाड़ों को जीवित प्रत्यक्ष शक्ति के रूप में मानता है तो हमारी भारतीय संवैधानिक व्यवस्था इसे जीवित इकाई क्यों नहीं मान रही। वे कहते हैं यही उचित समय है जब देश दुनिया भीषण प्रकृतिक आपदाओं का सामना कर रही है तो दूसरी और चारों तरफ अंधाधुंध प्राकृतिक संपदाओं का दोहन शोषण चरम सीमा में हो रहा। आज वक्त है, जिसे हम माँ कहते है उस प्रकृति नदियों और धरा को जीवित इकाई को संवैधानिक मान्यता देकर जीवन शक्ति को संरक्षित करें यही शक्ति हमारे जीवन धर्म संस्कृति सभ्यता व्यवस्था का मूल आधार है।
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