शीर्ष 10 प्रदूषित शहरों में छत्तीसगढ़ का रायपुर

छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल के अध्यक्ष एन. बैजेंद्र कुमार कहते है कि यह सही है कि शीर्ष 10 प्रदूषित शहरों में रायपुर शामिल है। सरकार ने नीरी के माध्यम से सर्वे कराया था, जिससे यह पता चला है कि केवल 19 फीसदी प्रदूषण उद्योगों के कारण होता है जबकि, 81 फीसदी प्रदूषण वाहन, कच्ची रोड व अन्य कारणों से हो रहा है।
उरला, सिलतरा जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में प्रदूषण नियंत्रण के लिए सरकार ने कारगर कदम उठाए हैं। इन इलाकों में 2007 के बाद कोयला आधारित उद्योगों की स्थापना पर रोक लगा दी गई है। शहर के भीतर चल रहे उद्योगों को बाहर ले जाने के लिए उद्योग संचालकों से सुझाव मांगे जा रहे हैं। इसके बाद योजना के तहत प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों को शहर के बाहर स्थानांतरित किया जा सकता है।
पर्यावरण विशेषज्ञों की मानें तो यहां प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण औद्योगिक क्षेत्र का शहर के पास होना है। उरला और सिलतरा में चलने वाले रसायन और स्पंज आयरन उद्योगों ने न केवल वायु बल्कि, जल प्रदूषण भी बढ़ाया है। उद्योगों की चिमनी से निकलने वाले ऑर्गेनिक व ब्लैक कार्बन के कारण वायु में प्रदूषण की मात्रा बढ़ती जा रही है। इसी कारण यहां ठंड की तासीर कम होती जा रही है। ठंड में भी गर्मी का एहसास होने लगा है। मौसम परिवर्तन का चक्र पूरी तरह से गड़बड़ा गया है।
उद्योगों से निकलने वाला केमिकलयुक्त पानी खुले या नदी-नालों में बहा दिया जाता है। यह भूमिगत जल को पदूषित कर रहा है। उरला में फैक्ट्रियों के बाहर केमिकलयुक्त पानी भरा पड़ा है। उसका असर इतना खतरनाक है कि आसपास के रिहायशी इलाकों के मकानों की दीवारें पीली पड़ गई हैं और लोहे के गेट तक गल गए हैं। नगर निगम सरोना में जिस तरह से कचरा फेंक रहा है, उससे भी भूमिगत जल प्रदूषित हो रहा है।
पर्यावरणविद् गौतम बंदोपाध्याय की माने तो पांच साल पहले भी ऐसी रिपोर्ट आई थी, जिसमें रायपुर को टॉप-10 प्रदूषित शहरों में शुमार बताया गया था। उसी समय से प्रदूषण नियंत्रण के प्रयास होने थे। यहां प्रदूषण के लिए सरकार की औद्योगिक नीति जिम्मेदार है।
सिलतरा में जहां स्पंज आयरन की फैक्ट्रियां हैं, उसकी कार्बन सहन करने की क्षमता में स्थिरता आ गई है। इसके बावजूद उद्योगों की स्थापना और विस्तार को अनुमति दी जा रही है। रात में उद्योगों में ईपीएस बंद कर दिए जाते हैं। लगातार शिकायतों के बावजूद सरकार कार्रवाई नहीं करती।
दूसरा कारण यह है कि सरकार की इच्छा नहीं है कि उद्योगों से होने वाले प्रदूषण को रोका जाए। जनता प्रदूषण को रोकने के लिए बोलकर थक चुकी है। प्रदूषण के कारण ही यहां अस्थमा के मरीज बढ़े हैं। पर्यावरण की सुरक्षा में भी सरकार पीछे रही है। पेड़-पौधों की कटाई लगातार जारी है क्योंकि, सरकार को रियल स्टेट को बढ़ाना है। देखा जाए तो सरकार ने अब तक योजना बनाकर विकास को गढ़ा ही नहीं है। विकास के नाम पर कुछ भी किया जा रहा है और जनता उसे ढो रही है।
छत्तीसगढ़ नागरिक संघर्ष समिति के अध्यक्ष डॉ. राकेश गुप्ता का कहना है की यह ताजा रिपोर्ट रायपुर शहर के लोगों या राज्य सरकार के लिए गौरव की बात नहीं है। इस पर सरकार और जनता को सोचना चाहिए। प्रदूषण को रोकने और सही विकास के लिए दोनों की सहभागिता जरूरी है। अब तक रायपुर शहर का राजधानी के हिसाब से नहीं बल्कि, बड़े कस्बे के हिसाब से विकास हुआ है। यह बेतरतीब विकास का परिणाम है। सरकार को दूरगामी सोच के साथ योजनाएं बनानी चाहिए। उन योजनाओं को समय पर पूरा करना चाहिए। व्यवस्थित विकास से प्रदूषण अपने आप कम हो जाएगा।
विशेषज्ञों के मुताबिक स्वच्छ पर्यावरण के लिए पांच वर्गमीटर में एक पेड़ होना चाहिए। वहीं, राजधानी का आलम यह है कि करीब 150 वर्गमीटर में एक पेड़ है, जो निर्धारित मानक से बहुत कम है। इसके बावजूद सड़क चौड़ीकरण व नगरीय विकास के नाम पर सैकड़ों पेड़ों की बलि चढ़ाई जा चुकी है। जहां पेड़ लगाने की जरूरत है, वहां अंधाधुंध कटाई हो रही है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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