Janmashtami at Dargah: मंदिर नहीं, दरगाह पर गूंजी जन्माष्टमी की घंटियां! यहां सदियों से निभ रही अनोखी परंपरा
Janmashtami at Dargah: राजस्थान के झुंझुनू जिले के नरहड़ कस्बे में जन्माष्टमी का पर्व इस बार भी अनोखे अंदाज में मनाया गया। खास बात यह रही कि श्रीकृष्ण जन्मोत्सव किसी मंदिर में नहीं, बल्कि 14वीं सदी की दरबार हजरत हाजिब शकरबार शाह दरगाह (Shakkar Baba ki Dargah) में मनाया गया। यह दरगाह सदियों से हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की अनोखी मिसाल रही है।
दरगाह के खादिम करीम पीर ने बताया कि, 'जन्माष्टमी पर हिंदू भक्त शोभायात्रा निकालते हैं और मुस्लिम समुदाय उनका स्वागत फूल-मालाओं से करता है।' इस बार तीन दिन का उत्सव शुक्रवार से शुरू हुआ, जिसमें देशभर से श्रद्धालु पहुंचे। खासकर नए विवाहित जोड़ों ने दरगाह आकर आशीर्वाद लिया।

जन्माष्टमी पर होते हैं धार्मिक कार्यक्रम
TOI की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस दरगाह पर जन्माष्टमी के मौके पर भजन, नाटक, कव्वालियां और भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित धार्मिक कार्यक्रम होते हैं। दरगाह कमेटी के चेयरमैन खलील बुधाना बताते हैं कि यहां हर धर्म का व्यक्ति अपनी-अपनी परंपरा के अनुसार पूजा कर सकता है। उन्होंने कहा, 'कई साल पहले एक हिंदू परिवार ने इस मेले की शुरुआत की थी और तब से परंपरा जारी है।'
दही चढ़ाने की अनोखी परंपरा
यहां एक खास परंपरा भी निभाई जाती है। जब भी किसी घर में गाय या भैंस बछड़े को जन्म देती है, तो लोग दरगाह में दही चढ़ाकर प्रसाद अर्पित करते हैं।
मेल से झलकती गंगा-जमुनी तहजीब
स्थानीय निवासी शंकर सिंह कहते हैं, 'यहां जन्माष्टमी का मेला सदियों से लग रहा है, जो साम्प्रदायिक एकता का प्रतीक है।' वहीं मोहम्मद सादिक बताते हैं कि इस परंपरा की शुरुआत कब और कैसे हुई, यह किसी को ठीक से याद नहीं, लेकिन बुजुर्गों से कई कहानियां सुनने को मिलती हैं।
ऐसी दरगाहें जहां हिंदू श्रद्धालु भी करते हैं दर्शन
भारत की कई दरगाहें धार्मिक सीमाओं को पार करते हुए साझा आस्था का केन्द्र बन चुकी हैं। जहां हिंदू श्रद्धालु भी अपनी मनोकामनाओं के लिए आते हैं। सबसे प्रमुख 'अजमेर शरीफ़ दरगाह' है, जहां सूफी संत मुईनउद्धीन चिश्ती के समाधि स्थल पर हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के श्रद्धालु समान श्रद्धा से आते हैं। एक अन्य मिसाल है उत्तराखंड स्थित पीरन कलियार शरीफ़ दरगाह, जो हरिद्वार/रूड़की के पास स्थित है; यह दरगाह हिंदुओं सहित सभी धर्मों के अनुयायियों में श्रद्धा का केंद्र बनी हुई है।
इसके अलावा, उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती जिले में स्थित बड़े पुरुष दरगाह (Dargah Bade Purush Baba Dikauli Sharif) भी एक ऐसा स्थल है जहां हिंदू और मुस्लिम दोनों मिलकर ज़ियारत करते हैं-यह गंगा-जमुनी तहज़ीब की जीवंत मिसाल है। इन दरगाहों की विशेषता यही है कि वे सांप्रदायिक सौहार्द्र का प्रतीक बनकर उभरे हैं, जहां श्रद्धा चाहे किसी भी धर्म की हो-एक साथ मौजूद रहने का भाव यहां साफ देखने को मिलता है।












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