इंजीनियर दंपति के बीच तलाक को अदालत ने 14 दिन में दी मंजूरी, कैसे आया इतनी जल्दी फैसला?

पुणे, 9 अक्टूबर। तलाक के मामलों को अदालत में निपटने में अमूमन काफी समय लग जाता है। इसमें संपत्तियों का बंटवारा, गुजारा भत्ता, भरण-पोषण (मैनटेनेंस) समेत अन्य मसले होते हैं जिस पर अदालत में केस खिंचता चला जाता है। लेकिन महाराष्ट्र के पुणे के कोर्ट में कपल की आपसी सहमति से 14 दिन में ही तलाक के मामले में फैसला आ गया। केस फाइल होने के बाद अगले 14 दिन में कोर्ट ने तलाक को मंजूरी दे दी। केस दर्ज होने के अगले छह महीने तक पति-पत्नी के अलग रहकर देखने-समझने का प्रावधान हिंदू विवाह अधिनियम में है ताकि अगर समझौते और रिश्ते के फिर से पटरी पर आने की कोई गुंजाइश हो तो वो हो सके। लेकिन इस मामले में अदालत ने कहा कि इसकी जरूरत नहीं है क्योंकि पति-पत्नी पिछले एक साल से ज्यादा समय से अलग रह रहे हैं।

'समझौते की कोई संभावना नहीं बची'

'समझौते की कोई संभावना नहीं बची'

तलाक के इस अनूठे केस की सुनवाई में फैसला देते हुए जज एमआर काले ने कहा कि सबूतों, परिस्थितियों और तथ्यों को देखते हुए यह स्पष्ट है कि दोनों के विचार व स्वभाव मेल नहीं खाते और वे एक दूसरे के साथ रहने के लिए कतई इच्छुक नहीं हैं। ऐसे में दोनों याची सुखमय वैवाहिक जीवन नहीं जी सकते है। 29 सितंबर को मैरिज काउंसलर ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि दोनों के बीच समझौते की अब कोई संभावना नहीं बची है। इसलिए दोनों की आपसी सहमति से तलाक को मंजूरी दी जाती है। जज ने फैसले में यह भी कहा कि पति-पत्नी के बीच मैनटेनेंस, संपत्ति या दहेज को लेकर कोई विवाद नहीं है। पत्नी ने मैनटेनेंस पाने के अधिकार को खुद ही छोड़ा है। दंपति का एक दूसरे की संपत्ति पर कोई हक नहीं होगा।

2017 में हुई थी शादी

2017 में हुई थी शादी

जिस जोड़े ने तलाक की अर्जी अदालत में दाखिल की, वे एक ही कॉलेज से पढ़कर निकले हैं और पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं। 12 दिसंबर 2017 को दोनों ने शादी की थी। पति दुबई में नौकरी करता है जबकि पत्नी पुणे में जॉब करती है। पिछले महीने ही वकील के जरिए उन्होंने पुणे की अदालत में डाइवोर्स केस फाइल किया था। केस के वकील ने इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में कहा कि शादी के बाद ही दोनों के बीच झगड़े शुरू हो गए थे। विचार मेल नहीं खाने की वजह से वे छोटी-छोटी बातों पर लड़ते थे। 26 अप्रैल 2019 से दोनों अलग रहने लगे। दोनों के बीच पति-पत्नी वाले संबंध नहीं रहे।

अमरदीप बनाम हरवीन कौर केस के आधार पर फैसला

अमरदीप बनाम हरवीन कौर केस के आधार पर फैसला

केस के वकील ने कहा कि दंपति ने चल-अचल संपत्ति, गुजारा भत्ता, मैनटेनेंस और स्त्रीधन समेत अन्य मामलों को आपसी सहमति से निपटा लिया था। दोनों के कोई बच्चे नहीं हैं तो उनकी कस्टडी पर विवाद नहीं था। तलाक के लिए इन सभी शर्तों के बारे में 2017 के अमरदीप बनाम हरवीन कौर केस में सुप्रीम कोर्ट का फैसला है। इसमें सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा था कि एक साल से ज्यादा समय से अलग रह रहे दंपति के तलाक को कानूनी मंजूरी दी सकती है। ऐसे में, अगर दंपति के बीच समझौते की सारी संभावनाएं खत्म हो गई हों तो छह महीने अलग-अलग रहने की अवधि (कूलिंग ऑफ पीरियड) के कानूनी प्रावधान के पालन की बाध्यता नहीं है। इसमें छूट दी जा सकती है।

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