तीसरे चरण के लिये बीजेपी ने बदली रणनीति

पटना (मुकुन्द सिहं)। पहले दो चरणों के मतदान के बाद मिले फीडबैक के बाद बीजेपी ने न सिर्फ अपने चुनाव प्रचार शैली में बदलाव किया है बल्कि पूरी रणनीति बदल दी है।

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पार्टी ने एक रणनीति के तहत 16 अक्टूबर को पीएम मोदी की प्रस्तावित रैली को 25 अक्टूबर, 26 और 27 के लिए स्थगित करने का फैसला किया है। भाजपा सूत्रों के अनुसार मोदी की रैली में भीड़ की प्रतिक्रिया बहुत अच्छी है लेकिन यह वोट में स्थानांतरित नहीं हो पा रहा है। यही कारण है कि बीजेपी मोदी की रैली को चुनावी तारीखों के पास रखना चाहती है ताकि मतदान केंद्रों के लिए जाने के दौरान मतदाताओं के मन में प्रधानमंत्री का संदेश ताजा रखने में मदद मिल सके।

सबसे दिलचस्प यह है कि भाजपा ने पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी और केंद्रीय मंत्री रामविलावस पासवान पर अधिक भरोसा जताया है।

आपको बताते चले कि बीजेपी ने इस चुनाव में 160 प्रत्याशियों में से 65 सवर्णों को मैदान में उतारा है। बिहार में कुल मतदाताओं की 14-15 फीसदी ऊंची जातियों से हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में सवर्ण मतदाताओं का 78 फीसदी वोटरों ने मोदी के नेतृत्व में एनडीए के पक्ष में मतदान किया था। लेकिन बीजेपी ने इस बार पिछड़े वर्ग के वोटरों में अपनी पैठ बनाने की कोशिश में है।यही कारण है कि बीजेपी ने राम विलास पासवान, उपेंद्र कुशवाहा और जीतन राम मांझी के साथ मैदान में उतरने का पैसला किया है।

पिछले चुनाव सर्वेक्षणों में ये जाहिर हो चुका है कि पासवान बिहार में सबसे लोकप्रिय दलित नेता रहे हैं, हालांकि वह सभी दलित जातियों में लोकप्रिय नहीं हैं, लेकिन वह अपनी जाति को अपने गठबंधन के पक्ष में मोड़ सकते हैं। पासवान की एलजेपी ने 2004 और 2009 का लोकसभा एवं 2010 का विधानसभा चुनाव आरजेडी के साथ गठबंधन में लड़ा था और इन चुनावों में आरजेडी और उसकी सहयोगी पार्टियों को क्रमश: 42, 31 और 29 फीसदी दलित वोट मिले थे।

आरजेडी गठबंधन को दलितों के वोट कम मिलने की वजह ये थी कि मांझी पहले जेडीयू के साथ थे और उनके चलते गैर-पासवान दलित वोट जेडीयू और बीजेपी के समर्थन में था। 2010 के विधानसभा चुनाव के दौरान पासवान का आरजेडी से गठबंधन था और तब 55 फीसदी पासवानों ने आरजेडी और सहयोगियों को मत दिया था जबकि 21 फीसदी ने एनडीए गठबंधन को।

महादलितों में केवल 16 फीसदी मतदाताओं ने आरजेडी को वोट दिया था जबकि 35 फीसदी महादलित वोट एनडीए को मिले थे।फिलहाल बीजेपी की रणनीति से साफ है कि पार्टी इस चुनाव में खतरा मोल लेने के मूड में नहीं है। यही कारण है कि बीजेपी एक तरफ जहां सवर्णों के साथ-साथ हर वर्गों के वोट बैंक पर फोकस कर रही है वहीं दूसरी तरफ पार्टी ने मोदी की रैली को आगे कर एक और राजनीतिक चाल चल दी है। अब इस चाल में बीजेपी कितनी सफल हो पाती है ।

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