Maharashtra Elections: बहुकोणीय मुकाबले में AIMIM की बदली रणनीति! क्यों ओवैसी की पार्टी को नकार नहीं सकते?

Maharashtra Chunav 2024: हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) तेलंगाना की राजधानी के बाद महाराष्ट्र को अपना दूसरा गढ़ मानती है। राज्य में पार्टी को तब सबसे पहले गंभीरता से लेना पड़ा, जब वह 2019 में औरंगाबाद से लोकसभा का चुनाव जीत गई। लेकिन, इस बार जब महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में बहुकोणीय मुकाबला नजर आ रहा है तो पार्टी ने पहले से काफी कम सीटों पर उम्मीदवार उतारकर चुनावी जानकारों को भी चौंका दिया है।

महाराष्ट्र में इसबार एआईएमआईएम राज्य की 288 सीटों में से सिर्फ 16 सीटों पर ही चुनाव लड़ रही है। 2019 के विधानसभा चुनावों में पार्टी 44 सीटों पर चुनाव लड़ी थी, जिसमें 2 पर जीती भी थी; और 2014 में भी यह संख्या 22 थी। इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक सूत्रों का कहना है कि ओवैसी की पार्टी ने इस चुनाव में राज्य में पार्टी का जनाधार बढ़ाने के बजाए अधिक सीटों पर चुनाव जीतने पर फोकस किया है।

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चुनाव के बाद की संभावनाओं पर ओवैसी की पार्टी की नजर
औरंगाबाद से पार्टी के पूर्व सांसद और इसके मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष इम्तियाज जलील ने इसी अखबार से बातचीत में जो दावा किया है, उससे पार्टी की बदली रणनीति के पीछे की सोच का पता चलता है।

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उनके मुताबिक, 'यह बहुत ही जटिल चुनाव है। कई सारे खिलाड़ी हैं। इसकी कोई निश्चितता नहीं है कि दोनों प्रमुख गठबंधन (सत्ताधारी महायति और विपक्षी महा विकास अघाड़ी) चुनावों के बाद भी जीवित रह पाएंगे। ऐसी संभावना है कि किसी को भी स्पष्ट बहुमत न मिले। ऐसी स्थिति में जिस भी पार्टी के पास 5 से 7 एमएलए होंगे, वही किंगमेकर बनेगा।'

दलित-मुस्लिम गठजोड़ से ज्यादा सीटें जीतने की रणनीति
एआईएमआईएम ने इस बार 16 उम्मीदवारों में अनुसूचित जातियों (SC) के लिए सुरक्षित सीटों में से 4 पर दलित प्रत्याशी उतारे हैं। बाकी पर फिर से मुस्लिम उम्मीदवारों पर ही भरोसा कायम रखा है। कोशिश मुस्लिम-दलित गठजोड़ बनाकर 'किंगमेकर' बनने की लग रही है। वैसे पार्टी मुस्लिमों से जुड़े भावनात्मक मुद्दे ही चुनाव प्रचार में ज्यादा उठाती हुई नजर आ रही है।

जलील का कहना है, 'अगर 2019 के लोकसभा चुनाव के नतीजे आप देखें, तो मुझे बहुत ज्यादा दलित वोट मिले और मैं जीत गया। उस समय हमारा प्रकाश अंबेडकर की वंचित बहुजन अघाड़ी (VBA) के साथ गठबंधन था। दुर्भाग्य से वह गठबंधन तो इस बार नहीं रहा, लेकिन दलित समुदाय का हमें समर्थन है। दलितों के सामने नेतृत्व का संकट है। वह हमारी ओर देख रहे हैं, क्योंकि वो संविधान बचाने की बात कर रहे हैं...।' जलील खुद भी औरंगाबाद पूरब सीट से चुनाव लड़ रहे हैं।

2019 के विधआनसभा चुनाव में पार्टी मालेगांव और धुले सीटों पर जीती थी। इसके साथ ही उसके उम्मीदवार औरंगाबाद सेंट्रल, औरंगाबाद ईस्ट, बायकुला और सोलापुर सिटी सेंट्रल जैसी सीटों पर दूसरे स्थान पर रही थी। यही वजह है कि पार्टी की रणनीति इसबार कम से कम इतनी सीटें जीतने की हैं, ताकि त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में वह खुद को 'किंगमेकर' की भूमिका में देख सके।

रणनीति के तहत ही कम सीटों पर चुनाव लड़ रही है एआईएमआईएम
ओवैसी की पार्टी के सूत्रों का मानना है कि ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने पर महा विकास अघाड़ी (एमवीए) को उसे 'बीजेपी की बी टीम' के रूप में पेश करना आसान हो सकता था। भाजपा-विरोध दल, जब भी ऐसी परिस्थितियों में फंसते हैं, वह ओवैसी की पार्टी को यही कहकर घेरना शुरू कर देती हैं। क्योंकि, ओवैसी और एमवीए दोनों ही मुस्लिम वोट बैंक को टारगेट करते हैं।

ओवैसी की पार्टी के एक और नेता ने कहा, 'महाराष्ट्र में अगर हमें एमवीए का वोट काटना होता तो हम 230 सीटों पर लड़ रहे होते। हम उस खेल में कभी पड़े नहीं। कांग्रेस हमपर आरोप लगाती है, ताकि वह नहीं चाहती कि मुसलमानों का नेता अपने दम पर ऊपर उठ सके। महाराष्ट्र में हम एक गंभीर खिलाड़ी हैं।'

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