Maharashtra: जब शरद पवार ने भाजपा से गठबंधन कर लड़ा था चुनाव

शरद पवार आज भले भाजपा के विरोधी हैं लेकिन एक समय वह भी था जब उन्होंने भाजपा के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ा था। उस समय शरद पवार ने कांग्रेस को सबक सिखाने के लिए भाजपा से हाथ मिलाया था। यह भी दिलचस्प है कि तब भाजपा ने महाराष्ट्र में शिवसेना से गठबंधन तोड़ कर शरद पवार के साथ जाने का फैसला लिया था।

जब शिवसेना ने लड़ा था भाजपा के सिंबल पर चुनाव

1984 के लोकसभा चुनाव के समय इंदिरा गांधी की हत्या के कारण कांग्रेस के पक्ष में लहर चल रही थी। इस चुनाव में भाजपा ने शिवसेना के साथ गठबंधन किया था। इस गठबंधन के सूत्रधार थे प्रमोद महाजन। शिवसेना प्रमुख बाला साहेब ठाकरे ने अपनी पार्टी के लिए दो लोकसभा सीटें मांगी थी। दक्षिण मध्य मुम्बई और और उत्तर मध्य मुम्बई से शिवसेना ने चुनाव लड़ा। उस समय शिवसेना का अपना कोई चुनावी सिंबल नहीं था इसलिए उसने भाजपा के कमल छाप पर चुनाव लड़ा था। बाकी सीटों पर भाजपा ने उम्मीदवार खड़े किये। लेकिन दोनों दलों की करारी हार हुआ और खाता तक नहीं खुला। इस हार के बाद भाजपा और शिवसेना में तकरार शुरू हो गयी। हार के लिए एक दूसरे पर आरोप मढ़ने लगे।

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शरद पवार का भाजपा से गठबंधन

1985 के विधानसभा चुनाव में चौंकाने वाला गंठबंधन हुआ। लोकसभा चुनाव में हार के बाद भाजपा का शिवसेना से गठबंधन टूट चुका था। उस समय शरद पवार कांग्रेस से घोर विरोधी थे क्यों कि इंदिरा गांधी ने 1980 में उनकी सरकार को बर्खास्त कर दिया था। शरद पवार ने कांग्रेस समाजावादी के नाम से अलग पार्टी बना रखी थी। यानी एनसीपी के पहले उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (समाजवादी) पार्टी बनायी थी। महाराष्ट्र में कांग्रेस की सरकार को हराने के लिए शरद पवार मजबूत गठबंधन बनाने की कोशिश कर रहे थे। पहले उन्होंने भाजपा को अपना सहयोगी बनाया। फिर जनता पार्टी को जोड़ लिया। लेफ्ट को भी इसमें शामिल किया। इस तरह शरद पवार ने कांग्रेस के खिलाफ एक मोर्चा बनाया जिसका नाम था- पुरोगामी लोकशाही अघाड़ी।

पवार को 54 सीट तो भाजपा को 16 सीट

1985 के विधानसभा चुनाव में शरद पवार की पुरोगामी लोकशाही अघाड़ी मैदान में उतरी। शरद पवार भाजपा के साथ गठबंधन कर यह सोच रहे थे कि वे कांग्रेस को कड़ी टक्कर देने में सफल रहेंगे। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। पुरोगामी लोकशाही अघाड़ी को केवल 103 सीटें मिलीं जब कि कांग्रेस ने 161 सीटें जीत कर पूर्ण बहुमत हासिल कर लिया था। पुरोगामी लोकशाही अघाड़ी मोर्चा में सबसे अधिक सीटें शरद पवार की पार्टी (कांग्रेस समाजवादी) को मिली। उसने 54 सीटें जीतीं। जनता पार्टी को 20, भाजपा को 16 सीटें मिलीं थी। इस चुनाव में शिवसेना को भी एक सीट मिली थी।

1985 की हार से पवार को लगा था झटका

1985 के चुनाव परिणाम से शरद पवार को बहुत निराश हुई। उनकी नजर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर थी। तब उन्हें लगा कि कांग्रेस में रह कर ही हित पूर्ति संभव है। फिर वे धीरे धीरे कांग्रेस की तरफ झुकने लगे। 1984 के लोकसभा चुनाव में विपक्ष का सफाया हो गया था। लेकिन प्रधानमंत्री राजीव गांधी बचे- खुचे विपक्ष को भी हाशिये पर डालना चाहते थे। शरद पवार कांग्रेस में आना चाहते हैं, इस बात का संदेश सुरेश कलमाडी ने राजीव गांधी के तत्कालीन करीबी अरुण नेहरू तक पहुंचाया। कलमाडी उस समय महाराष्ट्र से राज्यसभा सदस्य थे। दोनों तरफ से जब बात आगे बढ़ी तो शरद पवार ने खुद राजीव गांधी से मुलाकात की।

शरद पवार के कांग्रेस में आने का हुआ था विरोध

हालांकि उस समय उस समय कांग्रेस के कुछ नेता शरद पवार के पार्टी में फिर आने का विरोध कर रहे थे। उनका तर्क था कि जब महाराष्ट्र में कांग्रेस पहले से बहुमत की सरकार चला रही तब फिर शरद पवार को लाने का क्या मतलब है ? उल्टे उनके आने से पार्टी में जोड़तोड़ का खतरा बढ़ जाएगा। लेकिन राजीव गांधी शरद पवार को कांग्रेस में वापस लाना चाहते थे। बातचीत आगे बढ़ी। तब राजीव गांधी ने शर्त रख दी कि शरद पवार को अपनी पार्टी (कांग्रेस समाजवादी) का कांग्रेस में वलय करना होगा। 1987 में शरद पवार इस बात के लिए राजी हो गये। शरद पवार की पार्टी का कांग्रेस में विलय होने के महाराष्ट्र का राजनीतिक परिदृश्य बदल गया। अब विधानसभा में कांग्रेस के सदस्यों की कुल संख्या 213 हो गयी जब कि सांसदों की संख्या 46 हो गयी।

CM बनने के लिए फिर आये कांग्रेस में

शरद पवार जब 1987 में दोबारा कांग्रेस में शामिल हुए उस समय महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री शंकरराव चव्हाण के विरुद्ध आंतरिक गुटबाजी बढ़ने लगी थी। महाराष्ट्र के कई सांसदों ने प्रधानमंत्री राजीव गांधी से मुख्यमंत्री शंकर राव चव्हाण की शिकायत की थी। शरद पवार के आने के बाद सीएम चव्हाण के खिलाफ विक्षुब्ध गतिविधियां बढ़ने लगीं। इस मामले में जब शरद पवार पर उंगलियां उठने लगीं तो उन्होंने इसका खंडन कर दिया। लेकिन ये बात छिपी नहीं रही कि शरद पवार फिर सीएम बनने की कोशिश कर रहे हैं। शरद पवार का काम राजीव गांधी ने आसान कर दिया। उन्होंने महाराष्ट्र में गुटबाजी खत्म करने के लिए शंकर राव चव्हाण को केन्द्र में बुला कर वित्त मंत्री बना दिया। जून 1988 में जब शंकर राव चव्हाण का केन्द्र में जाना तय हो गया तो उनकी जगह शरद पवार को मुख्यमंत्री बना दिया गया। उस समय राजीव गांधी ने समर्थकों ने तर्क दिया था कि शरद पवार ही महाराष्ट्र में शिवसेना के उभार को रोक सकते हैं। लेकिन भविष्य में ये बात सच साबित नहीं हुई।

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