Maratha Reservation: मनोज जरांगे की कौन सी थी वो मांगे जिन्हें मान गई फडणवीस सरकार? जानें क्या-क्या हुआ?
Maratha Reservation: मनोज जरांगे पाटिल का मराठा आरक्षण के लिए जारी आंदोलन 2 सितंबर (मंगलवार) को समाप्त हो गया है। मनेाज जरांडे ने मंगलवार की शाम महाराष्ट्र मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस सरकार द्वारा दिए गए आश्वासन के बाद पिछले पांच दिनों से जारी अनशन समाप्त कर दी है।
जरांगे ने मराठा आरक्षण की मांग को लेकर पांच दिन पहले मुंबई के आजाद पार्क में धरना-प्रदर्शन शुरू किया था। जरांगे के आंदोलन में लाखों की संख्या में समर्थक जुटे जिसके कारण मुंबई की प्रमुख सड़कें खचाखच भरी नजर आईं। 2 सितंबर को मराठा आरक्षण पर देवेंद्र फडणवीस कैबिनेट उपसमिति के प्रमुख और मंत्री राधाकृष्ण विखे पाटिल ने मनोज जरांगे से मुलाकात की। जिसके बाद शाम को मनोज जरांडे ने अनशन समाप्त कर दी

जरांगे ने अपने समर्थकों से शांतिपूर्वक अपने गांवों को लौटने की अपील करते हुए कहा, "सब अपने अपने गांव संभल कर जाएं। मुझे अभी अस्पताल जाना पड़ेगा। मैं बाद में आकर सबसे मिलूंगा।" इस घोषणा के बाद मुंबई के आजाद मैदान में जमा हुए समर्थकों ने जश्न मनाना शुरू कर दिया। आइए जानते हैं कौन सी हैं वो मांगे जिन्हें महाराष्ट्र की देवेंद्र फडणवीस सरकार ने मान ली है?
जरांगे की वो मांगे जिन्हें मान गई फडणवीस सरकार?
महाराष्ट्र सरकार ने मराठा समुदाय की छह प्रमुख मांगें स्वीकार कर ली हैं।
- हैदराबाद गजट को लागू करना: महाराष्ट्र सरकार ने मंगलवार को हैदराबाद गजेटियर पर एक प्रस्ताव जारी किया। इसके तहत, एक समिति के गठन की घोषणा की गई है, जो उन मराठों को कुणबी जाति प्रमाण पत्र जारी करने में मदद करेगी जिनके पास अतीत में उन्हें कुणबी के रूप में मान्यता देने वाले दस्तावेजी प्रमाण हैं। यह सरकारी प्रस्ताव (GR) सामाजिक न्याय और विशेष सहायता विभाग द्वारा जारी किया गया है।
- सतारा और औंध गजट को लागू करने की प्रक्रिया शुरू करना: जिसमें 15 दिनों में कानूनी अड़चनें दूर की जाएंगी
- आंदोलनकारियों के खिलाफ दर्ज मुकदमे वापस लेना
- आंदोलन में मारे गए लोगों के परिवारों को 15 करोड़ रुपये की आर्थिक सहायता और पात्रतानुसार सरकारी नौकरी प्रदान करना
- 58 लाख कुणबी नोंदी ग्राम पंचायत स्तर पर लगाना और वंशवली (शिंदे) समिति के कार्यालय और कार्यावधि का विस्तार करना शामिल है।
कौन सी हैं वो दो मांगे जो लंबित हैं?
"मराठा-कुणबी एक" के जीआर का पूर्ण क्रियान्वयन और सगे-सोयरे प्रमाणपत्र की गहन जांच की ये दो मांगें हैं जो अभी भी लंबित या आंशिक रूप से स्वीकृत हैं। सरकार ने कहा है कि इन पर प्रक्रिया जारी है, लेकिन अंतिम निर्णय अभी नहीं हुआ है। इसका मतलब है कि पाटिल की आठ में से छह मांगें मान ली गई हैं, जबकि बाकी दो पर काम चल रहा है।
क्या है हैदराबाद गजट?
हैदराबाद गजट, हैदराबाद रियासत सरकार की एक अधिसूचना है, जिसमें कुनबी (किसान जाति) को सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ा वर्ग बताया गया था। आंदोलनकारियों का दावा है कि मराठा कुनबी हैं, इसलिए यदि कुनबी को ओबीसी श्रेणी में मान्यता मिली थी, तो मराठों को भी उसी श्रेणी में रखा जाना चाहिए।
मराठों को कुणबी के रूप में मान्यता मिलने से क्या होगा लाभ?
बता दें जरांगे लगातार मांग कर रहे हैं कि मराठों को कुणबी के रूप में मान्यता दी जाए। कुणबी महाराष्ट्र में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) श्रेणी में शामिल एक कृषि प्रधान जाति है। मराठों को कुणबी के रूप में वर्गीकृत करने से वे सरकारी नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण के पात्र हो जाएंगे। कुणबी जाति प्रमाण पत्र जारी करने में सहायता के लिए गठित समिति एक ग्राम-स्तरीय तंत्र होगा। इस पैनल में ग्राम सेवक, तलाठी (राजस्व अधिकारी) और सहायक कृषि अधिकारी सदस्य के रूप में शामिल होंगे।
मनोज जरांडे ने पानी भी त्याग दिया था
गौरतलब है कि पांच दिन पहले मनाेज जरांगे ने प्रदर्शन शुरू किया था, 1 सितंबर को उन्होंने पानी भी त्याग दिया था जिससे उनकी तबीयत खराब हो गई थी। इसके बाजजूद जरांडे ने धरना जारी रखा।
मनोज जरांगे ने पहले महाराष्ट्र सरकार को मराठा समुदाय को कुनबी का हिस्सा घोषित करने वाला एक सरकारी आदेश (जीआर) जारी करने के लिए दो महीने का अल्टीमेटम दिया था। जरांगे ने घोषणा की कि यदि महाराष्ट्र सरकार मराठा आरक्षण की मांग को लेकर सरकारी आदेश जारी करती है, तो वह उसी रात 9 बजे तक मुंबई से रवाना हो जाएंगे।
मंत्रियों की उपस्थिति में अपने समर्थकों से जरांगे ने कहा, "हम जीत गए हैं।" उन्होंने यह भी बताया कि महाराष्ट्र सरकार ने मराठा आरक्षण आंदोलन के प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मामले वापस लेने का वादा किया है।
बॉम्बे हाईकोर्ट ने आंदोलनकारियों को दिया था अल्टीमेटम
गौरतलब है कि बॉम्बे हाई कोर्ट में इस मामले पर महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। एक्टिंग चीफ जस्टिस चंद्रशेखर और जस्टिस आरती साठे की बेंच ने मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार और आंदोलनकारियों दोनों से कड़े सवाल किए। इसके साथ ही 1 सितंबर को कोर्ट ने इस मामले में सुनवाई करते हुए आंदोलनकारियों को 2 सितंबर को मुंबई की सड़के खाली करने का अल्टीमेटम दिया था।
दरअलल, हाई कोर्ट ने आंदोलन के दौरान नियमों के उल्लंघन पर चिंता व्यक्त की, खासकर वाहनों के गलत पार्किंग के कारण हुए यातायात जाम को लेकर। कोर्ट ने मुंबई के लोगों को हुई परेशानी का भी जिक्र किया। कोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा कि उसने स्थिति को इस हद तक क्यों बढ़ने दिया और यातायात प्रबंधन के लिए क्या कदम उठाए।
हाईकोर्ट ने आंदोलनकारियों से पूछा ये सवाल
मराठा आंदोलनकारियों ने आजाद मैदान में अपनी उपस्थिति जारी रखने के लिए पुलिस से अनुमति बढ़ाने का अनुरोध किया था, जिसे मुंबई पुलिस ने अस्वीकार कर दिया। इसके बाद, आंदोलनकारियों ने इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी, जहां उनकी ओर से एडवोकेट सतीश मानशिंदे पेश हुए। हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान आंदोलनकारियों से पूछा कि जब 60,000 से 1 लाख लोग शहर में पहुंचे, तो उन्होंने क्या कदम उठाए?
मानशिंदे ने जवाब दिया कि उन्होंने मीडिया के माध्यम से अपील की और लोगों से अपनी गाड़ियां हटाने और शहर से बाहर जाने को कहा। हालांकि, कोर्ट इस जवाब से संतुष्ट नहीं हुआ और स्पष्ट कहा, "अगर तुरंत जगह खाली नहीं हुई तो 3 बजे के बाद हम सख्त कार्रवाई करेंगे।"90 फीसदी आंदोलनकारी छोड़ चुके हैं
मुंबई बॉम्बे हाईकोर्ट में मंगलवार को इस मामले पर सुनवाई हुई। मनोज जरांगे के वकील सतीश मानेशिंदे ने कोर्ट को बताया कि 90 प्रतिशत प्रदर्शनकारी मुंबई छोड़ चुके हैं और जरांगे ने सभी वाहनों को हटाने का आदेश दिया है।












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