जनता बनी मौनी बाबा, नेता भगवान की शरण में
पटना (मुकुंद सिहं)। इस बार के बिहार चुनाव में एक बार पुन: दिखा 15 साल पहले वाला बिहार। चुनाव का माहौल और नेताओं की चाल से बढ़ता बिहार एक बार बिगड़ते बिहार की राह पर चल पड़ा, लेकिन मतदाताओं ने जो जनादेश दिया और मत प्रतिशत बढ़ा वह राहत देने वाला है।
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बिहार में दस साल पहले यानी 1990 के दशक में मंडलवाद के कारण विकास ठप और आम आदमी पिसता रहा। 2000 के बाद से राहत मिली और 2005 में जाकर स्थिति बदली और बिहार नीतीश कुमार के अगुआई में आगे चला।
विकास की बात हुई। बिहार का सम्मान बढ़ा। रोजागार के अवसर आए। लेकिन चुनाव के एलान के बाद पहले चरण के प्रचार में विकास की धारा लेकर चले सीएम नीतीश कुमार व पूर्व सीएम लालू प्रसाद के महागठबंधन बिहार में रिजर्वेशन के सवाल पर गोलबंदी तेज की।
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जनता को लगा कि जहां से चले लग रहा वहीं आयेंगे। इनके आरक्षण के काट को सांप्रदायिकता की काट से रोकने की जंग छिडी। स्थिति इतनी भयावह हो गई कि जनता ने मत दिया लेकिन चुनाव के बाद खुलकर बोलने से कतरा रही है। मतदाता की चप्पी कई संकेत दे रही है। समाज के दबंग चुनाव हराने पर बदला न ले यह या फिर जीतेंगे तो चिखेंगे बोलेंगे वाला हाल। खैर जो हो लेकिन अभी बिहार के मतदाता मौनी बाबा व नेता बने बकता बाबा बने हुए हैं।
भगवान की शरण में पहुंच रहे नेता
चुनाव खत्म होते ही सूबे के नेताओं और कार्यकर्त्ताओं द्वारा अपनी-अपनी पार्टी की जीत को लेकर भगवान की शरण में पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया। सभी दलों के नेता अपनी-अपनी जीत का दावा कर रहे हैं ऐसे में कार्यकर्ता भी अपनी पार्टी और गठबंधन की जीत के लिए प्रयास में जुटे हैं।
जहां एनडीए के कार्यकर्ताओं के द्वारा हवन-पूजन कर जीत की कामना की जा रही है। वहीं शुक्रवार को महागठबंधन के कार्यकर्ताओ के द्वारा हाईकोर्ट मजार पर चादरपोशी कर बाबा से महागठबंधन की जीत की दुआ मांगी गई। तो एनडीए के घटक दल लोजपा महानगर द्वारा कारगिल चौक स्थित मंदिर में हवन किया गया और एनडीए की जीत के लिए भगवान से प्रार्थना की गई।













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