पंजाब: ऐसा गांव जहां पूजा जाता है लंकापति, नहीं हुआ रावण दहन
चंडीगढ़। विजयादशमी यानी दशहरे के मौके पर हिंदु अनुयायियों द्वारा राक्षसराज रावण के पुतले का दहन किया जाता है। आज विजयादशमी ही है और देशभर में विभिन्न स्थानों पर रामलीलाओं में आज रावण का अंत हुआ है। रावण के बड़े बड़े पुतले जलाए गए हैं। क्योंकि, रावण अधर्मी था। वह राक्षस था। उसमें अनेकों बुराइयां थीं, इसलिए समाज में उसके दहन की परंपरा है।

ऐसा गांव जहां रावण को जलाया नहीं जाता
मगर, क्या आप जानते हैं कि पंजाब में एक ऐसा गांव भी है, जहां दशहरे के दिन रावण को जलाया नहीं जाता, बल्कि उसका पूजन किया जाता है। आपको नहीं मालूम तो बता देते हैं कि, वो गांव लुधियाना जिले के पायल कस्बे में है। इस गांव के लोग रावण को बुरा नहीं मानते, बल्कि उसे नायक मानते हैं। गांव में रहने वाले दूबे परिवार के बुजुर्ग बताते हैं कि, करीब 189 साल पहले से यहां रावण की पूजा की परपंरा शुरू हुई। यहां दशहरे के दिन रावण की शराब की बोतल और बकरे के खून से पूजा की जाती है।

आखिर क्यों होती है रावण की पूजा
बुजुर्गों के मुताबिक, यहां रावण पूजा की आस्था पुत्र जन्म से जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि, उनके पूर्वज हकीम बीरबल दास को 2 विवाह के बाद भी संतान का सुख नहीं मिला। जिस वजह से वह सन्यास लेकर चले गए। वहां एक संत ने उन्हें रामलीला कराने और गृहस्थ जीवन जीने की प्रेरणा दी। लौटकर दशहरे वाले दिन उन्हें पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई। इसके पीछे वह राक्षसराज रावण का आशीर्वाद मानते थे। एक शख्स ने कहा कि, उनके पूर्वज के 4 बेटे हुए, उसी तरह रावण के आशीर्वाद से उनके भी 4 बेटे हुए।'

बकरे की बलि और शराब चढ़ाने की प्रथा
एक अन्य शख्स ने कहा कि, उन्होंने सीमेंट की 25 फीट उूंची रावण प्रतिमा बनवा रखी है, उसकी पूजा की जाती है। आस-पडोस के गांवों के लोग पुत्र प्राप्ति की चाहत में यहां आते हैं। जब उनकी मन्नत पूरी हो जाती है तो दशहरे के दिन यहां शराब की बोतल चढ़ाते हैं। एक बार जब कुछ लोगों ने रावण की मूर्ति तोड़ दी थी तो श्रीलंका के राष्ट्राध्यक्ष की सिफारिश पर उसे दोबारा स्थापित किया गया।












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