पंजाब: किसान की आस में बैठी कांग्रेस का खलिहान खाली, फसल काटेंगे केजरीवाल ?
चंडीगढ़, 27 दिसंबर। तीन कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन में राजनीति की खेती भी खूब हुई थी। कांग्रेस ने खाद बीज डाल कर अच्छी 'बुनायी' की थी। लेकिन जब फसल तैयार हुई तो स्थिति एकबएक बदल गयी। कांग्रेस का खलिहान खाली रह गया और फसल चली गयी आप की किस्मत में।

किसान अब राजनीतिक दल बना कर खुद मैदान में उतर गये हैं। जिस फायदे के लिए कांग्रेस ने आंदोलन में अपना 'समर्थन' निवेश किया था, अब वह बेकार चला गया। कांग्रेस की रही-सही उम्मीदें तब और धाराशायी हो गयीं जब किसानों ने आम आदमी पार्टी से गठबंधन की चर्चा शुरू कर दी। अगर किसानों की पार्टी 'आप' के साथ मिल कर चुनाव लड़ती है तो पंजाब का चुनाव कई मायनों में ऐतिहासिक हो जाएगा। खांटी किसान देश में पहली बार किसी सरकार की तकदीर लिखेंगे।

आप और किसान मिले तो हो जाएगा कमाल !
पंजाब चुनाव में अब किसानों ने भी अपना सीएम चेहरा घोषित कर दिया है। किसान आंदोलन में शामिल रहे 25 संगठनों ने बलबीर सिंह राजेवाल को अपना मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनाया है। 25 किसान संगठनों ने 'संयुक्त समाज मोर्चा' (एसएसएम) के नाम से नयी पार्टी बनायी है। 'संयुक्त समाज मोर्चा' ने आम आदमी पार्टी से गठबंधन के संकेत दिये हैं। दोनों में प्रारंभिक स्तर पर सीट शेयरिंग की भी चर्चा शुरू हो गयी है। किसान अन्य दलों की तुलना में आम आदमी पार्टी को अपने लिए अनुकूल मानते हैं। किसान भाजपा से तो नाराज हैं ही, वे कांग्रेस को भी गैरभरोसेमंद पार्टी मानते हैं। किसानों के वोट से पंजाब में काग्रेस की सरकार तो बन गयी लेकिन उसने कर्जमाफी का वायदा पूरा नहीं किया। आज भी अधितर किसान बैंक के कर्जे से डूबे हुए हैं। इसलिए अब किसान आम आदमी पार्टी की तरफ आसा भरी नजरों से देख रहे हैं। अगर अरविंद केजरीवाल अपनी महत्वाकांक्षा की उड़ान को थोड़ा कम कर के लचीला रुख अपनाते हैं तो गठबंधन की राह आसान हो जाएगी। गठबंधन की सबसे बड़ी चुनौती सीट शेयरिंग होगी। चूंकि किसानों की पार्टी के पास कोई राजनीतिक अनुभव नहीं है इसलिए वह आप के साथ मिल कर चुनाव लड़ना चाहती है।

आप और संयुक्त समाज मोर्चा (एसएसएम)
2017 में आम आदमी पार्टी ने जो 20 सीटों जीती थीं उनमें अधिकतर ग्रामीण इलाकों की थीं। गांवों में राजनीति का आधार किसान ही हैं। उन्होंने अरविंद केजरीवाल को जनता का नेता मान कर अपना समर्थन दिया था। यानी आप किसानों की पसंद रही है। अब जब किसान खुद चुनाव के मैदान में हैं तो आप के साथ तालमेल उनके लिए आसान हो जाएगा। मोटे तौर पर 117 में से 77 सीटें ग्रामीण इलाकों में आती हैं। इन सीटों पर किसान निर्णायक भूमिका में हैं। अगर 'आप' और एसएसएम का गठबंधन इन 77 में से 59 सीटें जीत लेता है तो फिर पंजाब की राजनीति में एक नया इतिहास बन जाएगा। कभी ग्रामीण इलाके के सिख समुदाय पर अकाली दल का गहरा प्रभाव था। इसकी वजह से ही उसने 2007 और 2012 में लगातार दो बार सरकार बनायी थी। लेकिन नशे की विकराल समस्या और किसानों की बेरुखी ने 2017 में इसका बेड़ा गर्क कर दिया था। अकाली दल के अधिकतर समर्थक आप की तरफ शिफ्ट हो गये थे। तभी तो 'आप' 20 सीटें जीत कर पंजाब की दूसरी पार्टी बन गयी थी। अकाली दल तीसरे स्थान पर फिसल गया था। अकाली दल ने शुरू में कृषि कानूनों का समर्थन किया था। बाद में उसने विरोध किया। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। इससे किसानों का अकाली दल से मोहभंग हो गया। अब ये स्थिति आप और एसएसएम के लिए अनुकूल हो सकती है।

कांग्रेस को सबसे अधिक नुकसान
किसानों के चुनाव मैदान में उतरने से सबसे बड़ा नुकसान कांग्रेस को होगा। पिछले चुनाव में पंजाब के ग्रामीण क्षेत्रों में कांग्रेस को भरपूर समर्थन मिला था। मालवा की 69 सीटों में से कांग्रेसको 41 पर जीत मिली थी। जिस किसान नेता बलबीर सिंह राजेवाल को सीएम चेहरा बनाया गया है वे मालवा के खन्ना के रहने वाले हैं। मालवा इलाके में शुरू से उनकी दबदबा रहा है। उनके इलाके में मुख्यमंत्री बनाने के पोस्टर भी लग गये हैं। मालवा इलाके के किसानों ने कृषि कानूनों का सबसे प्रबल विरोध किया था। राजेवाल को सीएम कैंडिडेट घोषित किये जाने के बाद मालवा की चुनावी फिंजा बिल्कुल बदल गयी है। कहा जाता है कि जिस दल को मालवा में बड़ी जीत मिलती है सत्ता उसे ही नसीब होती है। कांग्रेस की राजनीति अभी कई मुश्किलों से गुजर रही है। कैप्टन अमरिंदर सिंह अब कांग्रेस के विरोध में हैं। सिद्धू -चन्नी की लड़ाई से पार्टी में गुटबाजी अभी भी बरकरार है। ऐसे में अगर अगर किसान भी साथ छोड़ देंगे तो कांग्रेस के अरमानों का महल भरभरा कर गिर जाएगा।












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