Rewa news: विलुप्त होते गिद्धों को बचाएगा मिशन जटावु अभियान, वन विभाग ने शुरू की सराहनीय पहल
Mission Jatayu in Rewa: रीवा में गिद्धों की संख्या बढ़ रही है। अगर वन विभाग का ये अभियान सफल हुआ तो आने वाले दिनों में गिद्ध फिर नजर आने लगेंगे।
Mission Jatayu in Rewa: मध्य प्रदेश रीवा जिले के वन विभाग के द्वारा जटायु संरक्षण अभियान चलाया जा रहा है। गिद्धों की जान बचाने के लिए वन विभाग मैदान पर उतर चुका है।इसके तहत टीम गांवों में जाकर लोगों को अभियान के बारे में जानकारी दे रही है।
जानकारी अनुसार प्रतिबंधित दवाइयां गिद्धों की जान ले रही हैं। इन दवाइयां पर रोक लगाने के लिए वन विभाग का अमला दवा दुकानों, अस्पतालों पर पहुंचकर उनके उपयोग से दूरी बनाने की जानकारी दे रहे हैं।

को बताते चले कि कुछ वर्षों पहले तक यदि गांव या आसपास में कोई जानवर मृत होता था, तो उसके आसपास गिद्धों का बसेरा रहता था। गिद्धों की भीड़ लग जाती थी, लेकिन अब वह विलुप्तप्राय होने लगे। गिद्ध नजर नहीं आते हैं।
इन गिद्धों के विलुप्त होने की वजह इंसान ही बना है। कुछ ऐसी प्रतिबंधित दवाइयां का इस्तेमाल इंसानों ने शुरू कर दिया, जिसे खाने से गिद्धों की मौत होने लगी। सरकार ने हालांकि इन दवाइयां पर प्रतिबंध लगा दिया है फिर भी पूरी तरह से सफल नहीं हो पाया है। चोरी छुपे अब भी इनका उसे हो रहा है। यही वजह है कि वन विभाग ने इन घातक दवाइयों के उपयोग पर रोक लगाने के लिए डीएफओ ने जटायु अभियान की शुरुआत की है।
इस अभियान में वन मंडल अंतर्गत आने वाले सभी रेंज अधिकारी और कर्मचारियों को अभियान से जोड़ा गया है। वन विभाग की टीम अस्पताल, गांव और दवा दुकानों पर पहुंचकर आम पब्लिक को इन प्रतिबंधित दवाइयां के उपयोग से दूरी बनाने की जानकारी दी जा रही है। इन प्रतिबंधित दवाइयां की जगह पर विकल्प भी बताया जा रहे हैं वन विभाग का यह अभियान काफी सराहनीय है रीवा में कई क्षेत्र ऐसे हैं जहां गिद्धों की संख्या बढ़ रही है यदि वन विभाग का यह प्रयास सफल रहा तो आने वाले दिनों में यह दोबारा से हमें नजर आने लगेंगे।
गिद्ध मुर्दाखोर पक्षी होते हैं, जो सड़े गले मांस को खाते हैं। जिसमें असंख्य घातक जीवाणु होते हैं। इस तरह गिद्ध प्रकृति के सफ़ाईकर्मी होते हैं। ये जहाँ रहते हैं। वहाँ के पारिस्थितिकी तंत्र को स्वच्छ और स्वस्थ करते हैं। परंतु बीते कुछ वर्षों में गिद्धों की संख्या काफी हद तक कम हुई है। इसके प्रमुख कारणों में से एक डाइक्लोफेनेक दवा का मवेशी के उपयोग हेतु उपयोग है। उपचारित बीमार मवेशी के मरने के बाद, जब गिद्ध उसके मांस को खाते हैं, तो यह दवा गिद्ध के गुर्दों को खराब कर देती है, जिससे कुछ ही दिनों में गिद्ध की मृत्यु हो जाती है। भारत सरकार ने वर्ष 2008 में डाइक्लोफेनेक का जानवरो मवेशी के इलाज के लिए उपयोग प्रतिबंधित किया था।
इसी वर्ष इस जैसी हानिकारक दवाओं का भी जानवरों/मवेशी के उपचार के लिए उपयोग प्रतिबंधित किया गया है। इनके अलावा नीमूसुलाइड प्रतिबंधित तो नहीं है, पर गिद्धों के लिए हानिकारक है। परंतु अज्ञानतावश कई लोग अभी भी इन दवाओं का उपयोग कर रहे हैं। इन हानिकारक दवाओं के बारे में संबंधितों को जागरूक करने के लिए रीवा वन विभाग ने जटायु संरक्षण अभियान की शुरुवात की है।












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