पंजाब चुनाव: कांग्रेस को भारी पड़ सकता है दलितों का दांव, खिसक सकता है जाट सिखों का वोट

नई दिल्ली, 13 जनवरी: पंजाब में अगले महीने चुनाव होने हैं। ऐसे में सभी राजनीतिक दलों अपनी-अपनी तैयारियों को और धार देना शुरू कर दिया। इस बार कांग्रेस ने अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। कांग्रेस ने दलितों वोटर पर अपना दांव लगाया है। सिद्धू और कैप्टन के विवाद के बाद पार्टी को हुए नुकसान का डैमेज कंट्रोल करते हुए पार्टी ने चरणजीत सिंह चन्नी को पंजाब का मुख्यमंत्री बनाया। ऐसे चन्नी दलित समुदाय से आने वाले पंजाब के पहले सीएम बन गए। वहीं अब कांग्रेस की राजनीति भी इस बार दलित वोटर्स को लुभाने में लगी हुई है, हालांकि इससे जाट सिखों का समर्थन पार्टी खो सकती है।

 Punjab Assembly election

जाट सिख वोट बैंक बना सकता है दूरी

पंजाब की दलित आबादी में किसी भी पार्टी को सत्ता में काबिज कराने की क्षमता है, राज्य में लगभग 32 फीसदी दलित वोटर है। पंजाब में विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले कांग्रेस ने दलित समुदाय से आने वाले चन्नी को राज्य का नेतृत्व करने के लिए अपने नेता के रूप में चुना, इस फैसले को पार्टी के महत्वपूर्ण दलित मतदाताओं का समर्थन हासिल करने के रूप में भी देखा जा रहा है, लेकिन पार्टी का कदम जाट सिख वोट बैंक को दूर कर सकता है।

जाट सिखों की आबादी लगभग 20%

आंकड़ों पर नजर डाले तो पंजाब में दलित समुदाय की आबादी लगभग 32% है, जो देश में सबसे अधिक है, जबकि जाट सिखों की आबादी लगभग 20% है, लेकिन 1977 के बाद से राज्य ने कभी भी एक गैर-जाट सिख मुख्यमंत्री नहीं देखा, चाहे वह कांग्रेस का हो या शिरोमणि अकाली दल का, जो जाट सिख समुदाय का राजनीतिक में अपनी धमक का संकेत देता है। ज्ञानी जैल सिंह 1972-77 के बीच पंजाब के अंतिम गैर-जाट सिख मुख्यमंत्री थे।

सत्ता में आने के सपनों में अटक सकता है रोड़ा

2022 के विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस की राजनीति मुख्य रूप से दलित समुदाय को लुभाने पर फोकस करती हुई दिखाई दे रही है, लेकिन इस पूरी कवायद में पार्टी जाट सिखों को अलग-थलग कर सकती है, जो पार्टी के फिर से सत्ता में आने के सपनों में रोड़ा अटका सकती है। पंजाब के पॉलिटिकल ऑब्जर्वर को लगता है कि जाट सिखों में बेचैनी की भावना पार्टी लाइनों के पार होने वाली है, क्योंकि वे आने वाले दिनों में अपने प्रभुत्व को कम होते हुए देख सकते हैं, जो राज्य में सबसे बड़ी जाति (जाट सिख) के लिए एक असामान्य परिदृश्य होगा।

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    सिद्धू- चन्नी में तनातनी!

    पंजाब में जाट सिखों का लंबा-चौड़ा किसानी का काम है। ऐसे में यह वर्ग आर्थिक रूप से मजबूत है, इसलिए यह राजनीति में भी दिखाई देता था। पंजाब में मुख्यमंत्री ज्यादातर जाट सिख रहे हैं। अब समुदाय के बीच बेचैनी होना स्वाभाविक है यदि कोई और व्यक्ति कमान संभालता है। इधर, कांग्रेस से वर्तमान हालात भी कुछ ठीक नही हैं। कांग्रेस में चन्नी, जो शुरू में पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू (जाट सिख) पर भारी पड़ रहे है। अब वह अपने नेतृत्व पर जोर दे रहे हैं। ऐसे में अगर चन्नी को अपने विश्वासपात्रों को पार्टी टिकट मिल जाते हैं तो निश्चित रूप से जाट सिख नेताओं में चिंता बढ़ेगी।

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